दीपकम् अध्याय 7 अभ्यासात् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
संस्कृतभाषा केषां जीवनस्य आशा अस्ति ?
उत्तर
उत्तरम् — संस्कृतभाषा वेदव्यास-वाल्मीकि-मुनीनां, कालिदास-बाणादिकवीनां, पौराणिक-सामान्यजनानां च जीवनस्य आशा अस्ति।
हिन्दी अर्थ: संस्कृतभाषा वेदव्यास तथा वाल्मीकि जैसे मुनियों की, कालिदास तथा बाणभट्ट आदि कवियों की और पुराणों के अध्येताओं तथा सामान्य जनों की — इन सबके जीवन की आशा है।
उत्तर-कौशलम्: प्रश्न में ‘केषां’ (षष्ठी बहुवचन) है, इसलिए उत्तर में भी तीनों वर्ग षष्ठी बहुवचन में ही आने चाहिए — मुनीनाम्, कवीनाम्, जनानाम्। पूर्णवाक्य वाले प्रश्न में क्रिया ‘अस्ति’ लगाना न भूलें।
प्र2.
केषां विचाराः जनान् अभिप्रेरयन्ति ?
उत्तर
उत्तरम् — वेद-उपनिषद्-वेदान्त-पुराणादीनां विचाराः जनान् अभिप्रेरयन्ति।
हिन्दी अर्थ: वेद, उपनिषद्, वेदान्त तथा पुराण आदि के विचार लोगों को प्रेरित करते हैं। श्लोक ४ की पङ्क्ति ‘वेदविषय-वेदान्त-विचारा’ इसी बात को कहती है — संस्कृत केवल शब्दों की भाषा नहीं, विचारों की भाषा है।
व्याकरण-सङ्केतः: अभिप्रेरयन्ति — ‘अभि + प्र + ईर्’ का णिच्-प्रत्ययान्त (प्रेरणार्थक) रूप, लट् लकार, प्रथमपुरुष बहुवचन — क्योंकि कर्ता ‘विचाराः’ बहुवचन है। कर्म ‘जनान्’ द्वितीया बहुवचन है।
प्र3.
कैः रसैः समृद्धा साहित्यपरम्परा विराजते ?
उत्तर
उत्तरम् — शृङ्गार-हास्य-करुण-रौद्र-वीर-भयानक-बीभत्स-अद्भुत-शान्त-इति नवभिः रसैः समृद्धा साहित्यपरम्परा विराजते।
क्रमःरसःस्थायीभावः
शृङ्गारःरतिः
हास्यःहासः
करुणःशोकः
रौद्रःक्रोधः
वीरःउत्साहः
भयानकःभयम्
बीभत्सःजुगुप्सा
अद्भुतःविस्मयः
शान्तःनिर्वेदः
हिन्दी अर्थ: संस्कृत की साहित्य-परम्परा नौ रसों से समृद्ध होकर शोभित होती है। ‘रस’ का अर्थ है — काव्य पढ़ते या सुनते समय पाठक के मन में जो आनन्दमय भाव जगता है। पुस्तक की सूची इन्हीं नौ रसों की है।
व्याकरण-सङ्केतः: ‘कैः रसैः’ — तृतीया विभक्ति, बहुवचन (करण/साधन के अर्थ में)। इसलिए उत्तर भी ‘नवभिः रसैः’ — तृतीया बहुवचन — में देना चाहिए।
प्र4.
संस्कृतभाषा केषु शास्त्रेषु विहरति ?
उत्तर
उत्तरम् — संस्कृतभाषा वैद्यशास्त्र-व्योमशास्त्र-आदिषु शास्त्रेषु विहरति। (चिकित्साविज्ञान-खगोलशास्त्रादिभिः सह संस्कृतभाषा पृथिव्यां विहरति।)
हिन्दी अर्थ: संस्कृतभाषा आयुर्वेद (चिकित्साशास्त्र), व्योमशास्त्र (खगोलशास्त्र) आदि शास्त्रों में विचरण करती है। श्लोक ४ की पङ्क्ति ‘वैद्य-व्योम-शास्त्रादि-विहारा’ का सीधा अर्थ यही है।
क्यों महत्त्वपूर्ण: यह प्रश्न पाठ का सबसे बड़ा सन्देश खोलता है — संस्कृत केवल धर्म या काव्य की भाषा नहीं है। चरक-संहिता, सुश्रुत-संहिता (चिकित्सा) तथा आर्यभटीय, सूर्यसिद्धान्त (खगोल) जैसे वैज्ञानिक ग्रन्थ भी संस्कृत में ही लिखे गए। इसी विस्तार के कारण कवि उसे ‘धरायां विजयते’ कहता है।
व्याकरण-सङ्केतः: ‘केषु शास्त्रेषु’ — सप्तमी विभक्ति, बहुवचन; अतः उत्तर भी ‘शास्त्रेषु’ सप्तमी बहुवचन में।
प्र5.
संस्कृतभाषायाः कानि कानि सम्बोधनपदानि अत्र प्रयुक्तानि ?
उत्तर
उत्तरम् — अत्र संस्कृतभाषायाः कृते ‘मातः’, ‘श्रुतिसुखनिनदे’, ‘सकलप्रमोदे’, ‘स्मृतिहितवरदे’, ‘सरसविनोदे’, ‘गति-मति-प्रेरक-काव्यविशारदे’ इति सम्बोधनपदानि प्रयुक्तानि।
सम्बोधनपदम्अर्थःश्लोकः
अयि मातः !हे माता !
श्रुतिसुखनिनदे !हे कानों को सुख देने वाली ध्वनि वाली !
सकलप्रमोदे !हे सबको आनन्द देने वाली !
स्मृतिहितवरदे !हे स्मृति को हितकारी वरदान देने वाली !
सरसविनोदे !हे मधुर विनोद करने वाली !
गति-मति-प्रेरक-काव्यविशारदे !हे गति और बुद्धि को प्रेरित करने वाले काव्य में पारंगत !
भावः: इतने सारे सम्बोधन एक ही उद्देश्य से आए हैं — कवि संस्कृत को निर्जीव भाषा नहीं, जीवित माता मानता है। जिससे बात की जाती है, उसी को पुकारा जाता है; इसलिए पूरा गीत ‘पुकार’ के रूप में चलता है। यही मानवीकरण अलङ्कार है।
व्याकरण-सङ्केतः: ये सब पद सम्बोधन विभक्ति, एकवचन, स्त्रीलिङ्ग में हैं। आकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्द (जैसे ‘माता’) का सम्बोधन ‘मातः’ बनता है, और ‘निनदा, प्रमोदा’ जैसे शब्दों का सम्बोधन ‘निनदे, प्रमोदे’ — अन्त में ‘ए’। पुस्तक ने शब्दार्थ-सारणी में इन्हीं पदों के आगे ! चिह्न भी छापा है।
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