प्र1.
कक्षायां श्रीमद्भगवद्गीतानुगुणं ‘स्थितधीः’ इति विषयम् अधिकृत्य ‘मम जीवनलक्ष्यम्’ इत्यस्मिन् विषये परिचर्चां स्थापयतु ।
उत्तर
यह करना है: कक्षा में ‘स्थितधीः’ (स्थिर बुद्धि) के गुण को आधार बनाकर ‘मम जीवनलक्ष्यम्’ (मेरा जीवन-लक्ष्य) विषय पर परिचर्चा आयोजित करनी है। यह लिखित उत्तर नहीं, बोलने का अभ्यास है — इसलिए तैयारी इस तरह करो:
- १. आधार तय करो — श्लोक १ को कक्षा में लिखकर उसके तीन लक्षण अलग-अलग लिख लो: दुःख में अविचल, सुख में निस्पृह, राग-भय-क्रोध से मुक्त।
- २. दल बनाओ — ४–५ छात्रों के समूह; हर समूह एक लक्षण ले और बताए कि अपने लक्ष्य तक पहुँचने में वह लक्षण कैसे काम आएगा।
- ३. सङ्केत-वाक्य तैयार रखो — हर वक्ता कम-से-कम दो संस्कृत वाक्य बोले (नीचे नमूना दिया है), शेष हिन्दी/मातृभाषा में।
- ४. निष्कर्ष — अन्त में शिक्षक या एक छात्र सभी बातों को जोड़कर एक वाक्य में सार कहे।
अच्छी परिचर्चा में क्या-क्या होना चाहिए: (क) लक्ष्य का स्पष्ट नाम (चिकित्सकः, शिक्षकः, कृषकः, सैनिकः, अभियन्ता, वैज्ञानिकः…); (ख) उस लक्ष्य के मार्ग की एक कठिनाई; (ग) उस कठिनाई में ‘स्थितधीः’ होना कैसे सहायक होगा; (घ) श्लोक १ या ४ से एक उद्धरण। केवल ‘मुझे डॉक्टर बनना है’ कह देना पर्याप्त नहीं — पाठ से जोड़ना आवश्यक है।
नमूना उत्तर (परिचर्चायाः आरम्भः):
छात्रः — मम जीवनलक्ष्यं चिकित्सकः भवितुम् अस्ति। चिकित्सकस्य कार्ये प्रतिदिनं रोगिणां दुःखं पश्यामि। यदि अहं दुःखेषु उद्विग्नः भवामि तर्हि चिकित्सां कर्तुं न शक्नोमि। अतः मया स्थितधीः भवितव्यम्।
छात्रा — मम लक्ष्यं शिक्षिका भवितुम् अस्ति। परीक्षायाम् अङ्काः न्यूनाः भवेयुः, तथापि अहं न विषीदामि। ‘श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः’ इति गीतायाः वचनं मम प्रेरणा अस्ति।
(हिन्दी: मेरा जीवन-लक्ष्य चिकित्सक बनना है… यदि मैं दुःख देखकर स्वयं घबरा जाऊँ तो चिकित्सा कैसे करूँगा? इसलिए मुझे स्थिर बुद्धि वाला बनना होगा। / मेरा लक्ष्य शिक्षिका बनना है। परीक्षा में अंक कम आ सकते हैं, फिर भी मैं निराश नहीं होती — ‘श्रद्धावान् ही ज्ञान पाता है’ यह गीता-वचन मेरी प्रेरणा है।)
छात्रः — मम जीवनलक्ष्यं चिकित्सकः भवितुम् अस्ति। चिकित्सकस्य कार्ये प्रतिदिनं रोगिणां दुःखं पश्यामि। यदि अहं दुःखेषु उद्विग्नः भवामि तर्हि चिकित्सां कर्तुं न शक्नोमि। अतः मया स्थितधीः भवितव्यम्।
छात्रा — मम लक्ष्यं शिक्षिका भवितुम् अस्ति। परीक्षायाम् अङ्काः न्यूनाः भवेयुः, तथापि अहं न विषीदामि। ‘श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः’ इति गीतायाः वचनं मम प्रेरणा अस्ति।
(हिन्दी: मेरा जीवन-लक्ष्य चिकित्सक बनना है… यदि मैं दुःख देखकर स्वयं घबरा जाऊँ तो चिकित्सा कैसे करूँगा? इसलिए मुझे स्थिर बुद्धि वाला बनना होगा। / मेरा लक्ष्य शिक्षिका बनना है। परीक्षा में अंक कम आ सकते हैं, फिर भी मैं निराश नहीं होती — ‘श्रद्धावान् ही ज्ञान पाता है’ यह गीता-वचन मेरी प्रेरणा है।)