प्र1.
तच्च नित्यं प्रयुञ्जीत, स्वास्थ्यं येनानुवर्तते। अजातानां विकाराणामनुत्पत्तिकरं च यत्॥ १॥ — अस्य श्लोकस्य पदच्छेदः, अन्वयः, अर्थः, भावः च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — तत् च नित्यम् प्रयुञ्जीत स्वास्थ्यम् येन अनुवर्तते, अजातानाम् विकाराणाम् अनुत्पत्तिकरम् च यत्।
अन्वयः — अजातानां विकाराणां च यत् अनुत्पत्तिकरं, येन स्वास्थ्यम् अनुवर्तते च तत् नित्यं प्रयुञ्जीत।
अन्वयः — अजातानां विकाराणां च यत् अनुत्पत्तिकरं, येन स्वास्थ्यम् अनुवर्तते च तत् नित्यं प्रयुञ्जीत।
अर्थः (हिन्दी): जिस (आहार) से स्वास्थ्य बना रहे, और जो अभी न हुए (भविष्य के) रोगों को उत्पन्न ही न होने दे — उसी का नित्य सेवन करना चाहिए।
भावार्थः (पाठानुसार): अर्थात् यस्य आहारस्य सेवनेन स्वास्थ्यस्य रक्षणं भवेत्, न जातानाम् अर्थात् अनुत्पन्नानां विकाराणाम् उत्पत्तिः न भवेत्, तादृशः आहारः सेवनीयः।
भावः: यह हितभुक् की परिभाषा है। श्लोक भोजन की सूची नहीं देता — कसौटी देता है : जो खाना स्वास्थ्य टिकाए और नए रोग न जन्माए, वही ‘हित’ है। इसीलिए कोई एक भोजन सबके लिए हितकर नहीं होता; हर व्यक्ति को अपनी प्रकृति के अनुसार यह कसौटी लगानी पड़ती है।
व्याकरण-सङ्केतः: प्रयुञ्जीत — प्र + युज् धातु, विधिलिङ् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन, आत्मनेपद = ‘सेवन करना चाहिए’। विधिलिङ् ही विधान/उपदेश का लकार है, इसीलिए आयुर्वेद के नियम प्रायः इसी में कहे जाते हैं।