दीपकम् अध्याय 4 पाठगतौ श्लोकौ

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
स्वदेशभूमौ मम लीयतां तनुः, स्वदेशलोकास्तदनु प्रयान्तु नु। स्वराज्यमार्गे यदि गर्तमालिका, ममास्थिमांसैः परिपूरितास्तु सा॥ — अस्य श्लोकस्य पदच्छेदम् अन्वयम् अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर

पदच्छेदः — स्वदेशभूमौ, मम, लीयताम्, तनुः, स्वदेशलोकाः, तदनु, प्रयान्तु, नु, स्वराज्यमार्गे, यदि, गर्तमालिका, मम, अस्थिमांसैः, परिपूरिता, अस्तु, सा।

अन्वयः — मम तनुः स्वदेशभूमौ लीयताम्। तदनु स्वदेशलोकाः नु प्रयान्तु। यदि स्वराज्यमार्गे गर्तमालिका (अस्ति), सा मम अस्थिमांसैः परिपूरिता अस्तु।

अर्थः — मेरा शरीर अपने देश की मिट्टी में विलीन हो जाए, और उसके बाद (उसी मिट्टी पर चलते हुए) देशवासी आगे बढ़ें। यदि स्वराज्य के मार्ग में गड्ढों की शृङ्खला हो, तो वह मेरी हड्डियों और माँस से भर जाए।

भावः — यह गोपबन्धुदास का प्रसिद्ध वचन है, जो मूल रूप में ओडिआ भाषा में है — ‘मिशु मोर देह ए देश माटिरे…’। पुस्तक ने पृष्ठ 41 पर इसका भावार्थ यों दिया है — स्वदेशस्य भूमिभागे मम शरीरं विलीनं भवतु। देशवासिनः मम अनुसरणं कुर्वन्तु। देशस्य स्वतन्त्रतानिमित्तं यत्र यत्र प्रतिबन्धकाः गर्ताः सन्ति, ते सर्वे गर्ताः मम अस्थिभिः मांसैश्च परिपूर्णाः भवन्तु। कवि अपने लिए कुछ नहीं माँगता — न यश, न सुख; वह केवल इतना चाहता है कि उसका शरीर भी देश के काम आए। स्वतन्त्रता के मार्ग में जो बाधाएँ (गड्ढे) हैं, उन्हें वह अपने शरीर से पाटना चाहता है, ताकि उसके बाद आने वाले लोग सरलता से आगे चल सकें।

भाषा कैसे काम करती है: गर्तमालिका यहाँ रूपक है — स्वराज्य के मार्ग की कठिनाइयों को सड़क के गड्ढों की शृङ्खला कहा गया है। लीयताम्, प्रयान्तु, अस्तु — तीनों लोट् लकार (आज्ञा/प्रार्थना) के रूप हैं, इसलिए पूरा श्लोक माँग नहीं, संकल्प-प्रार्थना बन जाता है। अस्थिमांसैः तृतीया बहुवचन है — ‘किससे भरे’ यह बताने के लिए करण में तृतीया आई।
सन्धि देखिए: स्वदेशलोकाः + तदनु = स्वदेशलोकास्तदनु (विसर्गसन्धि — ‘त’ से पहले विसर्ग का ‘स्’ हो गया); मम + अस्थिमांसैः = ममास्थिमांसैः (दीर्घ/सवर्णदीर्घ सन्धि — अ + अ = आ)।
प्र2.
उत्कलमणिरित्याख्यः प्रसिद्धो लोकसेवकः। प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः॥ — अस्य श्लोकस्य पदच्छेदम् अन्वयम् अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर

पदच्छेदः — उत्कलमणिः, इति, आख्यः, प्रसिद्धः, लोकसेवकः, प्रणम्यः, देशभक्तः, अयम्, गोपबन्धुः, महामनाः।

अन्वयः — ‘उत्कलमणिः’ इति आख्यः प्रसिद्धः लोकसेवकः महामनाः अयं देशभक्तः गोपबन्धुः प्रणम्यः (अस्ति)।

अर्थः — जिनका नाम ‘उत्कलमणि’ है, जो प्रसिद्ध लोकसेवक और उच्च विचारों वाले हैं — ये देशभक्त गोपबन्धु प्रणाम करने योग्य हैं।

भावः — यही श्लोक इस पाठ का शीर्षक भी है। इसमें गोपबन्धु के तीन परिचय एक साथ रखे गए हैं — उपाधि (उत्कलमणिः), कर्म (प्रसिद्धः लोकसेवकः) और मन (महामनाः)। इन तीनों के कारण वे केवल स्मरणीय नहीं, प्रणम्य (प्रणाम के योग्य) हैं। कवि कहना चाहता है कि सच्ची महानता पद या धन से नहीं, निःस्वार्थ जनसेवा से बनती है।

‘प्रणम्यः’ का व्याकरण: यह कृत्य-प्रत्ययान्त (प्र + नम् + ण्यत्) पद है, जिसका अर्थ होता है ‘जिसे प्रणाम करना चाहिए’। ऐसे पद कर्तव्य बताते हैं — पूज्यः (पूजने योग्य), वन्द्यः (वन्दना योग्य), पठनीयः (पढ़ने योग्य)। तीनों पद प्रथमा विभक्ति, एकवचन, पुंलिङ्ग में हैं, क्योंकि ये ‘गोपबन्धुः’ के विशेषण हैं।
सन्धि: उत्कलमणिः + इति = उत्कलमणिरिति (विसर्ग का ‘र्’), इति + आख्यः = इत्याख्यः (यण् सन्धि — इ + आ = य्), देशभक्तः + अयम् = देशभक्तोऽयम् (पूर्वरूपसन्धि), गोपबन्धुः + महामनाः = गोपबन्धुर्महामनाः (विसर्ग का ‘र्’)।
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