दीपकम् अध्याय 3 चित्र-संवादः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
नीतिश्लोकाः ...?
उत्तर

उत्तरम् — आम्। नीतिश्लोकाः। नीतिश्लोकाः नाम सुभाषितानि। (हाँ, नीतिश्लोक। नीतिश्लोक ही सुभाषित कहलाते हैं।)

पौत्री पितामही से एक नई कथा सुनाने को कहती है — पितामहि! एकां नूतनां कथां कथयतु। पितामही उत्तर देती हैं — वत्से! त्वं प्रतिदिनं तु कथां शृणोषि, अद्य नीतिश्लोकान् शृणु। (बेटी! तुम तो प्रतिदिन कथा सुनती हो, आज नीतिश्लोक सुनो।) तब पौत्री आश्चर्य से पूछती है — ‘नीतिश्लोकाः …?’

क्यों यही उत्तर: पितामही का ही अगला वाक्य इसका उत्तर है — नीतिश्लोकाः नाम सुभाषितानि। अर्थात् जिन श्लोकों में जीवन की नीति, अर्थात् सही आचरण की सीख होती है, उन्हें ही सुभाषित कहते हैं। ‘नाम’ अव्यय यहाँ ‘अर्थात् / कहलाते हैं’ के अर्थ में आया है।
व्याकरण-सूचना: शृणु — ‘श्रु’ धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन (तुम सुनो)। शृणोषि — लट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन (तुम सुनती हो)। कथयतु — लोट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन — बड़ों के लिए आदरपूर्वक प्रार्थना।
प्र2.
किं नाम सुभाषितानि ?
उत्तर

उत्तरम्सुष्ठु भाषितानि इति सुभाषितानि, अर्थात् शोभनानि वचनानि। तानि सर्वदा जनानां हिताय भवन्ति। (जो अच्छी तरह कहे गए हों, वे सुभाषित हैं, अर्थात् सुन्दर वचन। वे सदा लोगों के हित के लिए होते हैं।)

शब्द-रचना: सु + भाषित = सुभाषितम्
सु = सुष्ठु / शोभनम् (अच्छी तरह, सुन्दर)
भाषितम् = कथितम्, उक्तं वचनम् (कहा गया वचन)
अतः सुभाषितम् = सुष्ठु भाषितं वचनम्
भाव समझिए: सुभाषित की पहचान केवल यह नहीं कि वह सुन्दर लगे, बल्कि यह है कि वह जनानां हिताय हो — सबके हित का हो। इसीलिए पितामही आगे कहती हैं कि सुभाषित स्वकर्तव्यस्य अकर्तव्यस्य च विषये स्पष्टतया मार्गदर्शनं कुर्वन्ति — क्या करना चाहिए और क्या नहीं, यह स्पष्ट रूप से बताते हैं।
ध्यातव्यम्: ‘इति’ यहाँ परिभाषा जोड़ने वाला अव्यय है — ‘सुष्ठु भाषितानि इति सुभाषितानि’ = ‘अच्छी तरह कहे गए वचन — यही सुभाषित हैं।’
प्र3.
सुभाषितपठनेन कः लाभः ?
उत्तर

उत्तरम्सुभाषितपठनेन आदर्श-मानवजीवन-निर्माणाय प्रेरणा प्राप्यते। मानवजीवनस्य सुखाय समृद्ध्ये च सुभाषितानां पठनस्य आवश्यकता अस्ति। यः सुभाषितानि पठित्वा कार्यक्षेत्रे तस्य ज्ञानस्य प्रयोगं करोति सः बहून् लाभान् प्राप्नोति। (सुभाषित पढ़ने से आदर्श मानव-जीवन बनाने की प्रेरणा मिलती है। मानव-जीवन के सुख और समृद्धि के लिए सुभाषितों का पठन आवश्यक है। जो सुभाषित पढ़कर अपने कार्यक्षेत्र में उस ज्ञान का प्रयोग करता है, वह बहुत लाभ पाता है।)

  • प्रेरणा — आदर्श जीवन गढ़ने की दिशा मिलती है।
  • मार्गदर्शन — कर्तव्य और अकर्तव्य का भेद स्पष्ट होता है।
  • सुख और समृद्धि — जीवन सुखमय बनता है।
  • प्रयोग — पढ़ा हुआ जब कार्यक्षेत्र में उतरता है, तभी वास्तविक लाभ होता है।
सबसे महत्त्वपूर्ण बात: पितामही का बल केवल पठन पर नहीं, प्रयोग पर है — यः … कार्यक्षेत्रे तस्य ज्ञानस्य प्रयोगं करोति सः बहून् लाभान् प्राप्नोति। इसलिए पाठ का शीर्षक भी ‘सुभाषित-रस पीकर जीवन सफल करो’ है — केवल पढ़ो नहीं, आचरण में उतारो।
व्याकरण-सूचना: सुभाषितपठनेन — तृतीया विभक्ति, एकवचन (‘सुभाषित पढ़ने से’) — साधन या कारण बताने में तृतीया आती है।
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