दीपकम् अध्याय 4 अभ्यासात् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
गोपबन्धुः किमर्थम् अश्रुपूर्णनयनः अभवत् ?
उत्तर

दिनत्रयात् किमपि अभुक्तवतः बुभुक्षितस्य भिक्षुकस्य करुणध्वनिं श्रुत्वा दयाविगलितहृदयः गोपबन्धुः अश्रुपूर्णनयनः अभवत् ।
[तीन दिन से कुछ भी न खाए हुए भूखे भिखारी की करुण पुकार सुनकर, दया से पिघले हुए हृदय वाले गोपबन्धु की आँखें आँसुओं से भर गईं।]

पाठ की पंक्ति देखिए (पृष्ठ 38): ‘मातः, मातः ! बुभुक्षितोऽस्मि, कृपया किञ्चित् भोजनं देहि। दिनत्रयात् किमपि न भुक्तम्। … आँ आँ …’ — इति क्रन्दनध्वनिं श्रुत्वैव दयाविगलितहृदयः गोपबन्धुः अश्रुपूर्णनयनोऽभवत्। उत्तर में यही कारण एक वाक्य में समेटा गया है — कारण पहले, फिर परिणाम।
व्याकरण-बिन्दु: श्रुत्वा (श्रु + क्त्वा) ‘सुनकर’ — क्त्वा प्रत्यय तब लगता है जब एक ही कर्ता के दो काम हों और पहला काम पहले पूरा हो। ‘श्रुत्वैव’ = श्रुत्वा + एव (वृद्धि सन्धि: आ + ए = ऐ), अर्थात् ‘सुनते ही’।
प्र2.
कीदृशं पुत्रं विहाय गोपबन्धुः समाजसेवाम् अकरोत् ?
उत्तर

मरणासन्नं स्वपुत्रं विहाय गोपबन्धुः समाजसेवाम् अकरोत् ।
[मृत्यु के निकट पहुँचे हुए अपने पुत्र को भी छोड़कर गोपबन्धु ने समाजसेवा की।]

प्रश्न का ढंग: कीदृशम् का अर्थ है ‘कैसा’ — अर्थात् उत्तर में पुत्र का विशेषण देना है, नाम नहीं। इसीलिए उत्तर ‘मरणासन्नम्’ से आरम्भ होता है। ‘कीदृशं पुत्रम्’ और ‘मरणासन्नं स्वपुत्रम्’ — दोनों द्वितीया विभक्ति, एकवचन, पुंलिङ्ग में हैं, क्योंकि ‘विहाय’ (छोड़कर) का कर्म यही है।
इस उत्तर का भाव: पाठ कहता है कि वे ‘भारतमातुः सहस्रशः पुत्रान्’ को देखने गए — अर्थात् उनके लिए जलप्लावपीड़ित लोग भी अपने ही पुत्र थे। यही वह त्याग है जिसके कारण उन्हें महामनाः और प्रणम्यः कहा गया।
प्र3.
गोपबन्धोः कृते उत्कलमणिः इति उपाधिः किमर्थं प्रदत्तः ?
उत्तर

समाजसेवायै देशसेवायै च तस्य असीमं त्यागम् अनुभवन् वैज्ञानिकः आचार्यः प्रफुल्लचन्द्ररायः गोपबन्धुम् ‘उत्कलमणिः’ इति उपाधिना सम्मानितवान् ।
[समाजसेवा और देशसेवा के लिए किए गए उनके अपार त्याग को अनुभव करके वैज्ञानिक आचार्य प्रफुल्लचन्द्रराय ने गोपबन्धु को ‘उत्कलमणि’ उपाधि से सम्मानित किया।]

चतुर्थी का सुन्दर प्रयोग: समाजसेवायै और देशसेवायै — दोनों चतुर्थी विभक्ति, एकवचन, स्त्रीलिङ्ग हैं। संस्कृत में ‘किसके लिए’ (प्रयोजन) बताने के लिए चतुर्थी आती है, इसलिए प्रश्न का ‘किमर्थम्’ इन्हीं दो पदों से उत्तरित हो जाता है।
तिथि (योग्यताविस्तरः, पृष्ठ 47): पुस्तक के जीवन-परिचय के अनुसार यह सम्मान १९२४ में मिला। ‘उत्कल’ = ओडिशा का प्राचीन नाम, ‘मणि’ = रत्न — अर्थात् ‘ओडिशा का रत्न’।
प्र4.
गोपबन्धुः कुत्र जन्म लब्धवान् ?
उत्तर

गोपबन्धुः ओडिशाराज्यस्य पुरीजनपदस्य साक्षीगोपालसमीपे सुआण्डो-ग्रामे जन्म लब्धवान् ।
[गोपबन्धु ने ओडिशा राज्य के पुरी जनपद में साक्षीगोपाल के पास सुआण्डो गाँव में जन्म लिया।]

सप्तमी क्यों ? प्रश्नशब्द कुत्र (कहाँ) स्थान पूछता है, और स्थान बताने के लिए सप्तमी विभक्ति आती है — ग्रामे (सुआण्डो-ग्रामे), समीपे (साक्षीगोपालसमीपे)। ‘ओडिशाराज्यस्य’ और ‘पुरीजनपदस्य’ षष्ठी में हैं, क्योंकि वे बड़े क्षेत्र से छोटे क्षेत्र का सम्बन्ध बताते हैं।
तिथि (योग्यताविस्तरः, पृष्ठ 47): पुस्तक जन्म-तिथि ०९/१०/१८७७ देती है और जन्मस्थान — सुआण्डो-ग्रामः, पुरी-जनपदः, ओडिशाराज्यम्। पिता दैत्यारिदास और माता स्वर्णमयी देवी थीं।
प्र5.
गोपबन्धुः सर्वदा केषाम् उपयोगं कृतवान् ?
उत्तर

गोपबन्धुः सर्वदा स्वदेशस्यैव वस्त्राणां वस्तूनां च उपयोगं कृतवान् ।
[गोपबन्धु ने सदा अपने ही देश के वस्त्रों और वस्तुओं का उपयोग किया।]

षष्ठी का प्रयोग: प्रश्न में केषाम् षष्ठी विभक्ति, बहुवचन है — ‘किनका’। ‘उपयोगः’ के साथ जिसका उपयोग हो, वह षष्ठी में आता है; इसलिए उत्तर में वस्त्राणां वस्तूनां च — दोनों षष्ठी बहुवचन। ‘स्वदेशस्यैव’ = स्वदेशस्य + एव (वृद्धि सन्धि: अ + ए = ऐ), ‘एव’ यहाँ ज़ोर देता है — ‘अपने ही देश के’।
जोड़कर देखिए: इसी स्वदेशी-भावना से वे कार्पासवस्त्रनिर्माणाय सः स्वयमेव सूत्रप्रस्तुतिमकरोत्। — कपास के वस्त्र बनाने के लिए स्वयं सूत कातते थे। यह महात्मा गान्धी के स्वदेशी-आन्दोलन का ही आचरण है।
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