ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥ ४ ॥ (पृष्ठ 52) — पदच्छेदं, अन्वयम्, अर्थं भावं च लिखत।
अन्वयः — संयतेन्द्रियः तत्परः श्रद्धावान् (मनुष्यः) ज्ञानं लभते । तथा ज्ञानं लब्ध्वा (सः) अचिरेण परां शान्तिम् अधिगच्छति ।
अर्थः (हिन्दी): जिसकी इन्द्रियाँ संयत हैं, जो तत्पर (लगन वाला) है और श्रद्धा से युक्त है — वही मनुष्य ज्ञान पाता है। और ज्ञान पा लेने पर वह शीघ्र ही परम शान्ति को प्राप्त कर लेता है।
श्लोक ज्ञान के लिए तीन शर्तें रखता है — श्रद्धा (भरोसा), तत्परता (लगन) और इन्द्रिय-संयम। तीनों साथ चाहिए: श्रद्धा के बिना पढ़ा हुआ टिकता नहीं, लगन के बिना पूरा होता नहीं, और संयम के बिना मन पढ़ाई पर रुकता नहीं। श्लोक ३ के तीन बाहरी उपाय (प्रणिपात, परिप्रश्न, सेवा) और श्लोक ४ के ये तीन भीतरी गुण मिलकर एक ही सीख पूरी करते हैं।