दीपकम् अध्याय 5 योग्यताविस्तरः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
“भगवतः श्रीकृष्णस्य अर्जुनाय प्रदत्तानां जीवनमूल्यसम्बद्धानाम् उपदेशानां सङ्कलनात्मकः ग्रन्थः अस्ति श्रीमद्भगवद्गीता। महर्षिः वेदव्यासः महाभारतस्य भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतां वर्णितवान्। गीतायाम् अष्टादश अध्यायाः सप्तशतं (७००) श्लोकाः च सन्ति।” — अस्य अनुच्छेदस्य आशयं हिन्द्यां लिखत।
उत्तर
सारः — ग्रन्थः = श्रीमद्भगवद्गीता · वक्ता = भगवान् श्रीकृष्णः · श्रोता = अर्जुनः · वर्णयिता = महर्षिः वेदव्यासः · स्थानम् = महाभारतस्य भीष्मपर्व · अध्यायाः = १८ · श्लोकाः = ७००

हिन्दी अर्थ: श्रीमद्भगवद्गीता वह ग्रन्थ है जिसमें भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए, जीवन-मूल्यों से जुड़े उपदेशों का संकलन है। महर्षि वेदव्यास ने इसका वर्णन महाभारत के भीष्मपर्व में किया है। गीता में अठारह अध्याय और सात सौ (700) श्लोक हैं।

ध्यान देने योग्य बात: गीता कोई स्वतन्त्र ग्रन्थ नहीं, वह महाभारत का ही एक अंश है — भीष्मपर्व के भीतर का संवाद। और पाठ यह भी बताता है कि उसके उपदेश ‘जीवनमूल्यसम्बद्ध’ हैं, अर्थात् वे युद्ध की नहीं, जीने की बात करते हैं। इसीलिए इस पाठ में चुने गए आठों श्लोक भी कर्तव्य, क्रोध, ज्ञान, मैत्री और वाणी — रोज़ के जीवन के विषय हैं।
व्याकरणम्: अष्टादश = अष्ट + दश (18), सप्तशतम् = 700 — संस्कृत में संख्यावाचक विशेषण अपने विशेष्य के अनुसार चलते हैं, इसीलिए ‘अध्यायाः’ (बहुवचन) के साथ ‘अष्टादश’ और ‘श्लोकाः’ के साथ ‘सप्तशतम्’ आया है।
प्र2.
गीतायाः अष्टादश अध्यायानां नामानि (कोष्ठके विषयेण सह) लिखत। (पृष्ठ 60)
उत्तर
क्रमःअध्यायस्य नामविषयः (पुस्तकानुसारम्)हिन्दी संकेत
अर्जुनविषादयोगःसैन्य-निरीक्षणम्अर्जुन का विषाद, सेना का निरीक्षण
साङ्ख्ययोगःगीतायाः सारःगीता का सार
कर्मयोगःकर्मणः महत्त्वम्कर्म का महत्त्व
ज्ञान-कर्म-संन्यासयोगःदिव्यज्ञानम्दिव्य ज्ञान
कर्मसंन्यासयोगःकर्म-वैराग्य-योगःकर्म और वैराग्य
आत्मसंयमयोगःध्यान-योगःध्यान-योग
ज्ञान-विज्ञानयोगःभगवद्ज्ञानस्य प्राप्तिःभगवान् के ज्ञान की प्राप्ति
अक्षर-ब्रह्मयोगःभगवतः प्राप्तिःभगवान् की प्राप्ति
राजविद्या-राजगुह्ययोगःपरमं गुप्तं ज्ञानम्सबसे गोपनीय ज्ञान
१०विभूतियोगःभगवतः ऐश्वर्यम्भगवान् का ऐश्वर्य
११विश्वरूप-दर्शनयोगःविश्वरूपस्य दर्शनम्विश्वरूप का दर्शन
१२भक्तियोगःभक्तिभावज्ञानम्भक्ति-भाव का ज्ञान
१३क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विभागयोगःप्रकृतेः पुरुषस्य चेतनायाः च ज्ञानम्प्रकृति, पुरुष और चेतना
१४गुणत्रय-विभागयोगःप्रकृतेः गुणत्रयस्य वर्णनम्तीन गुणों का वर्णन
१५पुरुषोत्तमयोगःविश्वस्य केन्द्ररूपेण ब्रह्मणः वर्णनम्ब्रह्म का वर्णन
१६दैवासुर-सम्पद्विभागयोगःदैवी-आसुरी-स्वभावानां वर्णनम्दैवी और आसुरी स्वभाव
१७श्रद्धात्रय-विभागयोगःश्रद्धायाः विभागानां वर्णनम्श्रद्धा के तीन भेद
१८मोक्ष-संन्यासयोगःउपसंहारः, संन्यास-सिद्धि-वर्णनम्उपसंहार, संन्यास की सिद्धि
देखने की बात: हर अध्याय के नाम के अन्त में ‘…योगः’ लगा है — गीता स्वयं अपने हर अध्याय को एक ‘योग’ कहती है, अर्थात् जुड़ने का एक-एक मार्ग। पहला अध्याय विषाद (दुःख) से शुरू होता है और अन्तिम मोक्ष पर समाप्त होता है — यही गीता की पूरी यात्रा है।
पाठेन सम्बन्धः: इस पाठ के आठ श्लोक अलग-अलग अध्यायों से चुने गए हैं — श्लोक १ तथा २ (स्थितप्रज्ञ, क्रोध की शृंखला) साङ्ख्ययोग के भाव के हैं, श्लोक ३ तथा ४ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग के, श्लोक ५–७ भक्तियोग के, और श्लोक ८ श्रद्धात्रय-विभागयोग के तप-प्रकरण का है।
प्र3.
‘सरसं गायामः’ — भगवद्गीता किञ्चिदधीता, गङ्गा-जल-लव-कणिका पीता। सकृदपि येन मुरारि समर्चा, तस्य यमः किं कुरुते चर्चाम्॥ कर्तव्यदीक्षां च समत्वशिक्षां, ज्ञानस्य भिक्षां शरणागतिञ्च। ददाति गीता करुणार्द्रभूता, कृष्णेन दत्ता जगतां हिताय॥ (पृष्ठ 60) — अनयोः श्लोकयोः अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
प्रथमः श्लोकः — अन्वयः: येन भगवद्गीता किञ्चित् अधीता, गङ्गा-जल-लव-कणिका पीता, सकृत् अपि मुरारिः समर्चा (समर्चितः), तस्य यमः किं चर्चां कुरुते ?

अर्थः (हिन्दी): जिसने भगवद्गीता को थोड़ा भी पढ़ लिया, गङ्गाजल की एक बूँद भी पी ली, और एक बार भी मुरारि (श्रीकृष्ण) की भली-भाँति पूजा कर ली — भला यमराज उसकी क्या चर्चा करेंगे? (अर्थात् उसे मृत्यु का भय नहीं रहता।)

द्वितीयः श्लोकः — अन्वयः: करुणार्द्रभूता कृष्णेन जगतां हिताय दत्ता गीता कर्तव्यदीक्षां च समत्वशिक्षां ज्ञानस्य भिक्षां शरणागतिं च ददाति ।

अर्थः (हिन्दी): करुणा से भीगी हुई, श्रीकृष्ण द्वारा संसार के हित के लिए दी गई गीता हमें चार वस्तुएँ देती है — कर्तव्य की दीक्षा, समता की शिक्षा, ज्ञान की भिक्षा तथा शरणागति

भावः: पहला श्लोक अल्प प्रयास का बड़ा फल बताता है — ‘किञ्चित्’ (थोड़ा), ‘लव-कणिका’ (एक बूँद), ‘सकृत्’ (एक बार) — तीनों शब्द जान-बूझकर छोटे रखे गए हैं, ताकि विद्यार्थी यह न सोचे कि आरम्भ करने के लिए बहुत बड़ी तैयारी चाहिए। दूसरा श्लोक गीता के पूरे उपदेश का सार चार शब्दों में बाँध देता है, और चारों इसी पाठ के श्लोकों में दिखाई देते हैं — कर्तव्य (श्लोक ३), समत्व (श्लोक १ तथा ५ का ‘समदुःखसुखः’), ज्ञान (श्लोक ४) और शरणागति (श्लोक ६ का ‘मय्यर्पितमनोबुद्धिः’)।
काव्य-सौन्दर्यम्: दूसरे श्लोक में दीक्षा – शिक्षा – भिक्षा — तीन तुकान्त शब्द एक पंक्ति में रखे गए हैं; यह अनुप्रास तथा यमक-सदृश ध्वनि-सौन्दर्य है, जिससे श्लोक गाने योग्य बन जाता है — इसीलिए पुस्तक ने इसे ‘सरसं गायामः’ (आओ, रस के साथ गाएँ) शीर्षक के नीचे रखा है। व्याकरणम्: ‘जगतां हिताय’ — हिताय चतुर्थी एकवचन (‘हित के लिए’), जगताम् षष्ठी बहुवचन; ‘कृष्णेन दत्ता’ — कर्मवाच्य में कर्ता तृतीया में।
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