दीपकम् अध्याय 5 अभ्यासात् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
श्रद्धावान् जनः किं लभते ?
उत्तर
उत्तरम् — ज्ञानम्
(हिन्दी: श्रद्धावान् मनुष्य ज्ञान प्राप्त करता है।)

पूर्णवाक्येन — श्रद्धावान् जनः ज्ञानं लभते।

आधारः: श्लोक ४ — ‘श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः’। श्लोक में स्पष्ट कहा है कि श्रद्धा, तत्परता और इन्द्रिय-संयम — तीनों वाला मनुष्य ज्ञान पाता है।
व्याकरणम्: ज्ञानम्द्वितीया विभक्ति, एकवचन, नपुंसकलिङ्ग (कर्म, क्योंकि ‘लभते’ क्रिया का कर्म है)। ‘किम्’ का उत्तर सदा उसी विभक्ति में देना चाहिए जिस विभक्ति में प्रश्नवाचक पद है — यहाँ ‘किम्’ द्वितीया में है, अतः उत्तर भी द्वितीया में।
प्र2.
कस्मात् सम्मोहः जायते ?
उत्तर
उत्तरम् — क्रोधात्
(हिन्दी: क्रोध से सम्मोह उत्पन्न होता है।)

पूर्णवाक्येन — क्रोधात् सम्मोहः जायते।

आधारः: श्लोक २ — ‘क्रोधाद्भवति सम्मोहः’। ‘सम्मोह’ का अर्थ पाठ की शब्दार्थ-सारणी में दिया है — किंकर्तव्यविमूढता, अर्थात् क्या करना चाहिए और क्या नहीं, यह विवेक ही न रहना।
व्याकरणम्: प्रश्न में ‘कस्मात्’ पञ्चमी एकवचन है, अतः उत्तर भी पञ्चमी विभक्ति, एकवचन में — ‘क्रोधात्’। यही ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ का नियम है — कारण के अर्थ में पञ्चमी।
प्र3.
सम्मोहात् किं जायते ?
उत्तर
उत्तरम् — स्मृतिविभ्रमः
(हिन्दी: सम्मोह से स्मृतिविभ्रम — स्मरणशक्ति का नाश — होता है।)

पूर्णवाक्येन — सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः जायते।

आधारः: श्लोक २ — ‘सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः’। पूरी शृंखला याद रखिए: क्रोधः → सम्मोहः → स्मृतिविभ्रमः → बुद्धिनाशः → विनाशः
व्याकरणम्: स्मृतिविभ्रमःप्रथमा विभक्ति, एकवचन, पुंलिङ्ग (‘जायते’ क्रिया का कर्ता)। यहाँ ‘किम्’ प्रथमा में है, इसलिए उत्तर भी प्रथमा में।
प्र4.
अर्जुनाय गीतां कः उपदिष्टवान् ?
उत्तर
उत्तरम् — श्रीकृष्णः (भगवान् श्रीकृष्णः)।
(हिन्दी: अर्जुन को गीता का उपदेश भगवान् श्रीकृष्ण ने दिया।)

पूर्णवाक्येन — अर्जुनाय गीतां भगवान् श्रीकृष्णः उपदिष्टवान्।

आधारः: पाठ का प्रथम पृष्ठ — ‘तदा भगवान् श्रीकृष्णः युद्धपराङ्मुखम् अर्जुनं कर्तव्यपालनार्थम् उपदिष्टवान्। श्रीकृष्णस्य उपदेशः एव श्रीमद्भगवद्गीता अस्ति।’
व्याकरणम्: ‘कः’ प्रथमा एकवचन है, अतः उत्तर प्रथमा विभक्ति, एकवचन, पुंलिङ्ग — श्रीकृष्णः। उपदिष्टवान्क्तवतु प्रत्ययान्त भूतकालिक क्रिया, जो कर्ता के लिङ्ग-वचन के अनुसार चलती है (स्त्रीलिङ्ग में ‘उपदिष्टवती’)। अर्जुनाय — चतुर्थी एकवचन (‘जिसके लिए’)।
प्र5.
हर्षामर्षभयोद्वेगैः मुक्तः नरः कस्य प्रियः भवति ?
उत्तर
उत्तरम् — भगवतः (श्रीकृष्णस्य)।
(हिन्दी: वह भगवान् का प्रिय होता है।)

पूर्णवाक्येन — हर्षामर्षभयोद्वेगैः मुक्तः नरः भगवतः (श्रीकृष्णस्य) प्रियः भवति।

आधारः: श्लोक ७ — ‘हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः’। यहाँ ‘मे’ भगवान् श्रीकृष्ण के लिए आया है, क्योंकि पूरा उपदेश वही अर्जुन को दे रहे हैं। इसीलिए उत्तर में ‘मे’ के स्थान पर भगवतः / श्रीकृष्णस्य लिखना चाहिए।
व्याकरणम्: ‘कस्य’ षष्ठी विभक्ति, एकवचन है, अतः उत्तर भी षष्ठी में — भगवतः (भगवत् शब्द, षष्ठी एकवचन)। ध्यान रहे — ‘भगवान्’ लिखना यहाँ अशुद्ध होगा।
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