पदच्छेदः — विपदि धैर्यम् अथ अभ्युदये क्षमा सदसि वाक्-पटुता युधि विक्रमः । यशसि च अभिरुचिः व्यसनम् श्रुतौ प्रकृति-सिद्धम् इदम् हि महात्मनाम् ।
अन्वयः — अथ विपदि धैर्यम्, अभ्युदये क्षमा, सदसि वाक्-पटुता, युधि विक्रमः, यशसि अभिरुचिः, श्रुतौ व्यसनं च — इदं हि महात्मनां प्रकृति-सिद्धं भवति ।
अर्थः — विपत्ति में धैर्य, उन्नति के समय क्षमा, सभा में वाणी की कुशलता, युद्ध में पराक्रम, यश में रुचि और शास्त्र-श्रवण में लगन — ये छहों गुण महापुरुषों में स्वभाव से ही सिद्ध होते हैं।
भावार्थः (पुस्तकानुसारम्) — महापुरुषाणाम् एतत् आचरणं स्वभावसिद्धमेव भवति । यत्किमपि भवेत् ते विपत्काले धैर्यमवलम्ब्य समस्यापरिहारविषये प्रयत्नं कुर्वन्ति । सम्पत्तौ उन्नतौ च ते सर्वान् उपकुर्वन्ति । सभायां ते कौशलेन भाषणं कुर्वन्ति । युद्धे ते पराक्रमं शौर्यं च दर्शयन्ति । यशोविषये ते अभिरुचिं प्रदर्शयन्ति । शास्त्रविषये च ते अनुरागं प्रकटयन्ति ।
श्लोक की रचना कैसे काम करती है: छह पंक्ति-खण्ड, छह अवसर, छह गुण — और हर बार अवसर सप्तमी विभक्ति में (विपदि, अभ्युदये, सदसि, युधि, यशसि, श्रुतौ) तथा गुण प्रथमा में। कोई क्रिया बीच में नहीं आती। यह सूची-शैली ही श्लोक को कण्ठस्थ करने योग्य बना देती है।
ध्यान दीजिए, जोड़ियाँ जान-बूझकर उलटी हैं — विपत्ति में धैर्य (जहाँ टूटना स्वाभाविक है) और उन्नति में क्षमा (जहाँ अकड़ना स्वाभाविक है)। महात्मा वही है जो अवसर के स्वाभाविक दोष से उलटा आचरण करे।
पाठ-सम्बन्धः: यह श्लोक कथा में तब आता है जब सारे कपोत चित्रग्रीव को दोष दे रहे हैं और वह शान्त रहकर उपाय सोचता है — अर्थात् वह स्वयं ‘विपदि धैर्यम्’ का जीवित उदाहरण बन जाता है। पाठ श्लोक कहकर छोड़ता नहीं, उसे घटना में दिखा देता है।
सन्धिः: धैर्यम् + अथ + अभ्युदये = धैर्यमथाभ्युदये ; च + अभिरुचिः = चाभिरुचिः (दीर्घ सन्धि) ; अभिरुचिः + व्यसनम् = अभिरुचिर्व्यसनम् (विसर्ग का ‘र्’) ; प्रकृतिसिद्धम् + इदम् = प्रकृतिसिद्धमिदम् ।