पदच्छेदः — स्वदेशभूमौ, मम, लीयताम्, तनुः, स्वदेशलोकाः, तदनु, प्रयान्तु, नु, स्वराज्यमार्गे, यदि, गर्तमालिका, मम, अस्थिमांसैः, परिपूरिता, अस्तु, सा।
अन्वयः — मम तनुः स्वदेशभूमौ लीयताम्। तदनु स्वदेशलोकाः नु प्रयान्तु। यदि स्वराज्यमार्गे गर्तमालिका (अस्ति), सा मम अस्थिमांसैः परिपूरिता अस्तु।
अर्थः — मेरा शरीर अपने देश की मिट्टी में विलीन हो जाए, और उसके बाद (उसी मिट्टी पर चलते हुए) देशवासी आगे बढ़ें। यदि स्वराज्य के मार्ग में गड्ढों की शृङ्खला हो, तो वह मेरी हड्डियों और माँस से भर जाए।
भावः — यह गोपबन्धुदास का प्रसिद्ध वचन है, जो मूल रूप में ओडिआ भाषा में है — ‘मिशु मोर देह ए देश माटिरे…’। पुस्तक ने पृष्ठ 41 पर इसका भावार्थ यों दिया है — स्वदेशस्य भूमिभागे मम शरीरं विलीनं भवतु। देशवासिनः मम अनुसरणं कुर्वन्तु। देशस्य स्वतन्त्रतानिमित्तं यत्र यत्र प्रतिबन्धकाः गर्ताः सन्ति, ते सर्वे गर्ताः मम अस्थिभिः मांसैश्च परिपूर्णाः भवन्तु। कवि अपने लिए कुछ नहीं माँगता — न यश, न सुख; वह केवल इतना चाहता है कि उसका शरीर भी देश के काम आए। स्वतन्त्रता के मार्ग में जो बाधाएँ (गड्ढे) हैं, उन्हें वह अपने शरीर से पाटना चाहता है, ताकि उसके बाद आने वाले लोग सरलता से आगे चल सकें।