दीपकम् अध्याय 9 अभ्यासात् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
मधुरां वाणीं श्रुत्वा चिकित्सानिरतः वाग्भटः किम् अकरोत् ?
उत्तर
उत्तरम् — मधुरां वाणीं श्रुत्वा चिकित्सानिरतः वाग्भटः प्राङ्गणम् आगत्य सर्वासु दिक्षु अपश्यत्।

क्षण भर में उसे वह मनोहर तोता दिख गया — क्षणात् वाग्भटः मनोहरं तं शुकम् अपश्यत्।

हिन्दी अर्थ: मीठी वाणी सुनकर चिकित्सा में लगे हुए वाग्भट आँगन में आए और चारों दिशाओं में देखा। एक ही क्षण में उन्होंने उस सुन्दर तोते को देख लिया।
व्याकरण-सङ्केतः: श्रुत्वा तथा आगत्य — दोनों क्त्वा / ल्यप् प्रत्ययान्त अव्यय (पूर्वकालिक क्रिया); उपसर्ग हो तो ‘क्त्वा’ के स्थान पर ‘ल्यप्’ होता है — इसीलिए ‘आ + गम् + ल्यप् = आगत्य’। दिक्षु — ‘दिश्’ शब्द, सप्तमी बहुवचन।
प्र2.
वाग्भटः झटिति किम् अकरोत् ?
उत्तर
उत्तरम् — वाग्भटः झटिति तस्मै विहगाय मधुराणि फलानि समर्पितवान्।

परन्तु उस पक्षी ने फल नहीं लिए — परन्तु सः खगः फलानि न गृहीत्वा पुनरपि तथैव ‘कोऽरुक्’ इति प्रश्नस्वरेण शब्दम् अकरोत्।

हिन्दी अर्थ: वाग्भट ने तुरन्त उस पक्षी को मीठे फल अर्पित किए। पर वह पक्षी फल न लेकर फिर उसी तरह प्रश्न-भरे स्वर में ‘कोऽरुक्’ बोलता रहा। इसी से वाग्भट समझ गए कि जब तक इसके प्रश्न का उत्तर नहीं मिलेगा, यह भोजन नहीं चाहेगा।
व्याकरण-सङ्केतः: तस्मै विहगायचतुर्थी विभक्ति, एकवचन; जिसे कुछ दिया जाए वह सम्प्रदान होता है — सम्प्रदाने चतुर्थी। यहाँ ‘तस्मै’ (सर्वनाम) और ‘विहगाय’ (संज्ञा) दोनों एक ही विभक्ति-वचन में हैं।
प्र3.
छात्राः पुनः जिज्ञासया आचार्यं किम् अपृच्छन् ?
उत्तर
उत्तरम् — छात्राः पुनः जिज्ञासया अपृच्छन् — “आचार्य ! ‘हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक्’ इति एतेषां कः आशयः ?”

इसी प्रश्न के उत्तर में वाग्भट ने महर्षि चरक के तीन श्लोक सुनाए — एक हितभुक् पर, एक मितभुक् पर और एक ऋतुभुक् पर।

हिन्दी अर्थ: छात्रों ने फिर जिज्ञासा से पूछा — “आचार्य ! ‘हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक्’ — इनका क्या आशय है ?”
व्याकरण-सङ्केतः: जिज्ञासया — तृतीया एकवचन, स्त्रीलिङ्ग; ‘किस प्रकार से पूछा’ यह बताने वाली करण/हेतु-तृतीयाअपृच्छन् — प्रच्छ् धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन = ‘उन्होंने पूछा’।
प्र4.
भगवान् धन्वन्तरिः अस्माकं कृते संक्षेपेण किं प्रदत्तवान् ?
उत्तर
उत्तरम् — भगवान् धन्वन्तरिः अस्माकं कृते संक्षेपेण स्वास्थ्यरक्षणाय सूत्ररूपेण सन्देशं प्रदत्तवान्।

वह सन्देश यही है — व्यायामः प्रातरुत्थाय, नित्यं दन्तविशोधनम्। स्वच्छजलेन सुस्नानं, बुभुक्षायाञ्च भोजनम्॥

सन्देश का सार (पाठानुसार): प्रतिदिन प्रातःकाल ही जागना चाहिए, उसके बाद व्यायाम करना चाहिए; फिर भली प्रकार दाँत साफ़ करने चाहिए; स्वच्छ जल से अच्छी तरह स्नान करना चाहिए; और जब पेट में सचमुच भूख लगे तभी हितकर, थोड़ा तथा ऋतु के अनुकूल भोजन लेना चाहिए।
व्याकरण-सङ्केतः: अस्माकं कृते = ‘हमारे लिए’ — ‘कृते’ के योग में षष्ठी आती है। स्वास्थ्यरक्षणायचतुर्थी एकवचन, प्रयोजन बताने के लिए (तादर्थ्ये चतुर्थी)।
प्र5.
ऋषयः नित्यं कां प्रार्थनां कुर्वन्ति ?
उत्तर
उत्तरम् — ऋषयः नित्यम् इमां प्रार्थनां कुर्वन्ति —
सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥
हिन्दी अर्थ: सब सुखी हों, सब नीरोग हों, सब कल्याण देखें, कोई भी दुःख का भागी न बने। — ऋषियों की प्रार्थना किसी एक के लिए नहीं, सबके लिए है; और उसमें ‘निरामयाः’ (नीरोग) शब्द इसी पाठ का केन्द्रीय शब्द है।
व्याकरण-सङ्केतः: भवन्तु, सन्तु, पश्यन्तु — तीनों लोट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन (प्रार्थना/आशीर्वाद का लकार)। मा … भवेत् — निषेध के लिए ‘न’ नहीं, ‘मा’ का प्रयोग होता है और उसके साथ विधिलिङ् या लुङ् आता है।
पाठ से जोड़िए: पाठ की अन्तिम पंक्ति में यही भाव है — वस्तुतः सर्वे नियमित-हितकर-भोजनेन रोगमुक्ताः भवेयुः — अर्थात् यह प्रार्थना केवल कामना नहीं, नियमित और हितकर भोजन से सचमुच पूरी होती है।
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