दीपकम् अध्याय 4 अभ्यासात् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
‘सेवाम्’ इति पदम् उपयुज्य वाक्यं रचयत।
उत्तर

गोपबन्धुः जलप्लावपीडितानाम् अकुण्ठं सेवाम् अकरोत् ।
[गोपबन्धु ने बाढ़-पीड़ितों की मन लगाकर सेवा की।]

वाक्य कैसे बनाएँ: ‘सेवाम्’ द्वितीया विभक्ति, एकवचन, स्त्रीलिङ्ग है — यानी यह वाक्य में कर्म बनेगा और उसके साथ ‘करोति / अकरोत् / कृत्वा’ जैसी क्रिया चाहिए। पहले कर्ता चुनिए (गोपबन्धुः), फिर किसकी सेवा — षष्ठी (जलप्लावपीडितानाम्), फिर क्रिया।
अन्य सम्भव वाक्य: मातापित्रोः सेवां कुर्मः। · सैनिकाः देशस्य सेवां कुर्वन्ति। · अस्माभिः रोगिणां सेवां कर्तव्या।
प्र2.
‘सुस्वादूनि’ इति पदम् उपयुज्य वाक्यं रचयत।
उत्तर

कदलीपत्रेषु सुस्वादूनि व्यञ्जनानि परिवेषितानि ।
[केले के पत्तों पर स्वादिष्ट व्यञ्जन परोसे गए।]

विशेषण-विशेष्य का मेल: सुस्वादूनि नपुंसकलिङ्ग, प्रथमा/द्वितीया, बहुवचन है — इसलिए इसके साथ विशेष्य भी नपुंसकलिङ्ग बहुवचन ही आना चाहिए, जैसे व्यञ्जनानि, फलानि, भोजनानि। संस्कृत का नियम है — विशेषण अपने विशेष्य के लिङ्ग, वचन और विभक्ति का अनुसरण करता है।
पाठ का वाक्य (पृष्ठ 38): बहूनि सुस्वादूनि व्यञ्जनानि कदलीपत्रेषु परिवेषितानि। — यही भोजनसभा का दृश्य है, जिसके बीच भिक्षुक की पुकार सुनाई देती है।
प्र3.
‘सहायताम्’ इति पदम् उपयुज्य वाक्यं रचयत।
उत्तर

अस्माभिः एतादृशानां दुःखितानां सहायतां करणीया ।
[हमें ऐसे दुःखी लोगों की सहायता करनी चाहिए।]

कर्मवाच्य का ढाँचा: जब कर्तव्य बताना हो तो कर्ता तृतीया में (अस्माभिः) और कर्म प्रथमा में आता है; पर यहाँ पुस्तक का पद ‘सहायताम्’ द्वितीया में दिया है, अतः कर्तृवाच्य वाक्य भी उतना ही ठीक है — वयं दुःखितानां सहायतां कुर्मः। दोनों में से कोई एक लिखिए।
अन्य सम्भव वाक्य: छात्राः वृद्धस्य सहायतां कुर्वन्ति। · जलप्लावपीडितानां सहायतार्थं वयं धनं दद्मः।
प्र4.
‘स्वदेशवस्त्राणि’ इति पदम् उपयुज्य वाक्यं रचयत।
उत्तर

गोपबन्धुः सर्वदा स्वदेशवस्त्राणि एव धारितवान् ।
[गोपबन्धु ने सदा अपने देश के बने वस्त्र ही पहने।]

पद की पहचान: स्वदेशवस्त्राणि नपुंसकलिङ्ग, बहुवचन है और यहाँ द्वितीया विभक्ति (कर्म) में प्रयुक्त है — ‘वस्त्रों को पहना’। नपुंसकलिङ्ग में प्रथमा और द्वितीया बहुवचन का रूप एक ही (–आनि) होता है, इसलिए क्रिया देखकर ही तय होता है कि वह कर्ता है या कर्म।
अन्य सम्भव वाक्य: वयं स्वदेशवस्त्राणि धारयामः। · स्वदेशवस्त्राणि देशस्य उन्नतिं वर्धयन्ति।
प्र5.
‘अन्यतमः’ इति पदम् उपयुज्य वाक्यं रचयत।
उत्तर

गोपबन्धुः प्रसिद्धेषु पञ्चमित्रेषु अन्यतमः आसीत् ।
[गोपबन्धु प्रसिद्ध पाँच मित्रों में से एक थे।]

‘अन्यतमः’ का अर्थ: बहुतों में से ‘कोई एक’। इसके साथ जिस समूह की बात हो वह सप्तमी बहुवचन में आता है — पञ्चमित्रेषु अन्यतमः, छात्रेषु अन्यतमः। ‘अन्यतरः’ से इसका भेद याद रखिए — ‘अन्यतरः’ दो में से एक, ‘अन्यतमः’ बहुतों में से एक।
सन्दर्भ: ये ‘पञ्चसखा’ थे — गोपबन्धुदास, नीलकण्ठदास, गोदावरीशमिश्र, कृपासिन्धुमिश्र और लिङ्गराजमिश्र, जिन्होंने मिलकर सत्यवादि-वनविद्यालय चलाया (पृष्ठ 48)।
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