दीपकम् अध्याय 9 अभ्यासात् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
……………………… जनाः कथं निरामयाः भवन्ति ?
उत्तर
उत्तरम् — भारतवर्षे जनाः कथं निरामयाः भवन्ति ?
क्यों यही पद: रिक्तस्थान से पहले कोई क्रिया नहीं, और ‘जनाः’ कर्ता है — अतः यहाँ स्थान बताने वाला पद चाहिए। पट्टिका में केवल ‘भारतवर्षे’ ही सप्तमी विभक्ति (अधिकरण) में है। अर्थ बनता है — ‘भारत में लोग कैसे नीरोग रहते हैं ?’ — और यही तो प्रश्न धन्वन्तरि के मन में था।
व्याकरण-सङ्केतः: भारतवर्षे — नपुंसकलिङ्ग, सप्तमी एकवचननिरामयाः ‘जनाः’ का विशेषण है, इसलिए वह भी पुंलिङ्ग, प्रथमा, बहुवचन में है — विशेषण-विशेष्य का वही नियम।
प्र2.
अन्ते सः वैद्यस्य वाग्भटस्य ……………………… गतवान्।
उत्तर
उत्तरम् — अन्ते सः वैद्यस्य वाग्भटस्य कुटीरसमीपं गतवान्।
क्यों यही पद: ‘गतवान्’ (गया) क्रिया गन्तव्य माँगती है, और गन्तव्य में द्वितीया विभक्ति आती है (कर्मणि द्वितीया)। पट्टिका में केवल ‘कुटीरसमीपं’ द्वितीया एकवचन में है। साथ ही ‘वाग्भटस्य’ षष्ठी है — किसकी कुटी ? वाग्भट की।
व्याकरण-सङ्केतः: कुटीरसमीपम् = कुटीरस्य समीपम् — षष्ठी-तत्पुरुष समास; नपुंसकलिङ्ग, द्वितीया, एकवचन।
प्र3.
तव उत्कृष्टेन ……………………… अहम् अतीव सन्तुष्टः अस्मि।
उत्तर
उत्तरम् — तव उत्कृष्टेन आयुर्वेदज्ञानेन अहम् अतीव सन्तुष्टः अस्मि।

यह वही वाक्य है जो धन्वन्तरि ने वाग्भट से कहा था — तुम्हारे उत्कृष्ट आयुर्वेद-ज्ञान से मैं अत्यन्त सन्तुष्ट हूँ; अब तुम आयुर्वेद के अष्टाङ्ग-विचार का सारभूत ग्रन्थ रचो।

क्यों यही पद: ‘उत्कृष्टेन’ विशेषण तृतीया एकवचन में है — तो उसका विशेष्य भी तृतीया एकवचन में ही होगा। पट्टिका में केवल ‘आयुर्वेदज्ञानेन’ तृतीया में है। ‘सन्तुष्टः’ के साथ जिस कारण से सन्तोष हो, उसमें तृतीया आती है (हेतौ तृतीया)।
प्र4.
महर्षेः ……………………… नाम भवन्तः श्रुतवन्तः स्युः।
उत्तर
उत्तरम् — महर्षेः चरकस्य नाम भवन्तः श्रुतवन्तः स्युः।
क्यों यही पद: ‘महर्षेः’ षष्ठी एकवचन में है; उसके साथ जुड़ने वाला नाम भी षष्ठी एकवचन में चाहिए — ‘चरकस्य’। अर्थ — ‘महर्षि चरक का नाम आप लोगों ने सुना ही होगा।’ पाठ में वाग्भट यही कहकर चरकसंहिता के श्लोक सुनाते हैं।
व्याकरण-सङ्केतः: स्युः — अस् धातु, विधिलिङ् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन = ‘होंगे / हों’। यहाँ यह सम्भावना बताता है — ‘सुना ही होगा’।
प्र5.
लघुद्रव्याणि ……………………… सेवनेन हानिकराणि जायन्ते।
उत्तर
उत्तरम् — लघुद्रव्याणि अतिमात्रं सेवनेन हानिकराणि जायन्ते।
क्यों यही पद: बचा हुआ एकमात्र पद यही है, और अर्थ भी ठीक बैठता है — यह श्लोक २ का सीधा भावार्थ है : गरिष्ठ द्रव्य भी थोड़ी मात्रा में खाने पर सुपाच्य हो जाते हैं, और हलके द्रव्य भी अधिक मात्रा में खाने पर हानिकारक बन जाते हैं। अर्थात् वस्तु नहीं, मात्रा निर्णय करती है।
ध्यातव्यम्: यही ‘मितभुक्’ का सार है — कोई भोजन अपने-आप में बुरा नहीं; मात्रा बिगड़ने पर अच्छा भोजन भी रोग बन जाता है।
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