प्र1.
“भोजनं परमेशस्य, भक्तये जीवनाय च। त्वं तु मूर्ख विजानासि भोजनार्थं हि जीवनम्॥” (सुमनोवाटिका) — अस्याः सूक्तेः अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
अन्वयः — भोजनं परमेशस्य भक्तये जीवनाय च (अस्ति)। हे मूर्ख ! त्वं तु ‘भोजनार्थं हि जीवनम्’ (इति) विजानासि।
अर्थः (हिन्दी): भोजन तो ईश्वर की भक्ति के लिए और जीवन धारण करने के लिए है। पर अरे मूर्ख ! तू तो समझता है कि जीवन ही भोजन के लिए है।
भावः: सूक्ति एक ही वाक्य को उलटकर पूरा उपदेश दे देती है — ‘जीवन के लिए भोजन’ ठीक है, ‘भोजन के लिए जीवन’ भूल है। जो खाने को ही जीवन का लक्ष्य बना ले, वह न स्वस्थ रहता है न सन्तुष्ट। भोजन साधन है, साध्य नहीं।
व्याकरण-सङ्केतः: भक्तये तथा जीवनाय — दोनों चतुर्थी एकवचन, प्रयोजन बताने के लिए (तादर्थ्ये चतुर्थी)। मूर्ख — सम्बोधन प्रथमा, एकवचन।