कुतूहल अध्याय 10 क्रियाकलाप 10.5

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
अब पत्रक के बाहर निकले हुए भाग को मेज के किनारे से नीचे की तरफ मोड़ दीजिए (चित्र 10.10, ख)। क्या आप अब भी परावर्तित किरणपुंज को पत्रक के बाहर निकले हुए भाग पर देख पाते हैं।
उत्तर

नहीं। मेज के किनारे से चार्ट पत्रक का बाहर निकला भाग नीचे मोड़ते ही उस पर बनी चमकीली पट्टी लुप्त हो जाती है।

वह लुप्त क्यों होती है: परावर्तित किरणपुंज न हिला है, न बुझा है — वह अब भी ठीक उसी दिशा में, मेज के उसी समतल में चल रहा है। मुड़ा हुआ कागज उस समतल से बाहर चला गया है, इसलिए पुंज उस पर पड़ता ही नहीं। प्रकाश में कोई परिवर्तन नहीं हुआ, केवल पर्दा हट गया।
स्वयं जाँचिए: मुड़े हुए भाग से थोड़ा आगे, मेज के तल में ही, एक कागज सीधा पकड़िए। परावर्तित पुंज उस पर फिर दिखने लगेगा — प्रमाण कि वह वहाँ था ही।
प्र2.
पत्रक के मुड़े हुए भाग को सीधा कर दीजिए और अवलोकन कीजिए।
उत्तर

परावर्तित किरणपुंज बाहर निकले भाग पर ठीक वहीं फिर प्रकट हो जाता है जहाँ पहले था।

यही लुप्त होना और प्रकट होना इस क्रियाकलाप का सार है। इससे पता चलता है कि परावर्तित किरणपुंज एक ही विशेष समतल में रहता है — उसी समतल में जिसमें आपतित किरणपुंज और अभिलंब हैं — और कहीं नहीं।

परावर्तन का दूसरा नियम:
आपतित किरण, दर्पण के आपतन बिंदु पर अभिलंब तथा परावर्तित किरण
— ये सभी एक ही समतल में अवस्थित होते हैं।
मोड़ना एक उचित परीक्षण क्यों है: कागज मोड़ने से पुराने समतल से कोण बनाता हुआ एक नया समतल बन जाता है। यदि परावर्तित प्रकाश मूल समतल छोड़ सकता होता तो उसका कुछ भाग मुड़े हिस्से पर पड़ता। वहाँ कुछ नहीं पड़ता, अर्थात प्रकाश मूल समतल में ही सीमित है — और यही दूसरा नियम कहता है।
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