प्र1.
मातृभूमिः सदा सेव्या मातृभाषा तथैव च।
भारतं मातृभूमिर्नो मातृभाषा हि संस्कृतम्॥ — अर्थं भावं च लिखत।
भारतं मातृभूमिर्नो मातृभाषा हि संस्कृतम्॥ — अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — मातृभूमिः सदा सेव्या मातृभाषा तथा एव च। भारतम् मातृभूमिः नः मातृभाषा हि संस्कृतम्।
अन्वयः — मातृभूमिः सदा सेव्या, तथा एव च मातृभाषा (सेव्या)। नः मातृभूमिः भारतम् (अस्ति), मातृभाषा हि संस्कृतम् (अस्ति)।
अन्वयः — मातृभूमिः सदा सेव्या, तथा एव च मातृभाषा (सेव्या)। नः मातृभूमिः भारतम् (अस्ति), मातृभाषा हि संस्कृतम् (अस्ति)।
अर्थः (हिन्दी) — मातृभूमि की सदा सेवा करनी चाहिए, और उसी प्रकार मातृभाषा की भी। हमारी मातृभूमि भारत है और मातृभाषा संस्कृत है।
भावः: श्लोक भूमि और भाषा को एक ही स्तर पर रखता है — जैसे देश की सेवा कर्तव्य है, वैसे ही भाषा की सेवा भी। दूसरी पंक्ति ‘मातृभाषा’ को संस्कृत बताती है, क्योंकि भारत की अधिकांश भाषाएँ संस्कृत से ही निकली हैं — यह वही बात है जो पाठ के श्लोक १ के भावार्थ में ‘जननी-भाषा’ कहकर कही गई है।
व्याकरण-सङ्केतः: सेव्या — ‘सेव्’ धातु + यत् (कृत्य) प्रत्यय, स्त्रीलिङ्ग प्रथमा एकवचन = ‘सेवा करने योग्य’। मातृभूमिर्नो = मातृभूमिः + नः (विसर्ग सन्धि); ‘नः’ = अस्माकम् (हमारी)।