उत्तरम् — आम्। नीतिश्लोकाः। नीतिश्लोकाः नाम सुभाषितानि। (हाँ, नीतिश्लोक। नीतिश्लोक ही सुभाषित कहलाते हैं।)
पौत्री पितामही से एक नई कथा सुनाने को कहती है — पितामहि! एकां नूतनां कथां कथयतु। पितामही उत्तर देती हैं — वत्से! त्वं प्रतिदिनं तु कथां शृणोषि, अद्य नीतिश्लोकान् शृणु। (बेटी! तुम तो प्रतिदिन कथा सुनती हो, आज नीतिश्लोक सुनो।) तब पौत्री आश्चर्य से पूछती है — ‘नीतिश्लोकाः …?’
क्यों यही उत्तर: पितामही का ही अगला वाक्य इसका उत्तर है — नीतिश्लोकाः नाम सुभाषितानि। अर्थात् जिन श्लोकों में जीवन की नीति, अर्थात् सही आचरण की सीख होती है, उन्हें ही सुभाषित कहते हैं। ‘नाम’ अव्यय यहाँ ‘अर्थात् / कहलाते हैं’ के अर्थ में आया है।
व्याकरण-सूचना: शृणु — ‘श्रु’ धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन (तुम सुनो)। शृणोषि — लट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन (तुम सुनती हो)। कथयतु — लोट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन — बड़ों के लिए आदरपूर्वक प्रार्थना।