प्र1.
“सर्वं विकसितं भाति डिजिटल्-भारतेऽधुना। जीवनस्य च सौकर्यं सहसा लभते जनः॥” — अस्य श्लोकस्य पदच्छेदः, अन्वयः, अर्थः, भावः च लिखत।
उत्तर
१. पदच्छेदः —
सर्वम् + विकसितम् + भाति + डिजिटल्-भारते + अधुना।
जीवनस्य + च + सौकर्यम् + सहसा + लभते + जनः॥
सर्वम् + विकसितम् + भाति + डिजिटल्-भारते + अधुना।
जीवनस्य + च + सौकर्यम् + सहसा + लभते + जनः॥
सन्धि-विच्छेदः: भारतेऽधुना = भारते + अधुना। यहाँ पूर्वरूप-सन्धि है — ‘ए’ के बाद ‘अ’ आने पर ‘अ’ का लोप हो जाता है और उसके स्थान पर अवग्रह (ऽ) चिह्न लिखा जाता है।
२. अन्वयः — अधुना डिजिटल्-भारते सर्वं विकसितं भाति। जनः च जीवनस्य सौकर्यं सहसा लभते॥
३. अर्थः: आज डिजिटल भारत में सब कुछ विकसित दिखाई देता है, और मनुष्य जीवन की सुविधा तत्काल ही प्राप्त कर लेता है।
शब्दार्थः — भाति = शोभते / दृश्यते (शोभा पाता है, दिखाई देता है); सौकर्यम् = सुकरत्वम्, सुविधा; सहसा = झटिति, शीघ्रम् (तुरन्त); जनः = मनुष्यः।
शब्दार्थः — भाति = शोभते / दृश्यते (शोभा पाता है, दिखाई देता है); सौकर्यम् = सुकरत्वम्, सुविधा; सहसा = झटिति, शीघ्रम् (तुरन्त); जनः = मनुष्यः।
४. भावः: पूरा पाठ जिस निष्कर्ष तक पहुँचा है, यह श्लोक उसी को दो पंक्तियों में बाँध देता है। पहली पंक्ति राष्ट्र की बात कहती है — डिजिटल भारत में हर क्षेत्र (शासन, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, वाणिज्य) विकसित दीख रहा है। दूसरी पंक्ति व्यक्ति की बात कहती है — इस विकास का फल किसी दूर के भविष्य में नहीं, आज ‘सहसा’ ही सामान्य जन को सुविधा के रूप में मिल रहा है। इसी से पाठ का शीर्षक सार्थक होता है — यह केवल तकनीक का बदलना नहीं, युगपरिवर्तनम् है।
भाषा-सौन्दर्यम्: ‘सर्वं ... सहसा’ तथा ‘सौकर्यं’ में ‘स’ की आवृत्ति से अनुप्रास बनता है, जिससे यह पंक्ति गाने योग्य हो जाती है — इसीलिए पाठ में इससे पहले रङ्गसङ्केत है (सर्वे मिलित्वा गायन्ति)। छन्द अनुष्टुप् है — चार-चार चरण, प्रत्येक में आठ अक्षर।