दीपकम् अध्याय 7 श्लोक-व्याख्या (पदच्छेदः · अन्वयः · अर्थः · भावः)

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
श्रुतिसुखनिनदे सकलप्रमोदे
स्मृतिहितवरदे सरसविनोदे।
गति-मति-प्रेरक-काव्यविशारदे
तव संस्कृतिरेषा, सुन्दरसुरभाषा॥ ३॥ — पदच्छेदं, अन्वयम्, अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — श्रुतिसुखनिनदे सकलप्रमोदे स्मृतिहितवरदे सरसविनोदे गति-मति-प्रेरककाव्यविशारदे तव संस्कृतिः एषा सुन्दरसुरभाषा।
अन्वयः — हे ! श्रुतिसुखनिनदे ! सकलप्रमोदे ! स्मृतिहितवरदे ! सरसविनोदे ! गति-मति-प्रेरक-काव्यविशारदे ! तव एषा संस्कृतिः (अस्ति)। (त्वं) सुन्दरसुरभाषा (असि)।

अर्थः (हिन्दी) — हे कानों को सुख देने वाली ध्वनि वाली ! हे सबको आनन्द देने वाली ! हे स्मृति को हितकारी वरदान देने वाली ! हे मधुर विनोद करने वाली ! हे गति और बुद्धि को प्रेरणा देने वाले काव्य में पारंगत ! — यह संस्कृति तुम्हारी ही है, हे सुन्दर देवभाषा !

भावः: पुस्तक का भावार्थ — वस्तुतः रमणीया देवत्वविधायिनी संस्कृतभाषा संस्कृतेः जननी सदृशी अस्ति। संस्कृतभाषायाः ध्वनिश्रवणेन सुखं वर्धते, सर्वे जनाः आनन्दिताः भवन्ति। संस्कृतभाषा वररूपेण संस्कारजन्यं ज्ञानं प्रयच्छति, सरसं विनोदभावं च प्रकाशयति। मानवजीवने उत्तमां गतिं बुद्धिं च प्रददाति। काव्यशास्त्रपरिपूर्णा संस्कृतभाषा अस्माकं संस्कृतिं रक्षति प्रसारयति च।
यह पद्य भाषा और संस्कृति के सम्बन्ध को स्पष्ट करता है — ‘संस्कृति’ शब्द ही ‘संस्कृत’ से बना है। कवि कहता है कि हमारी संस्कृति संस्कृत की ही देन है; भाषा उसे केवल सुरक्षित नहीं रखती, फैलाती भी है।
काव्य-सौन्दर्यम्: यह पूरा पद्य सम्बोधनों की माला है — पाँचों पद सम्बोधन एकवचन में हैं और ‘-दे’ में अन्त होकर अन्त्यानुप्रास बनाते हैं (निनदे, प्रमोदे, वरदे, विनोदे, विशारदे)। इसी कारण अभ्यास-प्रश्न २ (ङ) में इन्हीं सम्बोधनपदों की सूची माँगी गई है।
व्याकरण-सङ्केतः: संस्कृतिरेषा का सन्धि-विच्छेद = संस्कृतिः + एषा (विसर्ग सन्धि — ‘इः’ के बाद स्वर आने पर विसर्ग का ‘र्’ हो गया)। संस्कृतिः — प्रथमा विभक्ति, एकवचन, स्त्रीलिङ्ग।
प्र2.
नवरस-रुचिरालङ्कृति-धारा
वेदविषय-वेदान्त-विचारा।
वैद्य-व्योम-शास्त्रादि-विहारा
विजयते धरायां, सुन्दरसुरभाषा॥ ४॥ — पदच्छेदं, अन्वयम्, अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — नवरस-रुचिरा अलङ्कृति-धारा वेदविषय-वेदान्त-विचारा। वैद्य-व्योम-शास्त्रादि-विहारा विजयते धरायाम् सुन्दरसुरभाषा।
अन्वयः — नवरस-रुचिरा अलङ्कृतिधारा वेदविषयवेदान्तविचारा वैद्यव्योमशास्त्रादिविहारा धरायां सुन्दरसुरभाषा विजयते।

अर्थः (हिन्दी) — नौ रसों से मनोहर, अलङ्कारों को धारण करने वाली, वेद तथा वेदान्त के विचारों से युक्त और आयुर्वेद, खगोलशास्त्र आदि शास्त्रों में विचरण करने वाली सुन्दर देवभाषा इस धरती पर विजयी होती है

भावः: पुस्तक का भावार्थ — संस्कृतकाव्यशास्त्रेषु शृङ्गार-हास्य-करुण-रौद्र-वीर-भयानक-बीभत्स-अद्भुत-शान्त-प्रभृतयः नवसंख्याकाः रुचिराः रसाः सन्ति। शब्दार्थपूर्णाः विविधाः अलङ्काराः शोभन्ते। वेद-उपनिषद्-वेदान्त-पुराणादीनां विचाराः जनान् अभिप्रेरयन्ति। चिकित्साविज्ञान-खगोलशास्त्रादिभिः सह संस्कृतभाषा पृथिव्यां विहरति। एवं संस्कृतभाषा सर्वत्र विजयते।
यह पद्य पूरे गीत का निष्कर्ष है। पहले तीन पद्यों में कवि ने संस्कृत के सौन्दर्य, उसके रचयिताओं और उसकी संस्कृति की बात की। अब वह उसका विस्तार दिखाता है — वह केवल काव्य की भाषा नहीं, दर्शन (वेदान्त), चिकित्सा (आयुर्वेद) और खगोल (व्योमशास्त्र) की भी भाषा है। इसी सर्वव्यापकता के कारण वह ‘धरायां विजयते’ — धरती पर विजयी है।
ध्यातव्यम् — नव रसाः: शृङ्गारः, हास्यः, करुणः, रौद्रः, वीरः, भयानकः, बीभत्सः, अद्भुतः, शान्तः। अभ्यास-प्रश्न १ (घ) तथा २ (ग) दोनों इसी सूची पर आधारित हैं।
व्याकरण-सङ्केतः: रुचिरालङ्कृति = रुचिरा + अलङ्कृति (दीर्घ स्वर सन्धि — आ + अ = आ)। विजयते — ‘वि + जि’ धातु, आत्मनेपद, लट् लकार, प्रथमपुरुष एकवचन। धरायाम् — सप्तमी एकवचन (आधार अर्थ में) — अभ्यास-प्रश्न ४ में यही पूछा गया है।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ