प्र1.
श्रुतिसुखनिनदे सकलप्रमोदे
स्मृतिहितवरदे सरसविनोदे।
गति-मति-प्रेरक-काव्यविशारदे
तव संस्कृतिरेषा, सुन्दरसुरभाषा॥ ३॥ — पदच्छेदं, अन्वयम्, अर्थं भावं च लिखत।
स्मृतिहितवरदे सरसविनोदे।
गति-मति-प्रेरक-काव्यविशारदे
तव संस्कृतिरेषा, सुन्दरसुरभाषा॥ ३॥ — पदच्छेदं, अन्वयम्, अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — श्रुतिसुखनिनदे सकलप्रमोदे स्मृतिहितवरदे सरसविनोदे गति-मति-प्रेरककाव्यविशारदे तव संस्कृतिः एषा सुन्दरसुरभाषा।
अन्वयः — हे ! श्रुतिसुखनिनदे ! सकलप्रमोदे ! स्मृतिहितवरदे ! सरसविनोदे ! गति-मति-प्रेरक-काव्यविशारदे ! तव एषा संस्कृतिः (अस्ति)। (त्वं) सुन्दरसुरभाषा (असि)।
अन्वयः — हे ! श्रुतिसुखनिनदे ! सकलप्रमोदे ! स्मृतिहितवरदे ! सरसविनोदे ! गति-मति-प्रेरक-काव्यविशारदे ! तव एषा संस्कृतिः (अस्ति)। (त्वं) सुन्दरसुरभाषा (असि)।
अर्थः (हिन्दी) — हे कानों को सुख देने वाली ध्वनि वाली ! हे सबको आनन्द देने वाली ! हे स्मृति को हितकारी वरदान देने वाली ! हे मधुर विनोद करने वाली ! हे गति और बुद्धि को प्रेरणा देने वाले काव्य में पारंगत ! — यह संस्कृति तुम्हारी ही है, हे सुन्दर देवभाषा !
भावः: पुस्तक का भावार्थ — वस्तुतः रमणीया देवत्वविधायिनी संस्कृतभाषा संस्कृतेः जननी सदृशी अस्ति। संस्कृतभाषायाः ध्वनिश्रवणेन सुखं वर्धते, सर्वे जनाः आनन्दिताः भवन्ति। संस्कृतभाषा वररूपेण संस्कारजन्यं ज्ञानं प्रयच्छति, सरसं विनोदभावं च प्रकाशयति। मानवजीवने उत्तमां गतिं बुद्धिं च प्रददाति। काव्यशास्त्रपरिपूर्णा संस्कृतभाषा अस्माकं संस्कृतिं रक्षति प्रसारयति च।
यह पद्य भाषा और संस्कृति के सम्बन्ध को स्पष्ट करता है — ‘संस्कृति’ शब्द ही ‘संस्कृत’ से बना है। कवि कहता है कि हमारी संस्कृति संस्कृत की ही देन है; भाषा उसे केवल सुरक्षित नहीं रखती, फैलाती भी है।
यह पद्य भाषा और संस्कृति के सम्बन्ध को स्पष्ट करता है — ‘संस्कृति’ शब्द ही ‘संस्कृत’ से बना है। कवि कहता है कि हमारी संस्कृति संस्कृत की ही देन है; भाषा उसे केवल सुरक्षित नहीं रखती, फैलाती भी है।
काव्य-सौन्दर्यम्: यह पूरा पद्य सम्बोधनों की माला है — पाँचों पद सम्बोधन एकवचन में हैं और ‘-दे’ में अन्त होकर अन्त्यानुप्रास बनाते हैं (निनदे, प्रमोदे, वरदे, विनोदे, विशारदे)। इसी कारण अभ्यास-प्रश्न २ (ङ) में इन्हीं सम्बोधनपदों की सूची माँगी गई है।
व्याकरण-सङ्केतः: संस्कृतिरेषा का सन्धि-विच्छेद = संस्कृतिः + एषा (विसर्ग सन्धि — ‘इः’ के बाद स्वर आने पर विसर्ग का ‘र्’ हो गया)। संस्कृतिः — प्रथमा विभक्ति, एकवचन, स्त्रीलिङ्ग।