प्र1.
मधुरां वाणीं श्रुत्वा चिकित्सानिरतः वाग्भटः किम् अकरोत् ?
उत्तर
उत्तरम् — मधुरां वाणीं श्रुत्वा चिकित्सानिरतः वाग्भटः प्राङ्गणम् आगत्य सर्वासु दिक्षु अपश्यत्।
क्षण भर में उसे वह मनोहर तोता दिख गया — क्षणात् वाग्भटः मनोहरं तं शुकम् अपश्यत्।
हिन्दी अर्थ: मीठी वाणी सुनकर चिकित्सा में लगे हुए वाग्भट आँगन में आए और चारों दिशाओं में देखा। एक ही क्षण में उन्होंने उस सुन्दर तोते को देख लिया।
व्याकरण-सङ्केतः: श्रुत्वा तथा आगत्य — दोनों क्त्वा / ल्यप् प्रत्ययान्त अव्यय (पूर्वकालिक क्रिया); उपसर्ग हो तो ‘क्त्वा’ के स्थान पर ‘ल्यप्’ होता है — इसीलिए ‘आ + गम् + ल्यप् = आगत्य’। दिक्षु — ‘दिश्’ शब्द, सप्तमी बहुवचन।