दीपकम् अध्याय 4 अत्र इदम् अवधेयम्

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
पूर्वरूपसन्धिः — पदस्य अन्ते यदा “ए”कारः अथवा “ओ”कारः भवति, तदनन्तरम् अग्रिमपदस्य प्रथमवर्णः “अ”कारः भवति तदा पूर्वरूपसन्धिः भवति। तत्र “अ”कारस्य स्थाने “ऽ” इति अवग्रहचिह्नस्य प्रयोगः भवति। — नियमम् उदाहरणैः सह स्पष्टीकुरुत।
उत्तर

नियमः — जब पहले पद के अन्त में या हो और उसके तुरन्त बाद वाले पद का पहला वर्ण हो, तब वह ‘अ’ लुप्त हो जाता है और पहला पद ज्यों का त्यों (पूर्वरूप में) बना रहता है। लुप्त हुए ‘अ’ के स्थान पर अवग्रह-चिह्न ‘ऽ’ लिख दिया जाता है। इसीलिए इसे पूर्वरूपसन्धि कहते हैं — क्योंकि सन्धि में ‘पूर्व’ (पहला) रूप ही बचता है।

पदद्वयम् (विच्छेदः)सन्धिपदम्अन्त्यवर्णःपाठे कुत्र आगतम्
देशभक्तो + अयम्देशभक्तोऽयम्ओ + अपाठस्य शीर्षकश्लोके
सर्वे + अपिसर्वेऽपिए + अउदाहरणम् (पृष्ठ 44)
पशवो + अपिपशवोऽपिओ + अ‘बहवः गृहपालिताः पशवोऽपि …’
बुभुक्षितो + अस्मिबुभुक्षितोऽस्मिओ + अभिक्षुकस्य क्रन्दने
अश्रुपूर्णनयनो + अभवत्अश्रुपूर्णनयनोऽभवत्ओ + अगोपबन्धोः वर्णने
‘ओ’ आया कहाँ से ? ‘देशभक्तः’, ‘पशवः’, ‘बुभुक्षितः’ — इन सबके अन्त में मूलतः विसर्ग है। जब आगे कोई घोष वर्ण (यहाँ ‘अ’) आता है तो पहले विसर्गसन्धि से ‘अः’ का ‘ओ’ बनता है (देशभक्तः → देशभक्तो), और उसके बाद यह पूर्वरूपसन्धि लगती है। अर्थात् एक ही जगह पर दो सन्धियाँ क्रम से काम करती हैं।
लिखने की सावधानी: अवग्रह ‘ऽ’ को कभी भी ‘ड’ या ‘S’ जैसा मत लिखिए, और उसे पदान्त में स्थान (space) देकर अलग मत कीजिए — समादृतोऽस्ति एक ही पद है। अभ्यास के लिए स्वयं सन्धि कीजिए — ते + अपि = तेऽपि, कुतो + अपि = कुतोऽपि, सो + अयम् = सोऽयम्, एको + अपि = एकोऽपि
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ