दीपकम् अध्याय 4 अभ्यासात् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
घटनाक्रमेण वाक्यानि पुनः लिखत — (क) भिक्षुकञ्च तद्भोजितवान्। (ख) प्रफुल्लचन्द्ररायः गोपबन्धुम् उत्कलमणिः इति उपाधिना सम्मानितवान्। (ग) गोपबन्धुः अश्रुपूर्णनयनोऽभवत्। (घ) अतिथयो हस्तपादं क्षालयित्वा आसनेषु उपविष्टवन्तः। (ङ) दिनत्रयात् किमपि न भुक्तम्।
उत्तर

पाठ की घटनाओं का सही क्रम —

क्रमःवाक्यम्क्या हुआ
(क)अतिथयो हस्तपादं क्षालयित्वा आसनेषु उपविष्टवन्तः ।भोज में बुलाए गए अतिथि हाथ-पैर धोकर आसनों पर बैठे।
(ख)दिनत्रयात् किमपि न भुक्तम् ।बाहर से भिक्षुक की पुकार — ‘तीन दिन से कुछ नहीं खाया’।
(ग)गोपबन्धुः अश्रुपूर्णनयनोऽभवत् ।वह करुण स्वर सुनते ही गोपबन्धु की आँखें भर आईं।
(घ)भिक्षुकञ्च तद्भोजितवान् ।उन्होंने अपना परोसा हुआ भोजन ले जाकर भिक्षुक को खिला दिया।
(ङ)प्रफुल्लचन्द्ररायः गोपबन्धुम् उत्कलमणिः इति उपाधिना सम्मानितवान् ।ऐसे त्याग के कारण आगे चलकर उन्हें ‘उत्कलमणि’ उपाधि मिली।
क्रम कैसे पहचानें: कहानी का सूत्र कारण → परिणाम है। पहले भोज का दृश्य (अतिथि बैठे), फिर वह घटना जो करुणा जगाती है (भिक्षुक का क्रन्दन), फिर गोपबन्धु की प्रतिक्रिया (आँसू), फिर उनका कर्म (भोजन देना), और सबसे अन्त में समाज की स्वीकृति (उपाधि)। ध्यान दीजिए — उपाधि वाली घटना पूरे जीवन के त्याग का फल है, इसलिए वह सबसे अन्त में आएगी।
भाषा-बिन्दु: तद्भोजितवान् = तत् + भोजितवान् (‘वह’ भोजन खिला दिया) — यहाँ ‘त्’ का ‘द्’ हो गया, यह जश्त्व सन्धि है। क्षालयित्वा (धोकर) क्त्वा-प्रत्ययान्त है, जो बताता है कि यह काम बैठने से पहले हुआ।
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