पदच्छेदः — भोजनस्य, अतिदौर्लभ्यम्, जीवनाय, सुखप्रदम्, तदर्थम्, भोजनम्, कुर्याः, मा, शरीरे, दयाम्, कुरु।
अन्वयः — भोजनस्य अतिदौर्लभ्यं (विद्यते)। जीवनाय सुखप्रदं भोजनं कुर्याः। तदर्थं शरीरे दयां मा कुरु।
अर्थः — भोजन बहुत कठिनाई से मिलता है। जीवन को आगे ले जाने के लिए सुख देने वाला भोजन करना चाहिए। इसलिए (भोजन करते समय) शरीर पर दया मत कीजिए — अर्थात् संकोच छोड़कर भरपेट भोजन कीजिए।
भावार्थः (पुस्तकानुसारम्) — भोजनम् अतीव दुर्लभं भवति। जीवनम् अग्रे नेतुं सुखप्रदं भोजनं करणीयम्। अतः शरीरस्य कष्टं विचिन्त्य भोजनविषये कदापि सङ्कोचः लज्जा वा न करणीया इति।
भावः — यह श्लोक गोपबन्धु ने भोजनसभा में हँसते हुए कहा था, इसलिए इसमें विनोद भी है और गम्भीर बात भी। ऊपर से यह भोजन के समय संकोच न करने की मीठी चुटकी है; भीतर से यह याद दिलाता है कि अन्न कितना दुर्लभ है — और जो व्यक्ति यह जानता है, वही भूखे की पुकार सुनकर अपना भोजन उठाकर दे देता है। पाठ में ठीक अगले क्षण यही होता है।