दीपकम् अध्याय 9 अभ्यासात् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
अस्माभिः नित्यं व्यायामः, स्नानं, दन्तधावनं, बुभुक्षायाञ्च भोजनं कर्तव्यम्।
उत्तर
सम्बद्धः श्लोकः (श्लोकः ४) —
व्यायामः प्रातरुत्थाय, नित्यं दन्तविशोधनम्।
स्वच्छजलेन सुस्नानं, बुभुक्षायाञ्च भोजनम्॥ ४॥
मेल क्यों बैठता है: वाक्य में गिनाई गई चारों बातें — व्यायाम, स्नान, दन्तधावन और भूख लगने पर भोजन — इसी श्लोक की चार बातें हैं, उसी क्रम में। ‘दन्तधावनम्’ श्लोक का ‘दन्तविशोधनम्’ है और ‘स्नानम्’ श्लोक का ‘स्वच्छजलेन सुस्नानम्’।
भावार्थः (पाठानुसार): प्रतिदिनं प्रातः एव जागरणं कुर्यात्, ततः परं व्यायामः करणीयः। पुनः सम्यक्तया दन्तमार्जनं करणीयम्। स्वच्छजलेन उत्तमरीत्या स्नानं कर्त्तव्यम्। यदा उदरे बुभुक्षा भवति तदा एव हितकरं स्वल्पं तथा ऋत्वनुकूलं भोजनं ग्रहणीयम्।
प्र2.
अस्माभिः हितकरः आहारः सेवनीयः येन विकाराणां शमनं स्वास्थ्यस्य च रक्षणं भवेत्।
उत्तर
सम्बद्धः श्लोकः (श्लोकः १) —
तच्च नित्यं प्रयुञ्जीत, स्वास्थ्यं येनानुवर्तते।
अजातानां विकाराणामनुत्पत्तिकरं च यत्॥ १॥
मेल क्यों बैठता है: वाक्य की दो शर्तें — (1) स्वास्थ्य की रक्षा हो, (2) विकार न हों — श्लोक की ठीक दो शर्तें हैं : ‘येन स्वास्थ्यम् अनुवर्तते’ तथा ‘अजातानां विकाराणाम् अनुत्पत्तिकरम्’। यही हितभुक् की परिभाषा है।
सूक्ष्म बात: श्लोक ‘अजातानाम्’ कहता है — जो रोग अभी हुए ही नहीं, उन्हें होने ही न देना। अर्थात् आयुर्वेद की दृष्टि पहले रोग-निवारण पर है, बाद में चिकित्सा पर।
प्र3.
ऋतोः अनुसारं भोजनेन बलस्य वर्णस्य च अभिवृद्धिः भवति।
उत्तर
सम्बद्धः श्लोकः (श्लोकः ३) —
तस्याशिताद्यादाहारात् बलं वर्णश्च वर्धते।
तस्यर्तुसात्म्यं विदितं चेष्टाहारव्यपाश्रयम्॥ ३॥
मेल क्यों बैठता है: वाक्य के दो शब्द ही उत्तर दे देते हैं — बलम् और वर्णः; श्लोक में भी ‘बलं वर्णश्च वर्धते’ है। और ‘ऋतोः अनुसारम्’ का प्रतिशब्द श्लोक में ‘ऋतुसात्म्यम्’ है। यही ऋतुभुक् का लक्षण है।
भावार्थः (पाठानुसार): जो व्यक्ति ऋतुओं के अनुकूल स्वास्थ्यप्रद आहार लेना जानता है और उसी के अनुसार आचरण करता है, उसका खाया-पिया सब बल बढ़ाने वाला, रंग-रूप निखारने वाला, सुख बढ़ाने वाला और आयु बढ़ाने वाला होता है।
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