दीपकम् अध्याय 9 योग्यताविस्तरः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
“भोजनं परमेशस्य, भक्तये जीवनाय च। त्वं तु मूर्ख विजानासि भोजनार्थं हि जीवनम्॥” (सुमनोवाटिका) — अस्याः सूक्तेः अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
अन्वयः — भोजनं परमेशस्य भक्तये जीवनाय च (अस्ति)। हे मूर्ख ! त्वं तु ‘भोजनार्थं हि जीवनम्’ (इति) विजानासि।
अर्थः (हिन्दी): भोजन तो ईश्वर की भक्ति के लिए और जीवन धारण करने के लिए है। पर अरे मूर्ख ! तू तो समझता है कि जीवन ही भोजन के लिए है।
भावः: सूक्ति एक ही वाक्य को उलटकर पूरा उपदेश दे देती है — ‘जीवन के लिए भोजन’ ठीक है, ‘भोजन के लिए जीवन’ भूल है। जो खाने को ही जीवन का लक्ष्य बना ले, वह न स्वस्थ रहता है न सन्तुष्ट। भोजन साधन है, साध्य नहीं।
व्याकरण-सङ्केतः: भक्तये तथा जीवनाय — दोनों चतुर्थी एकवचन, प्रयोजन बताने के लिए (तादर्थ्ये चतुर्थी)। मूर्खसम्बोधन प्रथमा, एकवचन
प्र2.
“अनारोग्यमनायुष्यमस्वर्ग्यं चातिभोजनम्। अपुण्यं लोकविद्विष्टं तस्मात्तत्परिवर्जयेत्॥” (मनुस्मृतिः २/५७) — अस्याः सूक्तेः अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — अनारोग्यम् अनायुष्यम् अस्वर्ग्यम् च अतिभोजनम् अपुण्यम् लोकविद्विष्टम् तस्मात् तत् परिवर्जयेत्।
अन्वयः — अतिभोजनम् अनारोग्यम्, अनायुष्यम्, अस्वर्ग्यम्, अपुण्यं लोकविद्विष्टं च (भवति); तस्मात् तत् परिवर्जयेत्।
अर्थः (हिन्दी): अधिक भोजन करना आरोग्य नष्ट करने वाला, आयु घटाने वाला, स्वर्ग से वञ्चित करने वाला, पुण्य-रहित तथा लोक में निन्दित है; इसलिए उसे पूरी तरह छोड़ देना चाहिए।
भावः: यह ठीक मितभुक् का समर्थन है। श्लोक अतिभोजन के पाँच दोष एक साथ गिनाता है — शरीर (अनारोग्य), आयु (अनायुष्य), परलोक (अस्वर्ग्य), पुण्य (अपुण्य) और समाज (लोकविद्विष्ट)। इसीलिए वह ‘कम करो’ नहीं, परिवर्जयेत् — ‘बिलकुल छोड़ दो’ — कहता है।
व्याकरण-सङ्केतः: अनारोग्यम्, अनायुष्यम्, अस्वर्ग्यम्, अपुण्यम् — चारों में नञ् समास (न + आरोग्यम् = अनारोग्यम्; स्वर से पहले ‘न’ का ‘अन्’ हो जाता है)। परिवर्जयेत् — परि + वृज् (णिच्), विधिलिङ्, प्रथम पुरुष, एकवचन
प्र3.
“मिताहारो नरः सोढुं शक्तः कष्ट-शतं सुखम्। अनभ्यस्तो हि कष्टानामध्यशनो विपद्यते॥” (सुमनोवाटिका) — अस्याः सूक्तेः अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — मिताहारः नरः सोढुम् शक्तः कष्ट-शतम् सुखम्। अनभ्यस्तः हि कष्टानाम् अध्यशनः विपद्यते।
अन्वयः — मिताहारः नरः कष्ट-शतं सुखं सोढुं शक्तः (भवति)। कष्टानाम् अनभ्यस्तः अध्यशनः हि विपद्यते।
अर्थः (हिन्दी): मिताहारी (नपा-तुला खाने वाला) मनुष्य सैकड़ों कष्ट भी सुख से सह लेने में समर्थ होता है; परन्तु जो अधिक खाने वाला है और कष्ट सहने का अभ्यासी नहीं, वह विपत्ति में पड़ जाता है।
भावः: यहाँ मिताहार का लाभ केवल पाचन तक सीमित नहीं है — वह सहनशक्ति देता है। संयम का अभ्यास शरीर को कठिनाई सहने योग्य बनाता है; अति-भोजन उसे कोमल और असहिष्णु बना देता है। यही ‘मितभुक्’ का जीवनगत फल है।
व्याकरण-सङ्केतः: सोढुम् — सह् धातु + तुमुन् प्रत्यय (अव्यय) = ‘सहने के लिए’। अध्यशनः = अधि + अशनम् — अधिक/असमय भोजन करने वाला। मिताहारः = मितः आहारः यस्य सः — बहुव्रीहि समास
प्र4.
“अशीतेनाम्भसा स्नानं कवोष्णदुग्धसेवनम्। एतद् वो मानुषाः पथ्यं स्निग्धमुष्णं च भोजनम्॥” (भोजप्रबन्धः) — अस्याः सूक्तेः अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — अशीतेन अम्भसा स्नानम् कवोष्ण-दुग्ध-सेवनम्। एतत् वः मानुषाः पथ्यम् स्निग्धम् उष्णम् च भोजनम्।
अन्वयः — हे मानुषाः ! अशीतेन अम्भसा स्नानम्, कवोष्ण-दुग्ध-सेवनम्, स्निग्धम् उष्णं च भोजनम् — एतत् वः पथ्यम् (अस्ति)।
अर्थः (हिन्दी): हे मनुष्यो ! बिना ठण्डे (अर्थात् कुछ गुनगुने) जल से स्नान, हलके गरम दूध का सेवन तथा स्निग्ध और गरम भोजन — यही तुम्हारे लिए पथ्य (हितकर) है।
भावः: यह सूक्ति पाठ की दो बातों को एक साथ जोड़ती है — श्लोक ४ का ‘स्वच्छजलेन सुस्नानम्’ और गीता के सात्त्विक आहार का ‘स्निग्धाः’ गुण। साथ ही यह पाठ के आरम्भ को भी सन्तुलित करती है : भोजन उष्ण हो — यह पथ्य है; पर अत्युष्ण हो — तो हितकर नहीं। संयम दोनों ओर चाहिए।
व्याकरण-सङ्केतः: अशीतेन अम्भसातृतीया एकवचन (करण)। कवोष्णम् = ईषत् उष्णम् (थोड़ा गरम, गुनगुना) — ‘कु/कव’ यहाँ ‘थोड़ा’ के अर्थ में। वः = युष्मद् शब्द का चतुर्थी/षष्ठी बहुवचन का पर्याय-रूप = ‘तुम्हारे लिए’।
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