प्र1.
कीदृशं वाक्यं वाङ्मयं तपः उच्यते ?
उत्तर
उत्तरम् — यद् वाक्यम् अनुद्वेगकरं सत्यं प्रियहितं च भवति, तत् स्वाध्यायाभ्यसनेन सह वाङ्मयं तपः उच्यते।
हिन्दी अर्थ: जो वचन उद्वेग उत्पन्न न करने वाला, सत्य, प्रिय तथा हितकारी हो — वही (स्वाध्याय के अभ्यास सहित) वाङ्मय तप कहलाता है।
आधारः तथा भावः: श्लोक ८ — ‘अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥’ ध्यान दो कि श्लोक चार शर्तें एक साथ रखता है, कोई एक नहीं — बात दुःख न दे, झूठ न हो, प्रिय हो और हित भी करे। जो केवल प्रिय है पर हितकर नहीं, वह चापलूसी है; जो सत्य है पर उद्वेगकर है, वह अभी तप नहीं बना।
व्याकरणम्: ‘कीदृशम्’ का उत्तर सदा विशेषण-रूप में देना होता है, और विशेषण अपने विशेष्य (यहाँ ‘वाक्यम्’, नपुंसकलिङ्ग द्वितीया/प्रथमा एकवचन) के लिङ्ग-वचन-विभक्ति के अनुसार चलता है — इसीलिए अनुद्वेगकरम्, सत्यम्, प्रियहितम् — तीनों नपुंसकलिङ्ग एकवचन में हैं।