दीपकम् अध्याय 4 योग्यताविस्तरः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
भोजनस्यातिदौर्लभ्यं जीवनाय सुखप्रदम्। तदर्थं भोजनं कुर्याः मा शरीरे दयां कुरु॥ — अस्य श्लोकस्य पदच्छेदम् अन्वयं भावार्थं च लिखत।
उत्तर

पदच्छेदः — भोजनस्य, अतिदौर्लभ्यम्, जीवनाय, सुखप्रदम्, तदर्थम्, भोजनम्, कुर्याः, मा, शरीरे, दयाम्, कुरु।

अन्वयः — भोजनस्य अतिदौर्लभ्यं (विद्यते)। जीवनाय सुखप्रदं भोजनं कुर्याः। तदर्थं शरीरे दयां मा कुरु।

अर्थः — भोजन बहुत कठिनाई से मिलता है। जीवन को आगे ले जाने के लिए सुख देने वाला भोजन करना चाहिए। इसलिए (भोजन करते समय) शरीर पर दया मत कीजिए — अर्थात् संकोच छोड़कर भरपेट भोजन कीजिए।

भावार्थः (पुस्तकानुसारम्)भोजनम् अतीव दुर्लभं भवति। जीवनम् अग्रे नेतुं सुखप्रदं भोजनं करणीयम्। अतः शरीरस्य कष्टं विचिन्त्य भोजनविषये कदापि सङ्कोचः लज्जा वा न करणीया इति।

भावः — यह श्लोक गोपबन्धु ने भोजनसभा में हँसते हुए कहा था, इसलिए इसमें विनोद भी है और गम्भीर बात भी। ऊपर से यह भोजन के समय संकोच न करने की मीठी चुटकी है; भीतर से यह याद दिलाता है कि अन्न कितना दुर्लभ है — और जो व्यक्ति यह जानता है, वही भूखे की पुकार सुनकर अपना भोजन उठाकर दे देता है। पाठ में ठीक अगले क्षण यही होता है।

व्याकरण देखिए: कुर्याः — कृ धातु, विधिलिङ् लकार, मध्यमपुरुष एकवचन (‘तुम्हें करना चाहिए’); कुरु — लोट् लकार, मध्यमपुरुष एकवचन (‘करो’), और उसके साथ निषेध के लिए मा आया है — संस्कृत में ‘मत करो’ कहने के लिए ‘न’ नहीं, मा + लोट् का प्रयोग होता है। ‘जीवनाय’ चतुर्थी एकवचन है — प्रयोजन बताने के लिए।
सन्धि: भोजनस्य + अतिदौर्लभ्यम् = भोजनस्यातिदौर्लभ्यम् (सवर्णदीर्घ सन्धि — अ + अ = आ)। ‘शरीरे दयां मा कुरु’ में शरीरे सप्तमी एकवचन है — ‘शरीर पर’।
प्र2.
उत्कलमणि-गोपबन्धुदासस्य जीवनपरिचयं लिखत।
उत्तर

पुस्तक के ‘योग्यताविस्तरः’ (पृष्ठ 47) में दिया गया जीवन-परिचय —

विषयःविवरणम्हिन्दी
नामउत्कलमणिः गोपबन्धुदासःउत्कलमणि गोपबन्धुदास
जन्म०९/१०/१८७७9 अक्तूबर 1877
जन्मस्थानम्सुआण्डो-ग्रामः, पुरी-जनपदः, ओडिशाराज्यम्सुआण्डो गाँव, पुरी ज़िला, ओडिशा
पितादैत्यारिदासःदैत्यारि दास
मातास्वर्णमयी देवीस्वर्णमयी देवी
पत्नीमोती देवीमोती देवी
एफ़्.ए. उत्तीर्णः१९००, रेभेन्सा महाविद्यालयः, कटकम्, ओडिशा1900, रेभेन्सा (Ravenshaw) कॉलेज, कटक
बी.एल्. उत्तीर्णः१९०६, कलकत्ता-विश्वविद्यालयः1906, कलकत्ता विश्वविद्यालय
सत्यवादि-वनविद्यालयस्य प्रतिष्ठा१९०९1909
बिहार-ओडिशा व्यवस्थापकसभायाः सदस्यः१९१७1917
समाज-साप्ताहिकपत्रिकायाः प्रकाशनम्१९१९1919
भारतीय-जातीय-आन्दोलने योगदानम्१९२०1920
उत्कलमणिः इति उपाधिना सम्माननम्१९२४1924
रचनाःअवकाशचिन्ता, बन्दीर आत्मकथा, कारा-कविता, धर्मपद, गो-माहात्म्य, नचिकेता-उपाख्यानउनकी ओडिआ रचनाएँ
स्वर्गारोहणम् (साक्षी-गोपाले)१७.०६.१९२८17 जून 1928, साक्षीगोपाल में
तालिका से क्या दिखता है: बी.एल्. (विधि की उपाधि) पास करने के तीन ही वर्ष बाद उन्होंने सत्यवादि-वनविद्यालय (१९०९) खोल दिया — अर्थात् उन्होंने वकालत की चमक छोड़कर शिक्षा और सेवा का मार्ग चुना। इसके बाद विधायिका का सदस्यत्व (१९१७), पत्रिका ‘समाज’ (१९१९), राष्ट्रीय आन्दोलन (१९२०) और अन्त में उपाधि (१९२४) — पूरा जीवन एक ही दिशा में बढ़ता दिखता है।
ध्यान रखें: ये सभी तिथियाँ पुस्तक के ‘योग्यताविस्तरः’ से ली गई हैं; परीक्षा में इन्हीं का प्रयोग कीजिए। नामों की संस्कृत वर्तनी भी वैसी ही रखिए — दैत्यारिदासः, स्वर्णमयी देवी, मोती देवी
प्र3.
सत्यवादि-वनविद्यालयः इति विषये लिखत।
उत्तर

सत्यवादि-वनविद्यालयः भारतस्य प्रथमः मुक्तविद्यालयः आसीत् । १९०९ ख्रिस्ताब्दे अगस्तमासस्य १२ दिनाङ्के साक्षीगोपाल-नामके स्थाने सः प्रतिष्ठापितः ।
[सत्यवादि-वनविद्यालय भारत का पहला मुक्त विद्यालय (खुला विद्यालय) था। इसकी स्थापना 12 अगस्त 1909 को साक्षीगोपाल नामक स्थान पर हुई।]

प्रतिष्ठातारः — पण्डितः गोपबन्धुदासः, पण्डितः नीलकण्ठदासः, पण्डितः डा. गोदावरीशमिश्रः, पण्डितः कृपासिन्धुमिश्रः, पण्डितः लिङ्गराजमिश्रः, आचार्यः हरिहरदासः, पण्डितः नन्दकिशोरदासः च — एतेषां देशभक्तानां मिलितप्रयासेन अयं निःशुल्कवनविद्यालयः तदानीम् आभारतं प्रतिष्ठाम् अलभत ।
[इन देशभक्तों के सम्मिलित प्रयास से यह निःशुल्क वनविद्यालय उस समय पूरे भारत में प्रसिद्ध हो गया।]

कार्यम्पञ्चसखायः मिलित्वा समाजसेवां कुर्वन्तः शिक्षाविकासं च कारयन्तः स्वाधीनतान्दोलनाय जनान् प्रेरयन्ति स्म ।
[पाँचों मित्र मिलकर समाजसेवा करते, शिक्षा का विकास कराते और लोगों को स्वाधीनता-आन्दोलन के लिए प्रेरित करते थे।]

‘वनविद्यालय’ नाम क्यों: यह विद्यालय खुले में, वृक्षों के बीच चलता था — कक्षाएँ पेड़ों की छाया में लगती थीं, इसीलिए इसे वनविद्यालय और भारत का पहला मुक्तविद्यालय कहा गया। यहाँ शिक्षा निःशुल्क थी, जैसा पाठ में आया है — सत्यवादि-वनविद्यालये स छात्रान् निःशुल्कम् अपाठयत्।
जोड़कर देखिए: प्रश्न ३ (ङ) का ‘अन्यतमः’ इन्हीं पञ्चसखाओं की ओर संकेत करता है — गोपबन्धुदास उन प्रसिद्ध पाँच मित्रों में से एक थे।
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