दीपकम् अध्याय 3 परियोजनाकार्यम्

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
अन्तर्जालात् पुस्तकेभ्यश्च विंशतिसुभाषितानां सङ्ग्रहं कुरुत।
उत्तर

यह संग्रह-कार्य है। इसे आपको स्वयं करना है; नीचे विधि, अच्छे संग्रह की शर्तें और एक नमूना दिया गया है।

करने की विधि —

  1. एक अलग कॉपी बनाइए और उसका नाम रखिए सुभाषित-सङ्ग्रहः
  2. स्रोत तय कीजिए — पुस्तकालय से भर्तृहरि का नीतिशतकम्, हितोपदेशः, चाणक्यनीतिः, पञ्चतन्त्रम्; तथा विश्वसनीय संस्कृत वेबसाइट।
  3. प्रत्येक सुभाषित के साथ चार बातें अवश्य लिखिए — (क) श्लोक, (ख) पदच्छेद अथवा कठिन शब्दों के अर्थ, (ग) हिन्दी भावार्थ, (घ) स्रोत-ग्रन्थ का नाम।
  4. बीस श्लोकों को विषय के अनुसार बाँटिए — जैसे परिश्रम, मित्रता, विद्या, विनम्रता, समय, वाणी।
  5. अन्त में सुन्दर आवरण-पृष्ठ बनाइए और शिक्षक को दिखाइए।

नमूना उत्तर (संग्रह की तीन प्रविष्टियाँ):

क्र.सुभाषितम्भावार्थः (हिन्दी)स्रोतः
1उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
काम परिश्रम से सिद्ध होते हैं, केवल मन के इरादों से नहीं। सोए हुए सिंह के मुँह में हिरण स्वयं नहीं घुसते।हितोपदेशः
2विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम्।
पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम्॥
विद्या विनय देती है, विनय से योग्यता आती है, योग्यता से धन, धन से धर्म और धर्म से सुख मिलता है।हितोपदेशः
3काकः कृष्णः पिकः कृष्णः को भेदः पिककाकयोः।
वसन्तसमये प्राप्ते काकः काकः पिकः पिकः॥
कौआ भी काला, कोयल भी काली — फिर भेद क्या? वसन्त आने पर पता चलता है — कौआ कौआ ही रहता है और कोयल कोयल।सुभाषितरत्नभाण्डागारम्
Tip: तीसरा नमूना पाठ के दूसरे श्लोक (पिक-वायस) से जुड़ जाता है। संग्रह करते समय ऐसे श्लोक चुनिए जो पाठ के भावों से जुड़ें — तब संग्रह केवल सूची नहीं, एक विषय-क्रम बन जाता है।
प्र2.
किमपि नीतिवाक्यम् अधिकृत्य पञ्चवाक्यानि संस्कृतेन लिखत।
उत्तर

किसी एक नीतिवाक्य को चुनकर उसके विषय में संस्कृत में पाँच वाक्य लिखने हैं।

अच्छे उत्तर में क्या होना चाहिए —

  • पहला वाक्य में नीतिवाक्य का उल्लेख;
  • दूसरे-तीसरे वाक्य में उसका अर्थ तथा एक उदाहरण;
  • चौथे वाक्य में उससे मिलने वाली शिक्षा;
  • पाँचवें वाक्य में अपने जीवन से जोड़कर निष्कर्ष;
  • वाक्य छोटे और शुद्ध हों — कर्ता और क्रिया का वचन-मेल अवश्य जाँचिए।

नमूना उत्तर (नीतिवाक्यम् — ‘उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः’):

1. ‘उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः’ इति सुप्रसिद्धं नीतिवाक्यम् अस्ति।
2. अस्य अर्थः अस्ति — कार्याणि परिश्रमेण एव सिध्यन्ति, केवलं चिन्तनेन न सिध्यन्ति।
3. यथा — सुप्तस्य सिंहस्य मुखे मृगाः स्वयं न प्रविशन्ति, सिंहेन उद्यमः करणीयः एव।
4. अतः छात्रैः प्रतिदिनम् अध्ययने परिश्रमः करणीयः, केवलं सफलतायाः स्वप्नः न द्रष्टव्यः।
5. अहम् अपि प्रतिदिनं नियमेन पठामि, यतः उद्यमेन एव लक्ष्यं प्राप्यते।
अन्य नीतिवाक्य जिन पर लिखा जा सकता है: सत्यमेव जयते · विद्या ददाति विनयम् · परोपकारः पुण्याय · गुणवान् पूज्यते नरः · अहिंसा परमो धर्मः। इनमें से अन्तिम दो इसी पाठ में आए हैं।
प्र3.
पाठे आगतानि सुभाषितानि कण्ठस्थीकृत्य कक्षायां श्रावयत।
उत्तर

पाठ के आठों सुभाषित कण्ठस्थ करके कक्षा में सुनाने हैं। यह कार्य आपको स्वयं करना है — नीचे याद करने और सुनाने की विधि दी गई है।

कण्ठस्थ करने की विधि —

  1. पहले अर्थ समझिए, फिर याद कीजिए। बिना अर्थ के याद किया श्लोक जल्दी भूल जाता है।
  2. श्लोक को पाद-पाद करके याद कीजिए — पहले पाद 1, फिर 1+2, फिर 1+2+3, फिर पूरा।
  3. छन्द के अनुसार गाइए — अनुष्टुप् (8 अक्षर) वाले श्लोक 7, 8 सबसे सरल हैं, इन्हीं से आरम्भ कीजिए; फिर वंशस्थ (12 अक्षर) वाले 2, 3, 4; अन्त में उपजाति (11 अक्षर) वाले 1, 5, 6।
  4. प्रतिदिन दो श्लोक लीजिए — चार दिन में आठों याद हो जाएँगे। पाँचवें दिन सब दोहराइए।

सुनाते समय ध्यान रखने योग्य बातें —

  • उच्चारण शुद्ध हो — विशेषकर ष / श / स तथा का उच्चारण।
  • पाद के अन्त में (‘।’ पर) थोड़ा विराम लीजिए, श्लोक के अन्त में (‘॥’ पर) कुछ अधिक।
  • सस्वर पाठ कीजिए — स्वर लगाने से श्लोक भी सुन्दर लगता है और स्मरण भी पक्का होता है।
  • सुनाने के बाद एक वाक्य में उसका भावार्थ भी कहिए — इससे सुनने वालों को भी लाभ होगा।
Try This: कक्षा में दो दलों में श्लोक-अन्ताक्षरी कीजिए — एक दल श्लोक का पहला पाद बोले, दूसरा दल शेष तीन पाद पूरे करे। इससे आठों सुभाषित खेल-खेल में पक्के हो जाएँगे।
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