प्र1.
अनुद्वेगकरं सत्यं प्रियहितं च वाक्यं ........................... तपः उच्यते ।
उत्तर
पूर्णवाक्यम् — अनुद्वेगकरं सत्यं प्रियहितं च वाक्यं वाङ्मयं तपः उच्यते ।
हिन्दी: उद्वेग न देने वाला, सत्य, प्रिय और हितकारी वचन वाङ्मय (वाणी का) तप कहलाता है।
चुनाव का कारण: ‘तपः’ के ठीक पहले उसका विशेषण चाहिए, और सारणी में वाङ्मयम् = वाचिकम् (वाणी-सम्बन्धी) दिया है। श्लोक ८ का उत्तरार्ध यही वाक्य है — ‘वाङ्मयं तप उच्यते’।