प्र1.
अन्तर्जालात् पुस्तकेभ्यश्च विंशतिसुभाषितानां सङ्ग्रहं कुरुत।
उत्तर
यह संग्रह-कार्य है। इसे आपको स्वयं करना है; नीचे विधि, अच्छे संग्रह की शर्तें और एक नमूना दिया गया है।
करने की विधि —
- एक अलग कॉपी बनाइए और उसका नाम रखिए सुभाषित-सङ्ग्रहः।
- स्रोत तय कीजिए — पुस्तकालय से भर्तृहरि का नीतिशतकम्, हितोपदेशः, चाणक्यनीतिः, पञ्चतन्त्रम्; तथा विश्वसनीय संस्कृत वेबसाइट।
- प्रत्येक सुभाषित के साथ चार बातें अवश्य लिखिए — (क) श्लोक, (ख) पदच्छेद अथवा कठिन शब्दों के अर्थ, (ग) हिन्दी भावार्थ, (घ) स्रोत-ग्रन्थ का नाम।
- बीस श्लोकों को विषय के अनुसार बाँटिए — जैसे परिश्रम, मित्रता, विद्या, विनम्रता, समय, वाणी।
- अन्त में सुन्दर आवरण-पृष्ठ बनाइए और शिक्षक को दिखाइए।
नमूना उत्तर (संग्रह की तीन प्रविष्टियाँ):
| क्र. | सुभाषितम् | भावार्थः (हिन्दी) | स्रोतः |
|---|---|---|---|
| 1 | उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः। न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥ | काम परिश्रम से सिद्ध होते हैं, केवल मन के इरादों से नहीं। सोए हुए सिंह के मुँह में हिरण स्वयं नहीं घुसते। | हितोपदेशः |
| 2 | विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम्। पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम्॥ | विद्या विनय देती है, विनय से योग्यता आती है, योग्यता से धन, धन से धर्म और धर्म से सुख मिलता है। | हितोपदेशः |
| 3 | काकः कृष्णः पिकः कृष्णः को भेदः पिककाकयोः। वसन्तसमये प्राप्ते काकः काकः पिकः पिकः॥ | कौआ भी काला, कोयल भी काली — फिर भेद क्या? वसन्त आने पर पता चलता है — कौआ कौआ ही रहता है और कोयल कोयल। | सुभाषितरत्नभाण्डागारम् |
Tip: तीसरा नमूना पाठ के दूसरे श्लोक (पिक-वायस) से जुड़ जाता है। संग्रह करते समय ऐसे श्लोक चुनिए जो पाठ के भावों से जुड़ें — तब संग्रह केवल सूची नहीं, एक विषय-क्रम बन जाता है।