एक-एक करके समतल दर्पण, अवतल दर्पण तत्पश्चात उत्तल दर्पण पर प्रकाश के अनेक किरणपुंज पड़ने दीजिए। परावर्तित किरणपुंज का अवलोकन कीजिए। क्या आप वैसा कुछ अवलोकित करते हैं जैसा चित्र 10.11, ‘ख’, ‘ग’ और ‘घ’ में दर्शाया गया है?
उत्तर
हाँ, अवलोकन चित्र से ठीक मिलते हैं —
समतल दर्पण (चित्र 10.11, ख) — परावर्तित किरणपुंज भी परस्पर समांतर रहते हैं।
अवतल दर्पण (चित्र 10.11, ग) — परावर्तित किरणपुंज निकट आ जाते हैं, अर्थात अभिसरित होकर एक बिंदु पर मिलते हैं।
उत्तल दर्पण (चित्र 10.11, घ) — परावर्तित किरणपुंज फैल जाते हैं, अर्थात अपसरित हो जाते हैं।
प्रत्येक किरण i = r का ही पालन करती है। पृष्ठ वक्रित होने के कारण दर्पण के प्रत्येक बिंदु पर अभिलंब की दिशा भिन्न होती है — इसी से परावर्तित पुंज अभिसरित (अवतल) या अपसरित (उत्तल) हो जाता है। जिस बिंदु F पर समांतर किरणपुंज मिलता है — या जहाँ से आता हुआ प्रतीत होता है — उसे दर्पण का फोकस कहते हैं।
तीनों परिणाम भिन्न क्यों: इनमें से हर किरण i = r का ही पालन करती है। समतल दर्पण पर सभी अभिलंब समांतर हैं, इसलिए हर किरण उतने ही कोण से मुड़ती है और पूरा समूह समांतर बना रहता है। अवतल दर्पण पर मध्य से बाहर की ओर अभिलंब भीतर की ओर झुकते जाते हैं, इसलिए बाहरी किरणें भीतरी किरणों से अधिक भीतर मुड़ती हैं और पूरा समूह सिमट आता है। उत्तल दर्पण पर अभिलंब बाहर की ओर झुकते हैं, इसलिए बाहरी किरणें और बाहर फेंक दी जाती हैं और समूह फैल जाता है।
संकेत: कंघी, टॉर्च और दर्पण — तीनों एक ही कागज पर रखिए। टॉर्च थोड़ी भी ऊपर उठी तो किरणपुंज कागज के तल से बाहर चले जाएँगे और आकृति दिखनी कठिन हो जाएगी।
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