प्र1.
“भगवतः श्रीकृष्णस्य अर्जुनाय प्रदत्तानां जीवनमूल्यसम्बद्धानाम् उपदेशानां सङ्कलनात्मकः ग्रन्थः अस्ति श्रीमद्भगवद्गीता। महर्षिः वेदव्यासः महाभारतस्य भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतां वर्णितवान्। गीतायाम् अष्टादश अध्यायाः सप्तशतं (७००) श्लोकाः च सन्ति।” — अस्य अनुच्छेदस्य आशयं हिन्द्यां लिखत।
उत्तर
सारः — ग्रन्थः = श्रीमद्भगवद्गीता · वक्ता = भगवान् श्रीकृष्णः · श्रोता = अर्जुनः · वर्णयिता = महर्षिः वेदव्यासः · स्थानम् = महाभारतस्य भीष्मपर्व · अध्यायाः = १८ · श्लोकाः = ७००
हिन्दी अर्थ: श्रीमद्भगवद्गीता वह ग्रन्थ है जिसमें भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए, जीवन-मूल्यों से जुड़े उपदेशों का संकलन है। महर्षि वेदव्यास ने इसका वर्णन महाभारत के भीष्मपर्व में किया है। गीता में अठारह अध्याय और सात सौ (700) श्लोक हैं।
ध्यान देने योग्य बात: गीता कोई स्वतन्त्र ग्रन्थ नहीं, वह महाभारत का ही एक अंश है — भीष्मपर्व के भीतर का संवाद। और पाठ यह भी बताता है कि उसके उपदेश ‘जीवनमूल्यसम्बद्ध’ हैं, अर्थात् वे युद्ध की नहीं, जीने की बात करते हैं। इसीलिए इस पाठ में चुने गए आठों श्लोक भी कर्तव्य, क्रोध, ज्ञान, मैत्री और वाणी — रोज़ के जीवन के विषय हैं।
व्याकरणम्: अष्टादश = अष्ट + दश (18), सप्तशतम् = 700 — संस्कृत में संख्यावाचक विशेषण अपने विशेष्य के अनुसार चलते हैं, इसीलिए ‘अध्यायाः’ (बहुवचन) के साथ ‘अष्टादश’ और ‘श्लोकाः’ के साथ ‘सप्तशतम्’ आया है।