दीपकम् अध्याय 7 योग्यताविस्तरः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
मातृभूमिः सदा सेव्या मातृभाषा तथैव च।
भारतं मातृभूमिर्नो मातृभाषा हि संस्कृतम्॥ — अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — मातृभूमिः सदा सेव्या मातृभाषा तथा एव च। भारतम् मातृभूमिः नः मातृभाषा हि संस्कृतम्।
अन्वयः — मातृभूमिः सदा सेव्या, तथा एव च मातृभाषा (सेव्या)। नः मातृभूमिः भारतम् (अस्ति), मातृभाषा हि संस्कृतम् (अस्ति)।

अर्थः (हिन्दी) — मातृभूमि की सदा सेवा करनी चाहिए, और उसी प्रकार मातृभाषा की भी। हमारी मातृभूमि भारत है और मातृभाषा संस्कृत है।

भावः: श्लोक भूमि और भाषा को एक ही स्तर पर रखता है — जैसे देश की सेवा कर्तव्य है, वैसे ही भाषा की सेवा भी। दूसरी पंक्ति ‘मातृभाषा’ को संस्कृत बताती है, क्योंकि भारत की अधिकांश भाषाएँ संस्कृत से ही निकली हैं — यह वही बात है जो पाठ के श्लोक १ के भावार्थ में ‘जननी-भाषा’ कहकर कही गई है।
व्याकरण-सङ्केतः: सेव्या — ‘सेव्’ धातु + यत् (कृत्य) प्रत्यय, स्त्रीलिङ्ग प्रथमा एकवचन = ‘सेवा करने योग्य’। मातृभूमिर्नो = मातृभूमिः + नः (विसर्ग सन्धि); ‘नः’ = अस्माकम् (हमारी)।
प्र2.
भारतस्य प्रतिष्ठे द्वे संस्कृतं संस्कृतिस्तथा।
विहाय संस्कृतं नास्ति संस्कृतिः संस्कृताश्रिता॥ — अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — भारतस्य प्रतिष्ठे द्वे संस्कृतम् संस्कृतिः तथा। विहाय संस्कृतम् न अस्ति संस्कृतिः संस्कृत-आश्रिता।
अन्वयः — भारतस्य द्वे प्रतिष्ठे — संस्कृतं तथा संस्कृतिः। संस्कृतं विहाय संस्कृतिः न अस्ति, (यतः सा) संस्कृताश्रिता (अस्ति)।

अर्थः (हिन्दी) — भारत की दो प्रतिष्ठाएँ हैं — संस्कृत और संस्कृति। संस्कृत को छोड़कर संस्कृति नहीं रहती, क्योंकि संस्कृति संस्कृत के ही आश्रय पर टिकी है।

भावः: यह श्लोक पाठ के श्लोक ३ (‘तव संस्कृतिरेषा’) का ही विस्तार है। कवि का तर्क सीधा है — संस्कृति भाषा में जीती है। हमारे संस्कार, कथाएँ, मन्त्र, शास्त्र — सब संस्कृत में लिखे हैं। भाषा गई तो उन तक पहुँचने का रास्ता ही बन्द हो जाएगा, इसलिए संस्कृति अपने-आप क्षीण हो जाएगी।
शब्द-क्रीडा: ‘संस्कृत’ और ‘संस्कृति’ — दोनों एक ही धातु से बने हैं (सम् + कृ = भली-भाँति करना)। पूरे श्लोक में ये दो शब्द बार-बार लौटते हैं; समान ध्वनि की यह आवृत्ति अनुप्रास तथा यमक जैसा प्रभाव देती है और श्लोक को कण्ठस्थ करने में सहायक होती है।
प्र3.
पुरुषाः संस्कृताः सन्तु महिलाः सन्तु संस्कृताः।
संस्कृतेन विचारेण राष्ट्रं भातु सुसंस्कृतम्॥ — अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — पुरुषाः संस्कृताः सन्तु महिलाः सन्तु संस्कृताः। संस्कृतेन विचारेण राष्ट्रम् भातु सुसंस्कृतम्।
अन्वयः — पुरुषाः संस्कृताः सन्तु, महिलाः (अपि) संस्कृताः सन्तु। संस्कृतेन विचारेण राष्ट्रं सुसंस्कृतं भातु।

अर्थः (हिन्दी) — पुरुष संस्कारवान् हों, महिलाएँ भी संस्कारवान् हों। संस्कारयुक्त विचार से राष्ट्र सुसंस्कृत होकर शोभित हो।

भावः: यहाँ ‘संस्कृतः’ का अर्थ केवल ‘संस्कृत जानने वाला’ नहीं, बल्कि सुसंस्कृत, परिष्कृत, संस्कारवान् है। श्लोक का क्रम ध्यान देने योग्य है — पहले व्यक्ति (पुरुष और महिला, दोनों बराबर), फिर राष्ट्र। अर्थात् राष्ट्र अपने-आप सुसंस्कृत नहीं होता; वह तभी होता है जब उसके नागरिक संस्कारवान् हों।
व्याकरण-सङ्केतः: सन्तु तथा भातु — दोनों लोट् लकार (आज्ञा/कामना) के प्रथमपुरुष रूप हैं; ‘सन्तु’ बहुवचन (कर्ता ‘पुरुषाः/महिलाः’), ‘भातु’ एकवचन (कर्ता ‘राष्ट्रम्’)। कामना-वाक्यों में लोट् लकार ही आता है।
प्र4.
संस्कृतं संस्कृतेर्मूलं ज्ञानविज्ञानवारिधिः।
वेदतत्त्वार्थसञ्जुष्टं लोकालोककरं शिवम्॥ — अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — संस्कृतम् संस्कृतेः मूलम् ज्ञान-विज्ञान-वारिधिः। वेद-तत्त्वार्थ-सञ्जुष्टम् लोक-आलोककरम् शिवम्।
अन्वयः — संस्कृतं संस्कृतेः मूलम् (अस्ति), ज्ञानविज्ञानवारिधिः (अस्ति)। (तत्) वेदतत्त्वार्थसञ्जुष्टं लोकालोककरं शिवम् (अस्ति)।

अर्थः (हिन्दी) — संस्कृत संस्कृति की जड़ है और ज्ञान-विज्ञान का समुद्र है। वह वेदों के तत्त्वार्थ से भरी हुई, संसार को प्रकाश देने वाली और कल्याणकारी है।

भावः: यह श्लोक पाठ के चौथे पद्य से सीधे जुड़ता है। वहाँ कहा गया था कि संस्कृत वेदान्त, आयुर्वेद और खगोलशास्त्र — सब में विचरण करती है; यहाँ उसी बात को एक रूपक में बाँध दिया गया है — ज्ञानविज्ञानवारिधिः = ज्ञान और विज्ञान का समुद्र। समुद्र का रूपक इसलिए, क्योंकि उसमें गहराई भी है और अनन्त विस्तार भी।
शब्दार्थः: वारिधिः = वारि (जल) + धि (धारण करने वाला) = समुद्र। सञ्जुष्टम् = भली-भाँति युक्त। लोकालोककरम् = लोक + आलोककरम् = संसार को प्रकाश देने वाला। शिवम् = कल्याणकारी।
प्र5.
यावद् भारतवर्षं स्याद् यावद् विन्ध्यहिमाचलौ।
यावद् गङ्गा च गोदा च तावदेव हि संस्कृतम्॥ — अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — यावत् भारतवर्षम् स्यात् यावत् विन्ध्य-हिमाचलौ। यावत् गङ्गा च गोदा च तावत् एव हि संस्कृतम्।
अन्वयः — यावत् भारतवर्षं स्यात्, यावत् विन्ध्यहिमाचलौ (स्याताम्), यावत् गङ्गा च गोदा च (स्याताम्), तावत् एव हि संस्कृतम् (स्यात्)।

अर्थः (हिन्दी) — जब तक भारतवर्ष रहेगा, जब तक विन्ध्याचल और हिमालय रहेंगे, जब तक गङ्गा और गोदावरी बहती रहेंगी — तब तक संस्कृत भी रहेगी।

भावः: यह पाँचों प्रशस्तियों का चरम श्लोक है। कवि संस्कृत की आयु को नदियों और पर्वतों की आयु से जोड़ देता है — अर्थात् संस्कृत भारत की भूमि जितनी ही स्थायी है। ध्यान दीजिए कि उसने उत्तर का हिमालय और दक्षिण का विन्ध्य, उत्तर की गङ्गा और दक्षिण की गोदावरी — दोनों दिशाओं से एक-एक चुना है। इससे सिद्ध होता है कि संस्कृत किसी एक प्रदेश की नहीं, पूरे भारत की भाषा है।
व्याकरण-सङ्केतः: यावत् … तावत् — यह नित्य-सम्बन्धी अव्यय-युग्म है (‘जब तक … तब तक’)। स्यात् — ‘अस्’ धातु, विधिलिङ् लकार, प्रथमपुरुष एकवचन = ‘हो/रहे’। विन्ध्यहिमाचलौद्वन्द्व समास, द्विवचन (विन्ध्यः च हिमाचलः च)।
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