दीपकम् अध्याय 7 अभ्यासात् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
“मञ्जुलमञ्जूषा” इत्यस्य अर्थः कः ? (i) कठोरभाषा (ii) शोचनीया भाषा (iii) मनोहररूपेण संकलिता (iv) सामान्यभाषा
उत्तर
उत्तरम् — (iii) मनोहररूपेण संकलिता
हिन्दी अर्थ: मञ्जुला = मनोहरा (मन को हरने वाली) और मञ्जूषा = पेटिका (पेटी)। दोनों मिलकर अर्थ देते हैं — मनोहर रूप में संकलित (सजाई हुई) शब्दों की पेटी। पुस्तक की शब्दार्थ-सारणी में दोनों शब्द अलग-अलग यही अर्थ देकर छपे हैं।
अन्य विकल्प क्यों गलत: (i) ‘कठोरभाषा’ तो ‘मञ्जुला’ का ठीक उल्टा है; (ii) ‘शोचनीया’ का अर्थ है ‘दुःख के योग्य’ — पूरे गीत का स्वर प्रशंसा का है, शोक का नहीं; (iv) ‘सामान्यभाषा’ कहने से ‘मञ्जुल’ (मनोहर) शब्द का अर्थ ही निकल जाता।
प्र2.
सुन्दरसुरभाषा केषां जीवनस्य आशा उच्यते ? (i) केवलं कवीनाम् (ii) बालकानाम् (iii) पौराणिक-सामान्यजनानाम् (iv) छात्राणाम्
उत्तर
उत्तरम् — (iii) पौराणिक-सामान्यजनानाम्
आधारः: श्लोक २ की पङ्क्ति — “पौराणिक-सामान्य-जनानां जीवनस्य आशा, सुन्दरसुरभाषा।” अर्थात् संस्कृत पुराण-अध्येताओं तथा सामान्य जनों के जीवन की आशा है।
ध्यातव्यम्: विकल्प (i) में ‘केवलम्’ शब्द ही उसे गलत बना देता है। श्लोक में कवि तीन वर्ग गिनाता है — मुनि, कवि और सामान्य जन। इसलिए ‘केवल कवियों की’ कहना पद्य के भाव के विरुद्ध है। यही इस प्रश्न की असली परीक्षा है।
प्र3.
सुन्दरसुरभाषा कुत्र विजयते ? (i) आकाशे (ii) जलधौ (iii) धरायाम् (iv) पवने
उत्तर
उत्तरम् — (iii) धरायाम्
आधारः: श्लोक ४ की अन्तिम पङ्क्ति — “विजयते धरायां, सुन्दरसुरभाषा।” अर्थात् वह धरती पर विजयी होती है।
अर्थ-सङ्केतः: ‘जलधौ’ = समुद्र में, ‘पवने’ = वायु में, ‘आकाशे’ = आकाश में — ये तीनों सप्तमी में तो हैं, पर पद्य में इनका कोई उल्लेख नहीं। कवि जान-बूझकर ‘धरा’ कहता है, क्योंकि उसका आशय है — संस्कृत इसी लोक में, मनुष्यों के बीच जीवित और विजयी है, केवल स्वर्ग की भाषा बनकर नहीं रह गई।
प्र4.
सुन्दरसुरभाषायां किं नास्ति ? (i) शास्त्रज्ञानम् (ii) संस्कृतिः (iii) वेदान्तचिन्तनम् (iv) अशुद्धिः
उत्तर
उत्तरम् — (iv) अशुद्धिः
तर्कः: प्रश्न पूछता है — संस्कृतभाषा में क्या नहीं है ? गीत के अनुसार उसमें शास्त्रज्ञान है (वैद्य-व्योम-शास्त्रादि-विहारा), संस्कृति है (तव संस्कृतिरेषा) और वेदान्त-चिन्तन है (वेदविषय-वेदान्त-विचारा) — तीनों विकल्प पद्य में स्पष्ट मिलते हैं। शेष बचा अशुद्धिः — और वही उत्तर है।
Did you know? संस्कृत को ‘शुद्ध’ भाषा इसीलिए कहा जाता है क्योंकि ‘संस्कृत’ शब्द का अर्थ ही है — सम् + कृत = भली-भाँति संस्कारित, परिष्कृत। पाणिनि की अष्टाध्यायी ने उसके हर रूप को नियम से बाँध दिया, इसलिए उसमें मनमानी या अशुद्धि की जगह नहीं रहती। पाठ 13 ‘वर्णोच्चारण-शिक्षा’ इसी शुद्धि पर आधारित है।
प्र5.
कविः सुन्दरसुरभाषां केन पदेन सम्बोधयति ? (i) पितः (ii) मातः (iii) भ्रातः (iv) दातः
उत्तर
उत्तरम् — (ii) मातः
आधारः: श्लोक १ की तीसरी पङ्क्ति — “अयि मातस्तव पोषणक्षमता”, जिसका सन्धि-विच्छेद है मातः + तव। अतः कवि संस्कृतभाषा को ‘मातः’ (हे माता) कहकर पुकारता है।
भावः: ‘माता’ सम्बोधन आकस्मिक नहीं है। उसी पङ्क्ति में आगे ‘पोषणक्षमता’ (पालने-पोसने की शक्ति) शब्द आता है — और पालन-पोषण माता का ही काम है। श्लोक १ के भावार्थ में पुस्तक स्वयं कहती है कि संस्कृत अनेक भाषाओं की जननी-भाषा है। इसलिए सम्बोधन और अर्थ, दोनों एक-दूसरे को पुष्ट करते हैं।
व्याकरण-सङ्केतः: मातः — ‘मातृ’ शब्द का सम्बोधन, एकवचन, स्त्रीलिङ्ग। यही पद अभ्यास-प्रश्न ४ में उदाहरण के रूप में दिया गया है — मातः = सम्बोधनम्, एकवचनम्।
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