दीपकम् अध्याय 4 पाठारम्भे चित्रसंवादः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
नमस्ते छात्राः ! ह्यस्तनीं वार्तां श्रुतवन्तः किम् ?
उत्तर

छात्रा उत्तरं ददाति — नमो नमः आचार्य ! ओडिशा-राज्यस्य केन्द्रापडा-जनपदे महानद्यां भयङ्करः जलप्लावः सम्भूतः । जलप्लावेन तत्र महती हानिः सञ्जाता ।
[नमस्कार आचार्य जी! ओडिशा राज्य के केन्द्रापड़ा जनपद में महानदी में भयङ्कर बाढ़ आ गई। बाढ़ से वहाँ बहुत बड़ी हानि हुई है।]

वाक्य कैसे बना: ह्यस्तनीम् = ह्यः (कल) + तन प्रत्यय → ‘कल की’; अतः ‘ह्यस्तनीं वार्ताम्’ का अर्थ है ‘कल का समाचार’ — दोनों पद द्वितीया विभक्ति, एकवचन, स्त्रीलिङ्ग में हैं क्योंकि ये ‘श्रुतवन्तः’ क्रिया के कर्म हैं। श्रुतवन्तः = श्रु + क्तवतु, प्रथमा बहुवचन — ‘सुन चुके हो’। उत्तर में जलप्लावेन तृतीया एकवचन है — हानि का ‘साधन/कारण’ बाढ़ है।
ध्यान दें: सम्भूतः (सम् + भू + क्त) का अर्थ है ‘हो गया, उत्पन्न हुआ’ और सञ्जाता (सम् + जन् + क्त, स्त्रीलिङ्ग) का अर्थ है ‘हो गई’। ‘हानिः’ स्त्रीलिङ्ग है, इसीलिए उसके साथ महती और सञ्जाता — दोनों स्त्रीलिङ्ग रूप आए हैं, ‘महान्’ या ‘सञ्जातः’ नहीं।
प्र2.
महोदय ! ते सम्प्रति अतिदुःखिताः भवेयुः खलु ?
उत्तर

आचार्यः वदति — सत्यम् अशोक ! ते सर्वे अतिदुःखेन जीवन्ति । अस्माभिः एतादृशानां दुःखितानां सहायता करणीया ।
[सच है अशोक! वे सब बहुत दुःख में जी रहे हैं। हमें ऐसे दुःखी लोगों की सहायता करनी चाहिए।]

इससे पहले आचार्य ने बाढ़ की स्थिति भी बताई थी — जलप्लावेन वासगृहाणि नष्टानि, केचित् अस्वस्थाः चिकित्सालये मृत्युना सह युध्यन्ते । अन्ये च अनाहारेण कष्टं सहन्ते । बहवः गृहपालिताः पशवोऽपि नदीस्रोतसा प्रवाहिताः मृताश्च ।
[बाढ़ से घर नष्ट हो गए, कुछ बीमार लोग अस्पताल में मृत्यु से जूझ रहे हैं। दूसरे भूखे रहकर कष्ट सह रहे हैं। बहुत-से पालतू पशु भी नदी के प्रवाह में बहकर मर गए।]

‘अस्माभिः … करणीया’ क्यों ? यह कर्मवाच्य का प्रयोग है। ‘करणीया’ कृत्य-प्रत्ययान्त (करणीय) पद है, जो कर्म ‘सहायता’ (स्त्रीलिङ्ग) के अनुसार सहायता करणीया बना; और कर्ता ‘वयम्’ तृतीया विभक्ति, बहुवचन में आकर अस्माभिः हो गया। यही ढाँचा ‘अस्माभिः पाठः पठनीयः’ में भी चलता है।
शब्द-भेद: भवेयुः विधिलिङ् लकार, प्रथमपुरुष बहुवचन है — ‘होंगे/हो सकते हैं’; ‘खलु’ यहाँ अनुमान की पुष्टि माँगता है (‘न?’)। एतादृशानाम् = ‘ऐसे लोगों का’, षष्ठी बहुवचन।
प्र3.
महोदय ! एषः गोपबन्धुः कः ?
उत्तर

आचार्यः वदति — भवन्तः सर्वे एतत् चित्रं पश्यन्तु । एषः अस्ति दीनबन्धुः गोपबन्धुः । सम्प्रति वयं तस्य विषये जानीमः ।
[आप सब यह चित्र देखिए। ये हैं दीनबन्धु गोपबन्धु। अब हम उनके विषय में जानेंगे।]

इसके पहले आचार्य ने उनका परिचय इस प्रकार दिया था — यथा उत्कलमणिः गोपबन्धुः जलप्लावपीडितानाम् अकुण्ठं सेवां कृत्वा अद्यापि जनमानसेषु समादृतोऽस्ति ।
[जैसे उत्कलमणि गोपबन्धु बाढ़-पीड़ितों की मन लगाकर सेवा करके आज भी लोगों के मन में सम्मानित हैं।]

‘समादृतोऽस्ति’ में सन्धि: समादृतः + अस्ति = समादृतोऽस्ति। ‘समादृतः’ के अन्त का विसर्ग ‘ओ’ में बदला, और आगे के ‘अ’ के स्थान पर अवग्रह (ऽ) आ गया — यही इस पाठ की पूर्वरूपसन्धि है, जो पृष्ठ 44 पर समझाई गई है।
दो नाम, दो भाव: दीनबन्धुः = दीनों (दुःखियों) का बन्धु — यह जनता का दिया स्नेह-नाम है; उत्कलमणिः = उत्कल (ओडिशा) की मणि — यह आचार्य प्रफुल्लचन्द्रराय की दी हुई उपाधि है। पाठ के शीर्षक में उन्हें महामनाः (उच्च विचार वाला) कहा गया है।
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