छात्रा उत्तरं ददाति — नमो नमः आचार्य ! ओडिशा-राज्यस्य केन्द्रापडा-जनपदे महानद्यां भयङ्करः जलप्लावः सम्भूतः । जलप्लावेन तत्र महती हानिः सञ्जाता ।
[नमस्कार आचार्य जी! ओडिशा राज्य के केन्द्रापड़ा जनपद में महानदी में भयङ्कर बाढ़ आ गई। बाढ़ से वहाँ बहुत बड़ी हानि हुई है।]
दीपकम् अध्याय 4 पाठारम्भे चित्रसंवादः
अद्यतन2026-09-05
आचार्यः वदति — सत्यम् अशोक ! ते सर्वे अतिदुःखेन जीवन्ति । अस्माभिः एतादृशानां दुःखितानां सहायता करणीया ।
[सच है अशोक! वे सब बहुत दुःख में जी रहे हैं। हमें ऐसे दुःखी लोगों की सहायता करनी चाहिए।]
इससे पहले आचार्य ने बाढ़ की स्थिति भी बताई थी — जलप्लावेन वासगृहाणि नष्टानि, केचित् अस्वस्थाः चिकित्सालये मृत्युना सह युध्यन्ते । अन्ये च अनाहारेण कष्टं सहन्ते । बहवः गृहपालिताः पशवोऽपि नदीस्रोतसा प्रवाहिताः मृताश्च ।
[बाढ़ से घर नष्ट हो गए, कुछ बीमार लोग अस्पताल में मृत्यु से जूझ रहे हैं। दूसरे भूखे रहकर कष्ट सह रहे हैं। बहुत-से पालतू पशु भी नदी के प्रवाह में बहकर मर गए।]
आचार्यः वदति — भवन्तः सर्वे एतत् चित्रं पश्यन्तु । एषः अस्ति दीनबन्धुः गोपबन्धुः । सम्प्रति वयं तस्य विषये जानीमः ।
[आप सब यह चित्र देखिए। ये हैं दीनबन्धु गोपबन्धु। अब हम उनके विषय में जानेंगे।]
इसके पहले आचार्य ने उनका परिचय इस प्रकार दिया था — यथा उत्कलमणिः गोपबन्धुः जलप्लावपीडितानाम् अकुण्ठं सेवां कृत्वा अद्यापि जनमानसेषु समादृतोऽस्ति ।
[जैसे उत्कलमणि गोपबन्धु बाढ़-पीड़ितों की मन लगाकर सेवा करके आज भी लोगों के मन में सम्मानित हैं।]