प्र1.
उदाहरणम् — श्रद्धावान् – श्रद्धावती ; बुद्धिमान् – बुद्धिमती । (पुस्तके एतौ उत्तरौ रक्तवर्णेन पूरितौ स्तः) — नियमं स्पष्टीकुरुत।
उत्तर
नियमः — ‘वान्’ (वतुप्) → ‘वती’ तथा ‘मान्’ (मतुप्) → ‘मती’।
श्रद्धावान् → श्रद्धावती · बुद्धिमान् → बुद्धिमती
श्रद्धावान् → श्रद्धावती · बुद्धिमान् → बुद्धिमती
ऐसा क्यों होता है: ‘श्रद्धावान्’ जैसे शब्द मूल संज्ञा में मतुप्/वतुप् प्रत्यय जोड़कर बनते हैं और इनका अर्थ होता है ‘…वाला’ (श्रद्धा + वान् = श्रद्धा वाला)। पुंलिङ्ग में इनका प्रथमा एकवचन रूप ‘…वान् / …मान्’ होता है। स्त्रीलिङ्ग बनाने के लिए इनमें ङीप् (ई) जुड़ता है, जिससे रूप ‘…वती / …मती’ बन जाता है। कौन-सा प्रत्यय लगेगा — ‘मान्’ या ‘वान्’ — यह मूल शब्द के अन्तिम वर्ण पर निर्भर करता है (अ/आ के बाद प्रायः ‘वान्’, इ/उ के बाद प्रायः ‘मान्’)।
ध्यातव्यम्: ‘श्रीमान्’ का स्त्रीलिङ्ग श्रीमती है — यही रूप हम आज भी नाम के आगे लगाते हैं। इसी तरह ‘बुद्धिमान्’ का ‘बुद्धिमती’। इस एक नियम से नीचे के पाँचों उत्तर बन जाते हैं।