दीपकम् अध्याय 5 अभ्यासात् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
‘अ’ स्तम्भस्य पदानि — (क) सर्वभूतानाम् (ख) अनुद्विग्नमनाः (ग) स्थितधीः (घ) परिप्रश्नेन (ङ) संयतेन्द्रियः ; ‘इ’ स्तम्भस्य पदानि — पुनः पुनः प्रश्नकरणेन / स्थिरमतिमान् / इन्द्रियसंयमी / यस्य मनः विचलितं न भवति / सर्वेषां प्राणिनाम् — एतौ स्तम्भौ मेलयत।
उत्तर
इ (शुद्धं मेलनम्)हिन्दी अर्थपाठे कुत्र ?
(क) सर्वभूतानाम्सर्वेषां प्राणिनाम्सभी प्राणियों काश्लोकः ५
(ख) अनुद्विग्नमनाःयस्य मनः विचलितं न भवतिअविचलित मन वालाश्लोकः १
(ग) स्थितधीःस्थिरमतिमान्स्थिर मन/बुद्धि वालाश्लोकः १
(घ) परिप्रश्नेनपुनः पुनः प्रश्नकरणेनबार-बार प्रश्न पूछकरश्लोकः ३
(ङ) संयतेन्द्रियःइन्द्रियसंयमीसंयमित इन्द्रियों वालाश्लोकः ४
मिलाने की कुञ्जी: पहले विभक्ति देखो, फिर अर्थ — यही सबसे तेज़ तरीका है।
  • सर्वभूतानाम् षष्ठी बहुवचन है, इसलिए उसका जोड़ भी षष्ठी बहुवचन ही होगा — सर्वेषां प्राणिनाम्। ‘भूत’ का यहाँ अर्थ ‘प्राणी’ है।
  • परिप्रश्नेन तृतीया एकवचन है, अतः जोड़ भी तृतीया में — पुनः पुनः प्रश्नकरणेन। शेष विकल्पों में कोई तृतीया रूप है ही नहीं, इसलिए यह पहली नज़र में तय हो जाता है।
  • बचे तीनों प्रथमा एकवचन के बहुव्रीहि पद हैं — अनुद्विग्नमनाः (मन विचलित न हो), स्थितधीः (धी = बुद्धि स्थिर हो → स्थिरमतिमान्), संयतेन्द्रियः (इन्द्रियाँ संयत हों → इन्द्रियसंयमी)। इनमें ‘मनः’ वाला अर्थ मन से, ‘धीः/मति’ वाला बुद्धि से और ‘इन्द्रिय’ वाला इन्द्रिय से जुड़ता है — शब्द का मूल घटक ही उत्तर बता देता है।
ध्यातव्यम्: ‘मनः’ और ‘धीः’ को एक न समझ लेना — मनः भाव/चंचलता का स्थान है, धीः निर्णय करने वाली बुद्धि है। इसीलिए ‘अनुद्विग्नमनाः’ का जोड़ ‘यस्य मनः विचलितं न भवति’ है और ‘स्थितधीः’ का ‘स्थिरमतिमान्’।
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