दीपकम् अध्याय 5 अभ्यासात् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
कीदृशं वाक्यं वाङ्मयं तपः उच्यते ?
उत्तर
उत्तरम् — यद् वाक्यम् अनुद्वेगकरं सत्यं प्रियहितं च भवति, तत् स्वाध्यायाभ्यसनेन सह वाङ्मयं तपः उच्यते।

हिन्दी अर्थ: जो वचन उद्वेग उत्पन्न न करने वाला, सत्य, प्रिय तथा हितकारी हो — वही (स्वाध्याय के अभ्यास सहित) वाङ्मय तप कहलाता है।

आधारः तथा भावः: श्लोक ८ — ‘अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥’ ध्यान दो कि श्लोक चार शर्तें एक साथ रखता है, कोई एक नहीं — बात दुःख न दे, झूठ न हो, प्रिय हो और हित भी करे। जो केवल प्रिय है पर हितकर नहीं, वह चापलूसी है; जो सत्य है पर उद्वेगकर है, वह अभी तप नहीं बना।
व्याकरणम्: ‘कीदृशम्’ का उत्तर सदा विशेषण-रूप में देना होता है, और विशेषण अपने विशेष्य (यहाँ ‘वाक्यम्’, नपुंसकलिङ्ग द्वितीया/प्रथमा एकवचन) के लिङ्ग-वचन-विभक्ति के अनुसार चलता है — इसीलिए अनुद्वेगकरम्, सत्यम्, प्रियहितम् — तीनों नपुंसकलिङ्ग एकवचन में हैं।
प्र2.
कीदृशः जनः स्थितधीः उच्यते ?
उत्तर
उत्तरम् — यः जनः दुःखेषु अनुद्विग्नमनाः, सुखेषु विगतस्पृहः, वीत-राग-भय-क्रोधः च भवति, सः मुनिः स्थितधीः उच्यते।

हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य दुःखों में विचलित नहीं होता, सुखों में जिसकी लालसा नहीं रहती, और जो राग, भय तथा क्रोध से रहित है — वही मुनि स्थितधीः (स्थिर बुद्धि वाला) कहलाता है।

आधारः तथा भावः: श्लोक १ — ‘दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः। वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥’ पाठ का भावार्थ इसे और खोलता है — ‘यः मनुष्यः आपत्कालेषु उद्वेगं न अनुभवति… सः मौनी पुरुषः स्थितप्रज्ञः भवति।’ अर्थात् स्थितधी वह नहीं जिस पर दुःख आता ही नहीं, बल्कि वह है जिसकी बुद्धि दुःख आने पर भी अपनी जगह से हिलती नहीं।
व्याकरणम्: स्थितधीः = स्थिता धीः (बुद्धिः) यस्य सः — बहुव्रीहि समास, प्रथमा एकवचन। शब्दार्थ-सारणी में इसका अर्थ ‘स्थिरमतिमान्’ दिया है।
प्र3.
जनः कथं प्रणश्यति ?
उत्तर
उत्तरम् — क्रोधात् सम्मोहः भवति, सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः भवति, स्मृतिभ्रंशात् बुद्धिनाशः भवति, बुद्धिनाशात् च जनः प्रणश्यति।

हिन्दी अर्थ: क्रोध से सम्मोह, सम्मोह से स्मृति का नाश, स्मृति के नाश से बुद्धि का नाश, और बुद्धि के नाश से मनुष्य स्वयं नष्ट हो जाता है।

क्रोधः → सम्मोहः → स्मृतिविभ्रमः → बुद्धिनाशः → विनाशः
आधारः तथा भावः: श्लोक २। इस उत्तर की सबसे बड़ी बात यही है कि विनाश अचानक नहीं आता — वह चार सीढ़ियाँ उतरकर आता है, और हर सीढ़ी पिछली का सीधा परिणाम है। इसलिए रोकना पहली सीढ़ी पर ही सम्भव है — क्रोध पर। पाठ का भावार्थ कहता है — ‘किं योग्यं किञ्च अयोग्यम् इति अविचिन्त्य क्रोधात् व्यामोहं प्राप्नोति’।
व्याकरणम्: ‘कथम्’ (कैसे) के उत्तर में कारण बताने वाली पञ्चमी की शृंखला दी गई है — क्रोधात्, सम्मोहात्, स्मृतिभ्रंशात्, बुद्धिनाशात् (सभी पञ्चमी एकवचन)।
प्र4.
जनः कथम् उत्तमां शान्तिं प्राप्नोति ?
उत्तर
उत्तरम् — संयतेन्द्रियः तत्परः श्रद्धावान् जनः ज्ञानं लभते; ज्ञानं लब्ध्वा सः अचिरेण परां (उत्तमां) शान्तिम् अधिगच्छति।

हिन्दी अर्थ: जिसकी इन्द्रियाँ संयत हैं, जो तत्पर और श्रद्धावान् है — वह ज्ञान पाता है; और ज्ञान पाकर शीघ्र ही परम शान्ति प्राप्त कर लेता है।

आधारः तथा भावः: श्लोक ४ — ‘श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः। ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥’ उत्तर में क्रम मत बदलिए — शान्ति सीधे नहीं मिलती, ज्ञान के रास्ते मिलती है, और ज्ञान भी तीन गुणों के रास्ते: श्रद्धा + तत्परता + इन्द्रियसंयम।
व्याकरणम्: लब्ध्वा — क्त्वा प्रत्यय (पूर्वकालिक क्रिया) = ‘पाकर’। परां शान्तिम् — द्वितीया एकवचन, स्त्रीलिङ्ग। अचिरेण — तृतीया एकवचन = ‘शीघ्र ही’।
प्र5.
उपदेशप्राप्तये त्रयः उपायाः के भवन्ति ?
उत्तर
उत्तरम् — उपदेशप्राप्तये प्रणिपातः, परिप्रश्नः, सेवा च — एते त्रयः उपायाः भवन्ति।
उपायःपाठे प्रयुक्तं रूपम्अर्थः (सारण्यनुसारम्)अभिप्रायः
प्रणिपातःप्रणिपातेननमस्कारेण — प्रणाम के द्वारानम्रता से गुरु के पास जाना
परिप्रश्नःपरिप्रश्नेनपुनः पुनः प्रश्नकरणेन — प्रश्नों के द्वाराजिज्ञासा से बार-बार पूछना
सेवासेवयासेवा के द्वारागुरु की सेवा में लगे रहना
आधारः तथा भावः: श्लोक ३ — ‘तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया’। तीनों का क्रम भी सिखाने वाला है — पहले नम्रता, फिर प्रश्न। बिना नम्रता के पूछा गया प्रश्न शास्त्रार्थ बन जाता है, सीखना नहीं। और यहाँ ‘बार-बार पूछना’ को दोष नहीं, उपाय कहा गया है — विद्यार्थी के लिए यह बड़ी राहत की बात है।
व्याकरणम्: श्लोक में तीनों पद तृतीया विभक्ति, एकवचन (करण कारक) में हैं — प्रणिपातेन, परिप्रश्नेन, सेवया। प्रश्न ‘के भवन्ति’ (प्रथमा बहुवचन) में है, इसलिए उत्तर में मूल रूप प्रथमा में लिखे गए हैं — प्रणिपातः, परिप्रश्नः, सेवा।
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