दीपकम् अध्याय 4 अभ्यासात् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
समाज-दिनपत्रिकायाः प्रतिष्ठाता कः ?
उत्तर

गोपबन्धुदासः ।
[‘समाज’ दैनिक पत्रिका के संस्थापक गोपबन्धुदास थे।]

उत्तर की विभक्ति: प्रश्न में कः (कौन) है — प्रथमा विभक्ति, एकवचन, पुंलिङ्ग। अतः उत्तर भी प्रथमा एकवचन में ही आएगा — गोपबन्धुदासः, न कि ‘गोपबन्धुदासम्’ या ‘गोपबन्धुदासेन’। ‘समाज-दिनपत्रिकायाः’ षष्ठी एकवचन है — ‘किसका प्रतिष्ठाता’ यह बताने के लिए।
पाठ का आधार (पृष्ठ 41): असौ सत्यवादि-वनविद्यालयस्य, दरिद्रनारायणसेवा-सङ्घस्य, सत्यवादि-मुद्रणालयस्य, समाजः इति दैनिक-वार्तापत्रस्य च प्रतिष्ठाता आसीत्। पुस्तक यह भी बताती है कि ‘समाजः’ दिनपत्रिका सौ वर्ष से अधिक समय से आज भी प्रतिदिन प्रकाशित होती है।
प्र2.
गोपबन्धुः कस्मै स्वभोजनं दत्तवान् ?
उत्तर

भिक्षुकाय ।
[गोपबन्धु ने अपना भोजन भिखारी को दिया।]

चतुर्थी क्यों ? प्रश्न में कस्मै है — यह ‘किम्’ शब्द का चतुर्थी विभक्ति, एकवचन, पुंलिङ्ग रूप है। ‘देना’ (दा धातु) के साथ जिसे दिया जाता है वह सम्प्रदान कहलाता है और उसमें चतुर्थी आती है — इसलिए उत्तर भी चतुर्थी में भिक्षुकाय ही होगा।
पाठ का आधार (पृष्ठ 38): किमपि अविचिन्त्य झटिति स्वस्मै परिवेषितं भोजनं हस्ते गृहीत्वा बहिरागतवान्। भिक्षुकञ्च तद्भोजितवान्। — बिना कुछ सोचे, अपने लिए परोसा हुआ भोजन हाथ में लेकर वे तुरन्त बाहर गए और भिखारी को वही खिला दिया।
प्र3.
मरणासन्नः कः आसीत् ?
उत्तर

गोपबन्धोः पुत्रः । (एकपदेन — पुत्रः ।)
[गोपबन्धु का अपना पुत्र मरणासन्न था।]

शब्द का अर्थ: मरणासन्नः = मरण + आसन्नः — ‘जो मृत्यु के निकट है’। यह पद प्रथमा एकवचन पुंलिङ्ग में है, इसलिए उत्तर भी उसी रूप में — ‘पुत्रः’। ‘गोपबन्धोः’ षष्ठी एकवचन है (गोपबन्धु का)।
पाठ का आधार (पृष्ठ 39): मरणासन्नं स्वपुत्रमपि विहाय जलप्लावपीडितान् भारतमातुः सहस्रशः पुत्रान् द्रष्टुं गृहात् बहिः निर्गतः समाजमसेवत च। — यही इस पाठ का सबसे मार्मिक वाक्य है: अपने एक मरणासन्न पुत्र को छोड़कर वे ‘भारतमाता के हज़ारों पुत्रों’ की सेवा करने निकल पड़े।
प्र4.
गोपबन्धुः केन उपाधिना सम्मानितः अभवत् ?
उत्तर

‘उत्कलमणिः’ इति उपाधिना ।
[गोपबन्धु ‘उत्कलमणि’ उपाधि से सम्मानित हुए।]

तृतीया क्यों ? प्रश्नशब्द केन तृतीया विभक्ति, एकवचन है — ‘किस साधन से’। सम्मान जिस उपाधि ‘से’ मिला, वह करण है; अतः उत्तर भी तृतीया में — उपाधिना। उपाधि का नाम ‘इति’ के साथ ज्यों का त्यों (प्रथमा में) रहता है — उत्कलमणिः इति उपाधिना
किसने दी ? पाठ (पृष्ठ 41) के अनुसार — समाजसेवायै देशसेवायै च तस्य असीमं त्यागमनुभवन् वैज्ञानिकः आचार्यः प्रफुल्लचन्द्ररायः गोपबन्धुम् उत्कलमणिः इति उपाधिना सम्मानितवान्। ‘उत्कल’ ओडिशा का प्राचीन नाम है, अतः ‘उत्कलमणि’ का अर्थ है — ओडिशा की मणि।
प्र5.
गोपबन्धुः कति वर्षाणि कारावासं प्राप्तवान् ?
उत्तर

वर्षद्वयम् । (द्वे वर्षे ।)
[गोपबन्धु ने दो वर्ष का कारावास भोगा।]

पाठ का वाक्य: सः वर्षद्वयं यावत् कारावासं प्राप्तवान्। यहाँ यावत् का अर्थ है ‘तक’ — अर्थात् दो वर्ष तक। ‘वर्षद्वयम्’ द्विगु समास है (द्वयोः वर्षयोः समाहारः), और कालवाची होने से द्वितीया विभक्ति में आया है — संस्कृत में ‘कितने समय तक’ बताने के लिए द्वितीया ही लगती है।
सन्दर्भ: यह कारावास स्वतन्त्रता-आन्दोलन के कारण हुआ — महात्मगान्धेः प्रेरणया भारतीयस्वतन्त्रतान्दोलने गोपबन्धुः भागं गृहीतवान्। कारागार में रहकर ही उन्होंने ‘बन्दीर आत्मकथा’ और ‘कारा-कविता’ जैसी पुस्तकें ओडिआ भाषा में लिखीं।
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