दीपकम् अध्याय 3 सुभाषितानि

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे। स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्॥ १॥ — इस श्लोक का पदच्छेद, अन्वय, अर्थ तथा भाव लिखिए।
उत्तर

स्रोतः — विष्णुपुराणम्। छन्दःउपजाति (प्रति पाद 11 अक्षर; इन्द्रवज्रा और उपेन्द्रवज्रा का मिश्रण)। अलङ्कारःरूपक (भारतभूमि पर ‘स्वर्ग और मोक्ष के मार्ग’ का आरोप) तथा अनुप्रास (भारतभूमिभागे, वन्ति भूयः में ‘भ’ की आवृत्ति)।

पदच्छेदः — गायन्ति। देवाः। किल। गीतकानि। धन्याः। तु। ते। भारतभूमिभागे।
स्वर्गापवर्गास्पद-मार्गभूते। भवन्ति। भूयः। पुरुषाः। सुरत्वात्।

अन्वयः — भारतभूमिभागे (ये) भवन्ति ते धन्याः इति देवाः गीतकानि गायन्ति किल। स्वर्गापवर्गास्पद-मार्गभूते (भारतभूमिभागे) तु (देवाः) सुरत्वात् भूयः पुरुषाः (भवन्ति)।

अर्थः — देवता निश्चय ही यह गीत गाते हैं कि ‘जो भारतभूमि के भाग में जन्म लेते हैं, वे धन्य हैं’। स्वर्ग और मोक्ष — दोनों की प्राप्ति का मार्ग बनी हुई इस भारतभूमि में तो देवता भी अपना देवत्व छोड़कर बार-बार मनुष्य बनते हैं।

पदम्अर्थःहिन्दी
किलनिश्चयेननिश्चय ही
धन्याःप्रशंसिताःप्रशंसा के योग्य
अपवर्गःनिर्वाणम्मोक्ष
आस्पदम्स्थानम्स्थान, आधार
भूयःपुनः पुनःबार-बार
सुरत्वात्देवत्वात्देवत्व से
भावः: जो मनुष्य इस भारतभूमि में जन्म पाते हैं, वे धन्य हैं — ऐसा गुणगान स्वयं देवता करते हैं। अतः हम सब भारतीय भाग्यशाली हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का मार्ग बने इस भूखण्ड में देवता भी देवत्व छोड़कर मनुष्य-रूप में जन्म लेना चाहते हैं। श्लोक का तर्क सीधा है — जिस भूमि को पाने के लिए देवता तक अपना देवपद छोड़ने को तैयार हों, उस भूमि में जन्म लेना कितना बड़ा सौभाग्य है!
समास-विग्रहः: स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते = स्वर्गः च अपवर्गः च (स्वर्गापवर्गौ), तयोः आस्पदम् = स्वर्गापवर्गास्पदम्, तस्य मार्गभूते — अर्थात् ‘स्वर्ग तथा मोक्ष के स्थान का मार्ग बने हुए (भूभाग) में’। भारतभूमिभागे = भारतभूम्याः भागे (षष्ठी तत्पुरुष), सप्तमी विभक्ति, एकवचन।
प्र2.
गुणी गुणं वेत्ति न वेत्ति निर्गुणः बली बलं वेत्ति न वेत्ति निर्बलः। पिको वसन्तस्य गुणं न वायसः करी च सिंहस्य बलं न मूषकः॥ २॥ — इस श्लोक का पदच्छेद, अन्वय, अर्थ तथा भाव लिखिए।
उत्तर

स्रोतः — भर्तृहरेः नीतिशतकम्। छन्दःवंशस्थ (प्रति पाद 12 अक्षर; गण-क्रम — ज त ज र)। अलङ्कारःदृष्टान्त (पूर्वार्ध में सामान्य नियम, उत्तरार्ध में कोयल-कौआ तथा हाथी-चूहा के उदाहरण) तथा छेकानुप्रास (गुणी गुणं, ली लं)।

पदच्छेदः — गुणी। गुणम्। वेत्ति। न। वेत्ति। निर्गुणः। बली। बलम्। वेत्ति। न। वेत्ति। निर्बलः।
पिकः। वसन्तस्य। गुणम्। न। वायसः। करी। च। सिंहस्य। बलम्। न। मूषकः।

अन्वयः — गुणी गुणं वेत्ति। निर्गुणः (गुणं) न वेत्ति। बली बलं वेत्ति, निर्बलः (बलं) न वेत्ति। पिकः वसन्तस्य गुणं (वेत्ति), वायसः (वसन्तस्य गुणं) न (वेत्ति)। करी च सिंहस्य बलं (वेत्ति)। मूषकः (सिंहस्य बलं) न वेत्ति।

अर्थः — गुणवान् व्यक्ति ही गुण को पहचानता है, गुणहीन नहीं पहचानता। बलवान् ही बल को जानता है, बलहीन नहीं जानता। कोयल ही वसन्त के गुण को जानती है, कौआ नहीं; और हाथी ही सिंह के बल को जानता है, चूहा नहीं।

भावः: गुणवान् मनुष्य दूसरों के सद्गुण पहचान लेता है, परन्तु गुणहीन दूसरों के गुण समझ ही नहीं पाता। बलवान् दूसरों का बल आँक लेता है, बलहीन नहीं। वसन्त आने पर कोयल उसके गुण के अनुरूप मधुर कुहू-कुहू करती है, पर कौआ मधुर गा ही नहीं सकता। हाथी पशुराज सिंह के बल को जानता है, पर चूहा उसे जान ही नहीं सकता। निष्कर्ष — योग्य ही योग्यता का महत्त्व जान सकता है, अयोग्य नहीं।
Class 8 के लिए एक विचार: इस श्लोक का उपयोग दूसरों को ‘अयोग्य’ कहने के लिए नहीं है। इसका असली सन्देश यह है कि यदि हम दूसरों के गुण नहीं देख पा रहे, तो सम्भव है कमी हमारी अपनी दृष्टि में हो। इसलिए गुण-ग्रहण की क्षमता स्वयं एक गुण है।
व्याकरण-सूचना: निर्गुणः = निर्गतः गुणः यस्मात् सः (बहुव्रीहि समास) — गुणरहित। पिकः (कोयल), वायसः (कौआ), करी (हाथी), मूषकः (चूहा) — चारों प्रथमा विभक्ति, एकवचन, पुंल्लिङ्ग। वेत्ति — ‘विद्’ धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन।
प्र3.
भवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्गमैर्नवाम्बुभिर्दूरविलम्बिनो घनाः। अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृद्धिभिः स्वभाव एवैष परोपकारिणाम्॥ ३॥ — इस श्लोक का पदच्छेद, अन्वय, अर्थ तथा भाव लिखिए।
उत्तर

स्रोतः — भर्तृहरेः नीतिशतकम्। छन्दःवंशस्थ (प्रति पाद 12 अक्षर)। अलङ्कारःअर्थान्तरन्यास (पहले वृक्ष तथा मेघ के विशेष उदाहरण, फिर अन्तिम पाद में ‘यही परोपकारियों का स्वभाव है’ — सामान्य सिद्धान्त); साथ ही दृष्टान्त

पदच्छेदः — भवन्ति। नम्राः। तरवः। फलोद्गमैः। नवाम्बुभिः। दूरविलम्बिनः। घनाः।
अनुद्धताः। सत्पुरुषाः। समृद्धिभिः। स्वभावः। एव। एषः। परोपकारिणाम्।

अन्वयः — तरवः फलोद्गमैः नम्राः भवन्ति। घनाः नवाम्बुभिः दूरविलम्बिनः (भवन्ति)। सत्पुरुषाः समृद्धिभिः अनुद्धताः (भवन्ति)। परोपकारिणाम् एष एव स्वभावः (भवति)।

अर्थः — वृक्ष फलों के भार से झुक जाते हैं; बादल नए जल से भरकर नीचे की ओर झुक आते हैं; और सज्जन पुरुष सम्पत्ति बढ़ने पर घमण्ड नहीं करते। परोपकारियों का यही स्वभाव होता है।

कौनकिससेक्या होता है
तरवः (वृक्ष)फलोद्गमैः (फलों के भार से)नम्राः — झुक जाते हैं
घनाः (बादल)नवाम्बुभिः (नए जल से)दूरविलम्बिनः — नीचे झुक आते हैं
सत्पुरुषाः (सज्जन)समृद्धिभिः (सम्पत्ति से)अनुद्धताः — गर्वरहित रहते हैं
भावः: समय आने पर वृक्षों में फल लगते हैं और फल के भार से वे वृक्ष झुक जाते हैं। इसी प्रकार नए जल से भरे बादल नीचे झुक आते हैं, धरती की ओर आते हैं और वर्षा करते हैं। संसार में बहुत-से परोपकारी लोग हैं; अपनी समृद्धि के समय वे उद्दण्डता प्रकट नहीं करते। वे सहृदय और विनम्र होकर सदा परोपकार में लगे रहते हैं और परोपकार को व्रत की तरह धारण करते हैं। व्यासमहर्षि ने भी कहा है — परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्।
तर्क को पकड़िए: तीनों उदाहरणों में एक ही नियम काम कर रहा है — जो जितना भरता है, उतना झुकता है। खाली डाल और सूखा बादल तने रहते हैं। इसलिए झुकना दुर्बलता नहीं, सम्पन्नता का चिह्न है। यही कारण है कि विकल्प ‘वृक्षाणां कठोरता’ या ‘परोपकारिणां दुर्बलता’ इस श्लोक का अर्थ नहीं हो सकते।
सन्धि-विच्छेदः: नम्रास्तरवः = नम्राः + तरवः (विसर्गसन्धि)। फलोद्गमैर्नवाम्बुभिः = फलोद्गमैः + नवाम्बुभिः। स्वभाव एवैष = स्वभावः + एव + एषः (विसर्गलोप तथा वृद्धिसन्धि)। अनुद्धताः = न उद्धताः (नञ् तत्पुरुष समास)।
प्र4.
यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते निघर्षणच्छेदनतापताडनैः। तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते कुलेन शीलेन गुणेन कर्मणा॥ ४॥ — इस श्लोक का पदच्छेद, अन्वय, अर्थ तथा भाव लिखिए।
उत्तर

स्रोतः — नीतिपरम्परा का प्रसिद्ध श्लोक (चाणक्यनीति में उपलब्ध)। छन्दःवंशस्थ (प्रति पाद 12 अक्षर)। अलङ्कारःदृष्टान्त (‘यथा … तथा’ से सोने की परीक्षा और मनुष्य की परीक्षा का बिम्ब-प्रतिबिम्ब भाव)।

पदच्छेदः — यथा। चतुर्भिः। कनकम्। परीक्ष्यते। निघर्षण-च्छेदन-ताप-ताडनैः। तथा।
चतुर्भिः। पुरुषः। परीक्ष्यते। कुलेन। शीलेन। गुणेन। कर्मणा।

अन्वयः — यथा निघर्षण-छेदन-ताप-ताडनैः चतुर्भिः (उपायैः) कनकं परीक्ष्यते, तथा कुलेन शीलेन गुणेन कर्मणा (च) चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते।

अर्थः — जैसे घिसना, काटना, तपाना और पीटना — इन चार उपायों से सोने की परीक्षा की जाती है, वैसे ही कुल, शील, गुण और कर्म — इन चार कसौटियों से मनुष्य की परीक्षा की जाती है।

सोने की कसौटीअर्थमनुष्य की कसौटीअर्थ
निघर्षणम्घिसनाकुलेनकिस परिवार में जन्म
छेदनम्काटनाशीलेनकैसा स्वभाव
तापःअग्नि में तपानागुणेनकौन-से गुण
ताडनम्पीटनाकर्मणाकैसे कर्म
भावः: सुनार सोने की शुद्धता आँकने के लिए पहले कसौटी-पत्थर पर उसे घिसता है, फिर उस सोने को काटता है, फिर आग में तपाता है और अन्त में सोने के टुकड़े पर प्रहार करता है। इन चार प्रकारों से परीक्षा करके ही वह सोने की पूर्ण शुद्धता जान पाता है। उसी प्रकार मनुष्य की भी चार उपायों से परीक्षा करनी चाहिए — यह व्यक्ति किस परिवार में जन्मा? इसका स्वभाव कैसा है? यह किन गुणों से युक्त है? और किस कर्म के कारण यह सर्वत्र आदर पाता है? इन्हीं कसौटियों पर परखकर ही किसी का व्यक्तित्व जाना जा सकता है।
ध्यान दीजिए: चारों कसौटियाँ बराबर की नहीं हैं — कुल मनुष्य के हाथ में नहीं है, पर शील, गुण और कर्म उसके अपने बनाए हुए हैं। इसलिए श्लोक चार में से तीन कसौटियाँ ऐसी देता है जिन पर हम स्वयं काम कर सकते हैं। सोने की तरह मनुष्य भी कठिनाई की आँच में ही परखा जाता है।
व्याकरण-सूचना: परीक्ष्यते — कर्मवाच्य (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) — ‘परीक्षा की जाती है’। चतुर्भिः, निघर्षणच्छेदनतापताडनैः, कुलेन, शीलेन, गुणेन, कर्मणा — सभी तृतीया विभक्ति (करण कारक), क्योंकि ये परीक्षा के साधन हैं।
प्र5.
अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति प्रज्ञा च कौल्यं च दमः श्रुतं च। पराक्रमश्चाबहुभाषिता च दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च॥ ५॥ — इस श्लोक का पदच्छेद, अन्वय, अर्थ तथा भाव लिखिए।
उत्तर

स्रोतः — महाभारत की नीतिपरम्परा का सुप्रसिद्ध श्लोक। छन्दःउपजाति (प्रति पाद 11 अक्षर; इन्द्रवज्रा एवं उपेन्द्रवज्रा का मिश्रण — पहले पाद में छन्द की थोड़ी छूट है)। अलङ्कारःरूपक की छाया (‘दीपयन्ति’ में गुणों को दीपक-सदृश कहा गया — गुण मनुष्य को प्रकाशित करते हैं) तथा समुच्चय (एक साथ आठ गुणों का कथन)।

पदच्छेदः — अष्टौ। गुणाः। पुरुषम्। दीपयन्ति। प्रज्ञा। च। कौल्यम्। च। दमः। श्रुतम्। च।
पराक्रमः। च। अबहुभाषिता। च। दानम्। यथाशक्ति। कृतज्ञता। च।

अन्वयः — प्रज्ञा, कौल्यं, दमः, श्रुतं, पराक्रमः, अबहुभाषिता च, यथाशक्ति दानं, कृतज्ञता च (इत्येते) अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति।

अर्थः — आठ गुण मनुष्य को चमकाते हैं — विशिष्ट बुद्धि, अच्छे कुल में जन्म, इन्द्रियों का संयम, शास्त्रों का ज्ञान, पराक्रम, कम किन्तु सार्थक बोलना, सामर्थ्य के अनुसार दान और कृतज्ञता।

क्रमःगुणःअर्थः (संस्कृत)हिन्दी
प्रज्ञाविशेषज्ञानम्विशिष्ट बुद्धि
कौल्यम्कुलीनताअच्छे कुल में जन्म
दमःइन्द्रियसंयमःइन्द्रियों का संयम
श्रुतम्शास्त्रज्ञानम्शास्त्रों का ज्ञान
पराक्रमःसाहसःवीरता
अबहुभाषितामितभाषिताकम और सार्थक बोलना
यथाशक्ति दानम्सामर्थ्यानुसारं दानशीलतासामर्थ्य के अनुसार दान
कृतज्ञताउपकारस्मरणम्किए हुए उपकार को मानना
भावः: इन आठ गुणों से युक्त मनुष्य समाज में सदा सम्मान पाता है। मनुष्य उत्तम गुणों का आश्रय लेकर ही सम्मानित होता है, इसीलिए कहा गया है — गुणवान् पूज्यते नरः। ध्यान देने योग्य बात यह है कि ‘दीपयन्ति’ क्रिया चुनी गई है — गुण मनुष्य को दीपक की तरह प्रकाशित करते हैं; अर्थात् प्रकाश बाहर से नहीं आता, गुणों से भीतर ही जलता है।
समास-विग्रहः: यथाशक्ति = शक्तिम् अनतिक्रम्य (अव्ययीभाव समास) — ‘सामर्थ्य से बाहर जाए बिना’। अबहुभाषिता = न बहुभाषिता (नञ् तत्पुरुष) — बहुत न बोलना। पराक्रमश्चाबहुभाषिता = पराक्रमः + च + अबहुभाषिता (विसर्गसन्धि तथा दीर्घसन्धि)। अष्टौ — संख्यावाचक विशेषण, प्रथमा बहुवचन।
प्र6.
न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः वृद्धा न ते ये न वदन्ति धर्मम्। धर्मः स नो यत्र न सत्यमस्ति सत्यं न तद्यच्छलमभ्युपैति॥ ६॥ — इस श्लोक का पदच्छेद, अन्वय, अर्थ तथा भाव लिखिए।
उत्तर

स्रोतः — महाभारतम्। छन्दःउपजाति (प्रति पाद 11 अक्षर; पहला पाद उपेन्द्रवज्रा, दूसरा इन्द्रवज्रा)। अलङ्कारःअनुप्रास तथा शृंखलाबद्ध (एकावली-सदृश) कथन-शैली — प्रत्येक चरण का अन्तिम पद अगले चरण का विषय बन जाता है : सभा → वृद्ध → धर्म → सत्य।

पदच्छेदः — न। सा। सभा। यत्र। न। सन्ति। वृद्धाः। वृद्धाः। न। ते। ये। न। वदन्ति। धर्मम्।
धर्मः। सः। नो। यत्र। न। सत्यम्। अस्ति। सत्यम्। न। तद्। यद्। छलम्। अभ्युपैति।

अन्वयः — सा सभा न (अस्ति), यत्र वृद्धाः न सन्ति। ते वृद्धाः न (सन्ति), ये धर्मं न वदन्ति। सः धर्मः न उ (अस्ति), यत्र सत्यं न अस्ति। तत् सत्यं न (अस्ति), यत् छलम् अभ्युपैति।

अर्थः — वह सभा, सभा नहीं जहाँ वृद्ध (अनुभवी एवं ज्ञानी जन) न हों। वे वृद्ध, वृद्ध नहीं जो धर्म की बात न कहें। वह धर्म, धर्म नहीं जिसमें सत्य न हो। और वह सत्य, सत्य नहीं जो छल से युक्त हो।

श्रृंखला इस प्रकार बनती है —
सच्ची सभा ← उसमें वृद्ध हों
सच्चे वृद्ध ← जो धर्म कहें
सच्चा धर्म ← जिसमें सत्य हो
सच्चा सत्य ← जिसमें छल न हो
भावः: इस संसार में अनेक प्रकार की सभाएँ होती हैं। सभाओं में लोगों का जमघट होता है, बहुत बोलना चलता है, पर उससे सफलता नहीं मिलती। वस्तुतः वही सभा सफल होती है जिसमें आयु से वृद्ध और ज्ञान से वृद्ध — दोनों प्रकार के जन हों। फिर वे ज्ञानवृद्ध धर्म के विषय में बोलें। और धर्म-सम्बन्धी चर्चा में सत्य ही कहना चाहिए — ऐसा सत्य जो तथ्य से युक्त हो, छलनायुक्त न हो।
यहाँ ‘वृद्ध’ का अर्थ: केवल आयु में बड़ा नहीं। श्लोक स्वयं परिभाषा दे रहा है — वृद्ध वही है जो धर्म की बात कहे। भावार्थ में पुस्तक ने दो शब्द दिए हैं — वयोवृद्धाः (आयु में बड़े) और ज्ञानवृद्धाः (ज्ञान में बड़े)। सभा को दोनों चाहिए।
सन्धि-विच्छेदः: सत्यमस्ति = सत्यम् + अस्ति। तद्यच्छलमभ्युपैति = तत् + यत् + छलम् + अभ्युपैति। अभ्युपैति = अभि + उप + एति (यण् सन्धि ‘अभि + उप’ में, वृद्धि सन्धि ‘उप + एति’ में)। नो = न + उ (‘उ’ अवधारण-अर्थक अव्यय)।
प्र7.
दुर्जनेन समं सख्यं प्रीतिं चापि न कारयेत्। उष्णो दहति चाङ्गारः शीतः कृष्णायते करम्॥ ७॥ — इस श्लोक का पदच्छेद, अन्वय, अर्थ तथा भाव लिखिए।
उत्तर

स्रोतः — चाणक्यनीतिः। छन्दःअनुष्टुप् (श्लोक) — प्रति पाद 8 अक्षर, कुल 32 अक्षर। अलङ्कारःदृष्टान्त (दुर्जन के लिए अङ्गारे का उदाहरण); साथ ही विरोधमूलक चमत्कार — अङ्गारा गरम हो तो जलाता है और ठण्डा हो तो काला करता है, अर्थात् हानि दोनों दशाओं में।

पदच्छेदः — दुर्जनेन। समम्। सख्यम्। प्रीतिम्। च। अपि। न। कारयेत्।
उष्णः। दहति। च। अङ्गारः। शीतः। कृष्णायते। करम्।

अन्वयः — दुर्जनेन समं सख्यं प्रीतिं च अपि न कारयेत्। उष्णः अङ्गारः दहति, शीतः च करं कृष्णायते।

अर्थः — दुष्ट व्यक्ति के साथ न मित्रता करनी चाहिए और न प्रेम। अङ्गारा यदि गरम हो तो हाथ जला देता है, और यदि ठण्डा हो तो हाथ काला कर देता है।

अङ्गारे की अवस्थापरिणामदुर्जन का समानान्तर
उष्णः (गरम)दहति — जला देता हैक्रोध में हो तो प्रत्यक्ष हानि
शीतः (ठण्डा)कृष्णायते — काला कर देता हैशान्त दिखे तब भी बदनामी
भावः: दुर्जन के साथ मैत्री नहीं करनी चाहिए, क्योंकि दुर्जन विश्वास के योग्य नहीं होता। उसके साथ बन्धुता या प्रीति भी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि उस दुर्जन के मुख में मधुरता होती है पर हृदय में कपट। अङ्गारा गरम हो तो ताप से हाथ जला देता है; और यदि वही अङ्गारा ठण्डा हो तो भी हाथ को मैला कर देता है। इसी प्रकार दुर्जन सदा अनिष्ट करता है और कराता भी है। अतः विद्या से अलङ्कृत होने पर भी दुर्जन का त्याग करना चाहिए।
तर्क की सुन्दरता: उपमा केवल ‘दुर्जन जलाता है’ तक नहीं रुकती। कवि दोनों अवस्थाएँ गिनाता है — इससे सिद्ध होता है कि दुर्जन से बचने का कोई ‘सुरक्षित समय’ नहीं होता। यही इस श्लोक का सबसे बलवान् तर्क है।
व्याकरण-सूचना: कारयेत् — विधिलिङ् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन (‘करनी चाहिए’ — उपदेश के अर्थ में)। दुर्जनेन — तृतीया विभक्ति, एकवचन; ‘समम्’ (साथ) के योग में तृतीया आती है। चाङ्गारः = च + अङ्गारः (दीर्घसन्धि)। कृष्णायते — नामधातु (कृष्ण → कृष्णायते ‘काला करता है’), आत्मनेपद।
प्र8.
यथा ह्येकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत्। एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति॥ ८॥ — इस श्लोक का पदच्छेद, अन्वय, अर्थ तथा भाव लिखिए।
उत्तर

स्रोतः — हितोपदेशः। छन्दःअनुष्टुप् (श्लोक) — प्रति पाद 8 अक्षर। अलङ्कारःदृष्टान्त (‘यथा … एवं’) तथा रूपक — भावार्थ में मानव-जीवन को रथ और प्रयत्न एवं भाग्य को उसके दो पहिये कहा गया है।

पदच्छेदः — यथा। हि। एकेन। चक्रेण। न। रथस्य। गतिः। भवेत्।
एवम्। पुरुषकारेण। विना। दैवम्। न। सिध्यति।

अन्वयः — यथा हि एकेन चक्रेण रथस्य गतिः न भवेत्, एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति।

अर्थः — जैसे एक ही पहिये से रथ नहीं चल सकता, वैसे ही पुरुषार्थ के बिना भाग्य सिद्ध नहीं होता (फल नहीं देता)।

मानवरथस्य द्वे चक्रे मानवरथः प्रयत्नः दैवम्
पुस्तक के भावार्थ के अनुसार — प्रयत्न और भाग्य मानव-रूपी रथ के दो पहिये हैं। एक पहिये से रथ नहीं चलता।
भावः: रथ की गति दो पहियों से ही ठीक प्रकार होती है। एक पहिये से रथ का चलना सम्भव नहीं; रथ की गति रुक जाएगी। इसी प्रकार पुरुषार्थ के बिना फल सिद्ध नहीं होता। भाग्य के रहते हुए भी उद्योग से ही फल मिलता है। यहाँ अनुभव किया जाता है कि प्रयत्न और भाग्य — ये मानव-रथ के दो पहिये हैं। कहा भी गया है — उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
व्याकरण-सूचना: ह्येकेन = हि + एकेन (यण् सन्धि)। गतिर्भवेत् = गतिः + भवेत् (विसर्गसन्धि)। एकेन चक्रेण, पुरुषकारेण — तृतीया विभक्ति, एकवचन। ‘विना’ के योग में द्वितीया, तृतीया अथवा पञ्चमी — तीनों विभक्तियाँ हो सकती हैं; यहाँ तृतीया प्रयुक्त है। भवेत् — विधिलिङ् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन।
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