दीपकम् अध्याय 5 अभ्यासात् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
उच्यते — ................................................
उत्तर
वाक्यम् — यः दुःखेषु अनुद्विग्नमनाः भवति सः स्थितधीः उच्यते ।
(हिन्दी: जो दुःखों में विचलित नहीं होता, वह स्थितधी कहलाता है।)

अन्यानि वाक्यानि — सत्यं प्रियहितं च वचनं वाङ्मयं तपः उच्यते । · गीता श्रीकृष्णस्य उपदेशः उच्यते

व्याकरणम्: उच्यते — वच् धातु का कर्मवाच्य रूप, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन = ‘कहा जाता है / कहलाता है’। कर्मवाच्य में कर्ता तृतीया में और कर्म प्रथमा में आता है, इसलिए वाक्य में ‘सः’ प्रथमा में है।
प्र2.
च — ................................................
उत्तर
वाक्यम् — रमेशः तस्य पिता च गीताजयन्ती-महोत्सवं गतवन्तौ ।
(हिन्दी: रमेश और उसके पिता — दोनों गीता-जयन्ती महोत्सव में गए।)

अन्यानि वाक्यानि — सत्यं प्रियं वचनं वदेत् । · भक्तः निर्ममः निरहङ्कारः भवति ।

व्याकरणम्: एक अव्यय (समुच्चयबोधक) है — इसका रूप कभी नहीं बदलता, और यह संस्कृत में सदा उन पदों के बाद आता है जिन्हें वह जोड़ता है (हिन्दी के ‘और’ की तरह बीच में नहीं)। दो कर्ता जुड़ने पर क्रिया द्विवचन में हो जाती है — इसीलिए ‘गतवन्तौ’।
प्र3.
न — ................................................
उत्तर
वाक्यम् — क्रोधी जनः किं योग्यं किञ्च अयोग्यम् इति न जानाति ।
(हिन्दी: क्रोधी मनुष्य यह नहीं जान पाता कि क्या उचित है और क्या अनुचित।)

अन्यानि वाक्यानि — स्थितप्रज्ञः दुःखेषु उद्विजते । · वयं कदापि असत्यं वदेम ।

व्याकरणम्: निषेधवाचक अव्यय है और सामान्यतः क्रिया के ठीक पहले रखा जाता है। सन्धि के समय यह अगले शब्द से जुड़ भी सकता है — जैसे पाठ में ‘यस्मात् + न’ = यस्मान्न, ‘लोकात् + न’ = लोकान्न
प्र4.
लब्ध्वा — ................................................ [पुस्तके अस्य विकल्पस्य कृते ‘(ङ)’ इति मुद्रितम् अस्ति]
उत्तर
वाक्यम् — ज्ञानं लब्ध्वा जनः अचिरेण परां शान्तिम् अधिगच्छति ।
(हिन्दी: ज्ञान पाकर मनुष्य शीघ्र ही परम शान्ति प्राप्त कर लेता है।)

अन्यत् वाक्यम् — गुरोः उपदेशं लब्ध्वा शिष्यः प्रसन्नः अभवत् ।

व्याकरणम्: लब्ध्वा = लभ् + क्त्वा प्रत्यय (पूर्वकालिक क्रिया) = ‘पाकर’। क्त्वा-प्रत्ययान्त पद अव्यय होते हैं — इनका रूप नहीं बदलता। नियम यह है कि क्त्वा तभी लगता है जब दोनों क्रियाओं का कर्ता एक ही हो; यदि उपसर्ग लगा हो तो क्त्वा के स्थान पर ‘ल्यप्’ आता है (जैसे प्राप्य, विजित्य — दोनों इसी पाठ में हैं)।
पुस्तक में प्रश्न ४ के चौथे विकल्प पर छपाई की भूल से ‘(घ)’ के स्थान पर ‘(ङ)’ मुद्रित है; क्रम में यह चौथा विकल्प है।
प्र5.
कुर्यात् — ................................................
उत्तर
वाक्यम् — मनुष्यः सर्वदा सत्यं प्रियं हितकरं च वचनं कुर्यात् ।
(हिन्दी: मनुष्य को सदा सत्य, प्रिय और हितकारी वचन बोलना चाहिए।)

अन्यत् वाक्यम् — छात्रः प्रतिदिनं स्वाध्यायस्य अभ्यासं कुर्यात्

व्याकरणम्: कुर्यात् — कृ धातु, विधिलिङ् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन = ‘करना चाहिए’। विधिलिङ् उपदेश, विधान या ‘चाहिए’ के अर्थ में आता है — इसी कारण गीता जैसे उपदेश-ग्रन्थों में इसका प्रयोग बहुत होता है (जैसे पाठ की व्याकरण-पेटी में ‘भवेत्’)।
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