प्र1.
‘अ’ स्तम्भस्य पदानि — (क) सर्वभूतानाम् (ख) अनुद्विग्नमनाः (ग) स्थितधीः (घ) परिप्रश्नेन (ङ) संयतेन्द्रियः ; ‘इ’ स्तम्भस्य पदानि — पुनः पुनः प्रश्नकरणेन / स्थिरमतिमान् / इन्द्रियसंयमी / यस्य मनः विचलितं न भवति / सर्वेषां प्राणिनाम् — एतौ स्तम्भौ मेलयत।
उत्तर
| अ | इ (शुद्धं मेलनम्) | हिन्दी अर्थ | पाठे कुत्र ? |
|---|---|---|---|
| (क) सर्वभूतानाम् | सर्वेषां प्राणिनाम् | सभी प्राणियों का | श्लोकः ५ |
| (ख) अनुद्विग्नमनाः | यस्य मनः विचलितं न भवति | अविचलित मन वाला | श्लोकः १ |
| (ग) स्थितधीः | स्थिरमतिमान् | स्थिर मन/बुद्धि वाला | श्लोकः १ |
| (घ) परिप्रश्नेन | पुनः पुनः प्रश्नकरणेन | बार-बार प्रश्न पूछकर | श्लोकः ३ |
| (ङ) संयतेन्द्रियः | इन्द्रियसंयमी | संयमित इन्द्रियों वाला | श्लोकः ४ |
मिलाने की कुञ्जी: पहले विभक्ति देखो, फिर अर्थ — यही सबसे तेज़ तरीका है।
- सर्वभूतानाम् षष्ठी बहुवचन है, इसलिए उसका जोड़ भी षष्ठी बहुवचन ही होगा — सर्वेषां प्राणिनाम्। ‘भूत’ का यहाँ अर्थ ‘प्राणी’ है।
- परिप्रश्नेन तृतीया एकवचन है, अतः जोड़ भी तृतीया में — पुनः पुनः प्रश्नकरणेन। शेष विकल्पों में कोई तृतीया रूप है ही नहीं, इसलिए यह पहली नज़र में तय हो जाता है।
- बचे तीनों प्रथमा एकवचन के बहुव्रीहि पद हैं — अनुद्विग्नमनाः (मन विचलित न हो), स्थितधीः (धी = बुद्धि स्थिर हो → स्थिरमतिमान्), संयतेन्द्रियः (इन्द्रियाँ संयत हों → इन्द्रियसंयमी)। इनमें ‘मनः’ वाला अर्थ मन से, ‘धीः/मति’ वाला बुद्धि से और ‘इन्द्रिय’ वाला इन्द्रिय से जुड़ता है — शब्द का मूल घटक ही उत्तर बता देता है।
ध्यातव्यम्: ‘मनः’ और ‘धीः’ को एक न समझ लेना — मनः भाव/चंचलता का स्थान है, धीः निर्णय करने वाली बुद्धि है। इसीलिए ‘अनुद्विग्नमनाः’ का जोड़ ‘यस्य मनः विचलितं न भवति’ है और ‘स्थितधीः’ का ‘स्थिरमतिमान्’।