कक्षा ८ संस्कृत अध्याय 4 अत्र इदम् अवधेयम् के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-19

प्र1.
पूर्वरूपसन्धिः — पदस्य अन्ते यदा “ए”कारः अथवा “ओ”कारः भवति, तदनन्तरम् अग्रिमपदस्य प्रथमवर्णः “अ”कारः भवति तदा पूर्वरूपसन्धिः भवति। तत्र “अ”कारस्य स्थाने “ऽ” इति अवग्रहचिह्नस्य प्रयोगः भवति। — नियमम् उदाहरणैः सह स्पष्टीकुरुत।
उत्तर

नियमः — जब पहले पद के अन्त में ए या ओ हो और उसके तुरन्त बाद वाले पद का पहला वर्ण अ हो, तब वह ‘अ’ लुप्त हो जाता है और पहला पद ज्यों का त्यों (पूर्वरूप में) बना रहता है। लुप्त हुए ‘अ’ के स्थान पर अवग्रह-चिह्न ‘ऽ’ लिख दिया जाता है। इसीलिए इसे पूर्वरूपसन्धि कहते हैं — क्योंकि सन्धि में ‘पूर्व’ (पहला) रूप ही बचता है।

पदद्वयम् (विच्छेदः)सन्धिपदम्अन्त्यवर्णःपाठे कुत्र आगतम्
देशभक्तो + अयम्देशभक्तोऽयम्ओ + अपाठस्य शीर्षकश्लोके
सर्वे + अपिसर्वेऽपिए + अउदाहरणम् (पृष्ठ 44)
पशवो + अपिपशवोऽपिओ + अ‘बहवः गृहपालिताः पशवोऽपि …’
बुभुक्षितो + अस्मिबुभुक्षितोऽस्मिओ + अभिक्षुकस्य क्रन्दने
अश्रुपूर्णनयनो + अभवत्अश्रुपूर्णनयनोऽभवत्ओ + अगोपबन्धोः वर्णने
‘ओ’ आया कहाँ से ? ‘देशभक्तः’, ‘पशवः’, ‘बुभुक्षितः’ — इन सबके अन्त में मूलतः विसर्ग है। जब आगे कोई घोष वर्ण (यहाँ ‘अ’) आता है तो पहले विसर्गसन्धि से ‘अः’ का ‘ओ’ बनता है (देशभक्तः → देशभक्तो), और उसके बाद यह पूर्वरूपसन्धि लगती है। अर्थात् एक ही जगह पर दो सन्धियाँ क्रम से काम करती हैं।
लिखने की सावधानी: अवग्रह ‘ऽ’ को कभी भी ‘ड’ या ‘S’ जैसा मत लिखिए, और उसे पदान्त में स्थान (space) देकर अलग मत कीजिए — समादृतोऽस्ति एक ही पद है। अभ्यास के लिए स्वयं सन्धि कीजिए — ते + अपि = तेऽपि, कुतो + अपि = कुतोऽपि, सो + अयम् = सोऽयम्, एको + अपि = एकोऽपि।
क्या यह उपयोगी रहा?