कुतूहल अध्याय 10 क्रियाकलाप 10.4

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
अब झिरी और टॉर्च को थोड़ा-सा एक ओर हटाइए ताकि प्रकाश पुंज दर्पण पर एक भिन्न कोण पर आपतित हो (चित्र 10.8, ख)। क्या दर्पण के सापेक्ष परावर्तित किरण का कोण भी परिवर्तित हो जाता है?
उत्तर

हाँ। आपतित पुंज का कोण बदलते ही परावर्तित पुंज भी नई दिशा में चला जाता है — और तुरंत, धीरे-धीरे नहीं।

ऐसा क्यों होता है: दर्पण हिला नहीं है, इसलिए आपतन बिंदु पर अभिलंब की दिशा वही है। केवल आपतित किरण घुमाई गई है। परावर्तित किरण को उसी अभिलंब से सदैव उतना ही कोण बनाना है जितना आपतित किरण बनाती है, इसलिए आपतित पुंज को जितने कोण से घुमाया जाए, परावर्तित पुंज भी उतने ही कोण से घूमता है — किंतु अभिलंब की दूसरी ओर।
स्वयं जाँचिए: टॉर्च को अभिलंब के पास लाइए, परावर्तित पुंज भी अभिलंब के पास आ जाएगा। टॉर्च को दर्पण के लगभग समांतर कर दीजिए, परावर्तित पुंज भी दर्पण से सटकर निकलेगा।
प्र2.
प्रकाश पुंज को दर्पण पर विभिन्न कोणों पर पड़ने दीजिए और अवलोकन कीजिए कि आपतन कोण बदलने से परावर्तित प्रकाश पुंज की दिशा किस प्रकार परिवर्तित होती है।
उत्तर

कोण चाहे जो चुनिए, परावर्तित पुंज सदैव अभिलंब की दूसरी ओर निकलता है, और अभिलंब से उतना ही झुका होता है जितना आपतित पुंज।

i = 40°r = 40°50°आपतित किरणपरावर्तित किरणअभिलंबदर्पणO
i और r दोनों अभिलंब से मापे जाते हैं, दर्पण से नहीं। यदि i = 40° है तो r = 40° होगा, और परावर्तित किरण तथा दर्पण के बीच का कोण 90° − 40° = 50° होगा।
आपतित पुंज अभिलंब के पास → परावर्तित पुंज भी अभिलंब के पास
आपतित पुंज अभिलंब से दूर → परावर्तित पुंज भी अभिलंब से दूर
प्रत्येक स्थिति में, परावर्तन कोण = आपतन कोण
कोण अभिलंब से ही क्यों मापा जाता है, दर्पण से क्यों नहीं: अभिलंब वह एकमात्र रेखा है जिसे उस बिंदु पर दर्पण का पृष्ठ स्वयं निर्धारित करता है। दर्पण से मापना समतल दर्पण के लिए तो चल जाता, पर वक्रित दर्पण पर बेकार होता, जहाँ ‘दर्पण’ हर बिंदु पर भिन्न ढाल का होता है। आपतन बिंदु पर पृष्ठ से 90° पर खींचा गया अभिलंब हर जगह एक ही तरह परिभाषित होता है — इसीलिए नियम उसी के सापेक्ष कहा जाता है।
प्र3.
आपने जो आरेख बनाया है उसमें आपतन कोण और परावर्तन कोण मापिए और कोण माप तालिका 10.1 में अंकित कीजिए। आपतन कोण परिवर्तित कर इस क्रियाकलाप को दोहराइए।
उत्तर

सावधानी से बनाए गए आरेख से प्राप्त प्रेक्षणों का एक नमूना नीचे दिया है। आपके अपने मान इनके निकट होंगे, बिलकुल यही नहीं — क्योंकि कोण आप स्वयं चुनते हैं।

क्र.सं.आपतन कोण (i)परावर्तन कोण (r)
120°20°
230°31°
345°44°
460°60°
570°69°

प्रत्येक पंक्ति में दोनों कोण एक डिग्री के भीतर बराबर हैं, और छोटा-सा अंतर कभी धन तो कभी ऋण है। यह मापन की त्रुटि का लक्षण है, किसी वास्तविक अंतर का नहीं — अतः निष्कर्ष है

i = r, परावर्तन का पहला नियम
एक डिग्री का अंतर आता कहाँ से है: झिरी से निकले पुंज की अपनी चौड़ाई होती है, इसलिए उसके अनुदिश खींची गई पेंसिल रेखा थोड़ी इधर-उधर हो सकती है; दर्पण हटाने के बाद उसकी स्थिति दर्शाने वाली रेखा ठीक वहीं न खिंचे यह भी संभव है; और कोणमापक आधा डिग्री तक ही पढ़ा जा सकता है। इन्हें पूरी तरह हटाया नहीं जा सकता — इसीलिए मान ‘लगभग बराबर’ आते हैं, ठीक-ठीक बराबर नहीं।
संकेत: दर्पण हटाने से पहले किरणपुंज पर दो दूर-दूर के बिंदु अंकित कर लीजिए और फिर उन्हें रेखनी से मिलाइए। लंबी रेखा से कोण कहीं अधिक शुद्ध मिलता है।
प्र4.
अंत में आपतित किरणपुंज को दर्पण पर अभिलंब के अनुदिश पड़ने दीजिए और परावर्तित किरणपुंज का अवलोकन कीजिए। यहाँ आपतन कोण एवं परावर्तन कोण के मान क्या हैं?
उत्तर

दोनों कोणों के मान शून्य हैं।

आपतित किरण अभिलंब के अनुदिश है → दोनों के बीच का कोण = i = 0°
परावर्तन के नियम से, r = i = 0°
अतः परावर्तित किरण भी अभिलंब के अनुदिश ही होती है

इसलिए किरणपुंज उसी पथ पर सीधा लौट जाता है जिससे आया था।

यह स्थिति महत्त्वपूर्ण क्यों है: यही एकमात्र दिशा है जिसमें दर्पण प्रकाश को ठीक उसके स्रोत तक लौटा देता है। साथ ही यह कोणों की परिभाषा की जाँच भी है — यदि आपने भूल से कोण दर्पण के पृष्ठ से मापा होता तो यहाँ 0° के स्थान पर 90° मिलता और तब भी ‘i = r’ सही दिखता। इसीलिए पुस्तक बार-बार कहती है कि कोण अभिलंब से ही मापिए।
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