दीपकम् अध्याय 2 योग्यताविस्तरः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
ग्रन्थपरिचयः — प्रस्तुतः पाठः कस्मात् ग्रन्थात् स्वीकृतः ? तस्य ग्रन्थस्य परिचयं लिखत ।
उत्तर

उत्तरम् — प्रस्तुतः पाठः हितोपदेशग्रन्थस्य ‘मित्रलाभ’-प्रकरणात् स्वीकृतः । अस्य ग्रन्थस्य लेखकः पण्डितः नारायणशर्मा अस्ति । अस्मिन् ग्रन्थे मूल्ययुक्तानां, नीतियुक्तानां च वचनानां, सुभाषितानां, कथानां च सङ्ग्रहः अस्ति । अतः अयं ग्रन्थः संस्कृतसाहित्ये अत्यन्तं समाद्रियते । अस्मिन् ग्रन्थे चत्वारि प्रकरणानि सन्ति — (१) मित्रलाभः (२) सुहृद्भेदः (३) विग्रहः (४) सन्धिः इति । अस्य अध्ययनेन छात्रः नीतिविद्यायां संस्कृतभाषायां च निपुणो भवति ।

[हिन्दी — यह पाठ हितोपदेश ग्रन्थ के ‘मित्रलाभ’ प्रकरण से लिया गया है। इसके लेखक पण्डित नारायण शर्मा हैं। इस ग्रन्थ में मूल्यों और नीति से भरे वचनों, सुभाषितों तथा कथाओं का संग्रह है, इसीलिए संस्कृत साहित्य में इसका बहुत आदर है। इसमें चार प्रकरण हैं — मित्रलाभ, सुहृद्भेद, विग्रह और सन्धि। इसके अध्ययन से छात्र नीतिविद्या और संस्कृत भाषा — दोनों में निपुण हो जाता है।]

‘मित्रलाभ’ ही क्यों: इस पाठ की कथा में कपोत अकेले कुछ नहीं कर पाते; उन्हें हिरण्यक चाहिए। जो अपने पास नहीं है वह मित्र से मिलता है — इसी विचार का नाम मित्रलाभ है। इसलिए यह कथा उसी प्रकरण की है, और पाठ का शीर्षक-श्लोक भी उसी की ओर संकेत करता है।
स्मरणीयम्: हितोपदेश का आधार पञ्चतन्त्र है, पर उसकी रचना अलग है — कथा के भीतर कथा, और बीच-बीच में नीति-श्लोक। ‘हित + उपदेश’ = वह उपदेश जो हित करे।
प्र2.
अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका । तृणैर्गुणत्वमापन्नैर्बध्यन्ते मत्तदन्तिनः ॥ (हितोपदेशः १.३६) — अस्य श्लोकस्य पदच्छेदम्, अन्वयम्, अर्थं भावं च लिखत ।
उत्तर

पदच्छेदः — अल्पानाम् अपि वस्तूनाम् संहतिः कार्य-साधिका । तृणैः गुणत्वम् आपन्नैः बध्यन्ते मत्त-दन्तिनः ।

अन्वयः — अल्पानाम् अपि वस्तूनां संहतिः कार्य-साधिका (भवति) । गुणत्वम् आपन्नैः तृणैः मत्त-दन्तिनः बध्यन्ते ।

अर्थः — छोटी-छोटी वस्तुओं का भी संगठन कार्य सिद्ध कर देने वाला होता है। रस्सी का रूप ले चुके तिनकों से मतवाले हाथी तक बाँध दिए जाते हैं।

भावार्थः (पुस्तकानुसारम्) — स्वल्पानां, निर्बलानामपि वस्तूनां संहतिः अर्थात् सङ्घः, समुदायः लक्ष्यसिद्धौ सहायिका भवति । यथा — घाससमूहेन निर्मितरज्जुद्वारा गजेन्द्रा अपि बद्धाः भवन्ति ।

श्लोक की युक्ति: कवि दो अन्तिम कोटियाँ आमने-सामने रखता है — एक ओर तृण (जिसे उँगली से तोड़ा जा सकता है), दूसरी ओर मत्त हाथी (जिसे कोई रोक नहीं सकता)। बीच में एक ही शब्द है जो पासा पलट देता है — गुणत्वम् आपन्नैः, अर्थात् ‘रस्सी-पन को प्राप्त हुए’। तिनका जब तक अलग है, तिनका है; बँट जाए तो रस्सी है। संगठन तिनके की शक्ति नहीं बढ़ाता — उसका रूप बदल देता है।
शब्दसौन्दर्यम्: ‘गुण’ शब्द के दो अर्थ यहाँ एक साथ चलते हैं — (1) रस्सी, (2) सद्गुण। इसे श्लेष कहते हैं। अर्थात् तिनके भी ‘गुण’ पा लें तो हाथी बाँध लें।
व्याकरणम्: ‘तृणैः’ तथा ‘आपन्नैः’ — तृतीया विभक्ति, बहुवचन (करण)। ‘बध्यन्ते’ — बन्ध् धातु, कर्मवाच्य, लट् लकार, प्रथमपुरुष बहुवचन। ‘मत्तदन्तिनः’ — ‘दन्तिन्’ (हाथी) का प्रथमा बहुवचन, यही कर्मवाच्य का कर्म है। ‘कार्यसाधिका’ स्त्रीलिङ्ग है क्योंकि उसका विशेष्य ‘संहतिः’ स्त्रीलिङ्ग है।
पाठ-सम्बन्धः: कथा में यही श्लोक गद्य-रूप में आया है — ‘लघूनाम् अपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका भवति इति नीतिवचनं लोकसिद्धम्।’ और इसका प्रयोग भी दिखा दिया गया — अकेला कपोत जाल नहीं उठा सकता, सब मिलकर उठा ले जाते हैं।
प्र3.
विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः । यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम् ॥ (हितोपदेशः १.३२) — अस्य श्लोकस्य पदच्छेदम्, अन्वयम्, अर्थं भावं च लिखत ।
उत्तर

पदच्छेदः — विपदि धैर्यम् अथ अभ्युदये क्षमा सदसि वाक्-पटुता युधि विक्रमः । यशसि च अभिरुचिः व्यसनम् श्रुतौ प्रकृति-सिद्धम् इदम् हि महात्मनाम् ।

अन्वयः — अथ विपदि धैर्यम्, अभ्युदये क्षमा, सदसि वाक्-पटुता, युधि विक्रमः, यशसि अभिरुचिः, श्रुतौ व्यसनं च — इदं हि महात्मनां प्रकृति-सिद्धं भवति ।

अर्थः — विपत्ति में धैर्य, उन्नति के समय क्षमा, सभा में वाणी की कुशलता, युद्ध में पराक्रम, यश में रुचि और शास्त्र-श्रवण में लगन — ये छहों गुण महापुरुषों में स्वभाव से ही सिद्ध होते हैं।

भावार्थः (पुस्तकानुसारम्) — महापुरुषाणाम् एतत् आचरणं स्वभावसिद्धमेव भवति । यत्किमपि भवेत् ते विपत्काले धैर्यमवलम्ब्य समस्यापरिहारविषये प्रयत्नं कुर्वन्ति । सम्पत्तौ उन्नतौ च ते सर्वान् उपकुर्वन्ति । सभायां ते कौशलेन भाषणं कुर्वन्ति । युद्धे ते पराक्रमं शौर्यं च दर्शयन्ति । यशोविषये ते अभिरुचिं प्रदर्शयन्ति । शास्त्रविषये च ते अनुरागं प्रकटयन्ति ।

श्लोक की रचना कैसे काम करती है: छह पंक्ति-खण्ड, छह अवसर, छह गुण — और हर बार अवसर सप्तमी विभक्ति में (विपदि, अभ्युदये, सदसि, युधि, यशसि, श्रुतौ) तथा गुण प्रथमा में। कोई क्रिया बीच में नहीं आती। यह सूची-शैली ही श्लोक को कण्ठस्थ करने योग्य बना देती है।
ध्यान दीजिए, जोड़ियाँ जान-बूझकर उलटी हैं — विपत्ति में धैर्य (जहाँ टूटना स्वाभाविक है) और उन्नति में क्षमा (जहाँ अकड़ना स्वाभाविक है)। महात्मा वही है जो अवसर के स्वाभाविक दोष से उलटा आचरण करे।
पाठ-सम्बन्धः: यह श्लोक कथा में तब आता है जब सारे कपोत चित्रग्रीव को दोष दे रहे हैं और वह शान्त रहकर उपाय सोचता है — अर्थात् वह स्वयं ‘विपदि धैर्यम्’ का जीवित उदाहरण बन जाता है। पाठ श्लोक कहकर छोड़ता नहीं, उसे घटना में दिखा देता है
सन्धिः: धैर्यम् + अथ + अभ्युदये = धैर्यमथाभ्युदये ; च + अभिरुचिः = चाभिरुचिः (दीर्घ सन्धि) ; अभिरुचिः + व्यसनम् = अभिरुचिर्व्यसनम् (विसर्ग का ‘र्’) ; प्रकृतिसिद्धम् + इदम् = प्रकृतिसिद्धमिदम्
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