पिता पूरी कथा इस प्रकार कहते हैं — बहुभ्यः वर्षेभ्यः पूर्वं कुरुक्षेत्रे कौरवाणां पाण्डवानां च मध्ये सङ्ग्रामः अभवत्। तस्मिन् युद्धे स्वबान्धवान् दृष्ट्वा अर्जुनः युद्धं कर्तुं न इच्छति स्म। तदा भगवान् श्रीकृष्णः युद्धपराङ्मुखम् अर्जुनं कर्तव्यपालनार्थम् उपदिष्टवान्। श्रीकृष्णस्य उपदेशः एव श्रीमद्भगवद्गीता अस्ति। गीतायाम् अमृततुल्याः उपदेशाः सन्ति।
दीपकम् अध्याय 5 पाठे विद्यमानाः प्रश्नाः
अद्यतन2026-09-05
प्र1.
“पितः ! गीता का ?” (रमेशः पितरम् अपृच्छत् — पृष्ठ 49)
उत्तर
उत्तरम् — कुरुक्षेत्रे भगवता श्रीकृष्णेन अर्जुनाय यः उपदेशः दत्तः, सः एव श्रीमद्भगवद्गीता अस्ति।
हिन्दी अर्थ: बहुत वर्ष पहले कुरुक्षेत्र में कौरवों और पाण्डवों के बीच युद्ध हुआ। उस युद्ध में अपने ही बन्धुओं को सामने देखकर अर्जुन युद्ध करना नहीं चाहता था। तब भगवान् श्रीकृष्ण ने युद्ध से विमुख अर्जुन को कर्तव्य-पालन के लिए उपदेश दिया। श्रीकृष्ण का वही उपदेश श्रीमद्भगवद्गीता है। गीता में अमृत के समान उपदेश हैं।
व्याकरण-सङ्केतः: युद्धपराङ्मुखम् = युद्धात् पराङ्मुखः (जो युद्ध से मुँह मोड़े हो) — यहाँ द्वितीया विभक्ति, एकवचन, पुंलिङ्ग, क्योंकि यह ‘अर्जुनम्’ का विशेषण है। उपदिष्टवान् — क्तवतु-प्रत्ययान्त भूतकालिक क्रिया (उपदिश् + क्तवतु), प्रथमा एकवचन पुंलिङ्ग = ‘उपदेश दिया’। इच्छति स्म — वर्तमानकालिक क्रिया के साथ ‘स्म’ लगने पर अर्थ भूतकाल का हो जाता है (= ‘ऐच्छत्’ / चाहता था)।
प्र2.
“कथं सुगीता कर्तव्या ?” (रमेशस्य द्वितीयः प्रश्नः — पृष्ठ 49)
उत्तर
उत्तरम् — गीता उत्तमभावेन पठितव्या, तस्याः अभ्यासः सम्यक् रूपेण करणीयः, कार्यक्षेत्रे जीवनक्षेत्रे च तस्याः उपदेशाः अनुपालनीयाः — एवं गीता ‘सुगीता’ भवति।
यही उत्तर पिता ठीक अगले पृष्ठ पर देते हैं — “अस्य आशयः अस्ति यत् गीतायाः अभ्यासः सम्यक् रूपेण करणीयः। गीता उत्तमभावेन पठितव्या। कार्यक्षेत्रे जीवनक्षेत्रे च गीतायाः उपदेशाः अनुपालनीयाः।”
हिन्दी अर्थ: ‘सुगीता कर्तव्या’ का आशय है — गीता का अभ्यास भली-भाँति किया जाए, गीता उत्तम भाव से पढ़ी जाए, और उसके उपदेशों का पालन कार्यक्षेत्र तथा जीवनक्षेत्र — दोनों में किया जाए। केवल कण्ठस्थ कर लेना ‘सुगीता’ नहीं है; पढ़ना + भाव समझना + आचरण करना — तीनों मिलकर ‘सुगीता’ बनते हैं।
व्याकरण-सङ्केतः: कर्तव्या, करणीयः, पठितव्या, अनुपालनीयाः — ये सब विधि-कृत्य प्रत्यय (तव्यत् तथा अनीयर्) से बने पद हैं, जो ‘करना चाहिए / किया जाना चाहिए’ अर्थ देते हैं। इनका लिङ्ग-वचन कर्म के अनुसार बदलता है — गीता (स्त्रीलिङ्ग) → कर्तव्या, पठितव्या; अभ्यासः (पुंलिङ्ग) → करणीयः; उपदेशाः (पुंलिङ्ग बहुवचन) → अनुपालनीयाः।
प्र3.
“तर्हि सुगीता कर्तव्या इत्यस्य कः आशयः ?” (रमेशः — पृष्ठ 50)
उत्तर
उत्तरम् (पितुः वचनम्) — अस्य आशयः अस्ति यत् गीतायाः अभ्यासः सम्यक् रूपेण करणीयः। गीता उत्तमभावेन पठितव्या। कार्यक्षेत्रे जीवनक्षेत्रे च गीतायाः उपदेशाः अनुपालनीयाः।
इसके तुरन्त बाद पिता पाठ की योजना भी बता देते हैं — “अस्मिन् पाठे वयं श्रीमद्भगवद्गीतायाः काँश्चन श्लोकान् पठामः। वयं श्लोकान् मिलित्वा गायामः अपि।” (इस पाठ में हम गीता के कुछ श्लोक पढ़ेंगे और मिलकर गाएँगे भी।)
भावः: ‘सुगीता’ शब्द में ‘सु’ उपसर्ग का बल है — सु + गीता = भली प्रकार गाई/पढ़ी गई। इसलिए प्रश्न ‘कितनी बार पढ़ी’ का नहीं, ‘कैसे पढ़ी’ का है। पाठ का पूरा शीर्षक-श्लोक भी यही कहता है — जो गीता स्वयं भगवान् के मुख से निकली है, उसी को ठीक से आत्मसात् कर लो; फिर अन्य शास्त्रों के विस्तार की आवश्यकता ही नहीं रहती।
ध्यातव्यम्: काँश्चन = ‘कुछ’ (किम् + चन, द्वितीया बहुवचन पुंलिङ्ग) — इसीलिए पाठ में गीता के केवल आठ चुने हुए श्लोक दिए गए हैं, पूरी गीता नहीं।