(ii) 50°
परावर्तन के पहले नियम से, r = i = 40°
अभिलंब दर्पण से 90° पर होता है, अतः
दर्पण से बना कोण = 90° − r = 90° − 40° = 50°
अद्यतन2026-09-05
(ii) 50°
हर स्थिति में पहले अभिलंब खींचिए — जहाँ किरण दर्पण से मिलती है वहाँ पृष्ठ से 90° पर। फिर उसी अभिलंब से i मापिए और दूसरी ओर उतना ही r रख दीजिए।
| स्थिति | आपतन कोण (i) | परावर्तन कोण (r) | परावर्तित किरण का पथ |
|---|---|---|---|
| (i) | 0° | 0° | आपतित किरण के अनुदिश सीधे वापस |
| (ii) | 0° | 0° | आपतित किरण के अनुदिश सीधे वापस |
| (iii) | 20° | 20° | अभिलंब की दूसरी ओर 20° पर (आपतित किरण से 40° दूर) |
प्रत्येक चित्र में दर्पण के प्रतिबिंब की तुलना उसके बगल में रखे वास्तविक ढक्कन से कीजिए।
| प्रतिबिंब | कैसा दिखता है | दर्पण |
|---|---|---|
| (i) | सीधा, किंतु ढक्कन से बहुत छोटा | उत्तल दर्पण |
| (ii) | सीधा, और ढक्कन से बहुत बड़ा | अवतल दर्पण |
| (iii) | सीधा, और ढक्कन के बराबर आमाप का | समतल दर्पण |
तीनों चित्र समान वस्तु-दूरी पर लिए गए हैं, इसलिए आमाप में जो भी अंतर है वह केवल काँच के कारण है।
| प्रतिबिंब | कैसा दिखता है | लेंस/काँच |
|---|---|---|
| (i) | सीधा और बहुत आवर्धित, गोल लेंस के पार | उत्तल लेंस |
| (ii) | सीधा और बहुत छोटा, गोल लेंस के पार | अवतल लेंस |
| (iii) | आमाप में अपरिवर्तित, चौकोर समतल पट्टिका के पार | काँच की समतल पारदर्शी पट्टिका |
(ii) आपतन कोण 0° है।
प्रकाश अपने ही पथ पर सीधा वापस लौट जाता है।
प्रत्येक दर्पण में दिख रहे वर्गों की तुलना पीछे खड़े वास्तविक ग्राफ पत्रक के वर्गों से कीजिए।
| चित्र 10.25 का दर्पण | ग्राफ पत्रक का प्रतिबिंब कैसा दिखता है | दर्पण |
|---|---|---|
| बायाँ | वर्ग वास्तविक पत्रक से बड़े, इसलिए दर्पण में कम वर्ग समाते हैं | अवतल दर्पण |
| बीच वाला | वर्ग वास्तविक पत्रक के बराबर और रेखाएँ सीधी बनी रहती हैं | समतल दर्पण |
| दायाँ | वर्ग छोटे, कहीं अधिक वर्ग समा जाते हैं और रेखाएँ स्पष्ट रूप से मुड़ी दिखती हैं | उत्तल दर्पण |
(iii) उसके उल्टे प्रतिबिंब का आमाप बढ़ता जाता है और अंततः यह सीधा तथा आवर्धित हो जाता है।
दूर से चलना आरंभ कीजिए —
आवर्धक लेंस एक उत्तल लेंस होता है — वह लेंस जो किनारों की अपेक्षा बीच में अधिक मोटा होता है।
क्रमशः क्या दिखाई देता है:
| स्तंभ I | स्तंभ II | क्यों |
|---|---|---|
| (i) अवतल दर्पण | (क) | परिभाषा से — इसका परावर्तक पृष्ठ भीतर की ओर वक्रित होता है |
| (ii) उत्तल दर्पण | (ख) | इसकी परावर्तित किरणें सदैव अपसरित होती हैं, इसलिए प्रतिबिंब सीधा और लघुकृत ही बन सकता है |
| (iii) उत्तल लेंस | (ग) | यह प्रकाश को अभिसरित करता है, इसलिए एक निश्चित दूरी के बाद किरणें कट जाती हैं और वस्तु उल्टी प्रतीत होती है |
| (iv) अवतल लेंस | (घ) | यह प्रकाश को अपसरित करता है, इसलिए इसके पार दिखने वाली वस्तु सदैव सीधी और लघुकृत होती है |
(i) अभिकथन और कारण दोनों सही हैं और कारण अभिकथन की सही व्याख्या है।
अभिकथन — सही। वाहनों में लगे पार्श्व-दृश्य दर्पण उत्तल दर्पण ही होते हैं।
कारण — सही। बाहर की ओर वक्रित होने के कारण उत्तल दर्पण पीछे की सड़क की कहीं अधिक चौड़ी पट्टी का प्रकाश समेटकर उसी छोटे दर्पण में दिखा देता है।
और कारण वास्तव में व्याख्या भी है। लेन बदलने से पहले चालक को पीछे की सड़क अधिक से अधिक दिखनी चाहिए, और सबसे छोटे दर्पण में सबसे चौड़ा दृश्य ठीक उत्तल दर्पण ही देता है। इसी कारण उतने ही आमाप के समतल दर्पण के स्थान पर इसे चुना जाता है।
(ii) चित्र (क) उत्तल दर्पण और चित्र (ख) अवतल दर्पण निरूपित करता है।
प्रत्येक चित्र में I वाले तीर की तुलना O वाले तीर से कीजिए। दोनों चित्रों में प्रतिबिंब सीधा है और दर्पण M के दूसरी ओर बना है, इसलिए भेद केवल आमाप से हो सकता है।
| चित्र | प्रतिबिंब की वस्तु से तुलना | यह कौन-सा दर्पण कर सकता है |
|---|---|---|
| (क) | सीधा और O से छोटा | उत्तल दर्पण — इसका प्रतिबिंब सदैव सीधा और लघुकृत होता है |
| (ख) | सीधा और O से बड़ा | अवतल दर्पण, वस्तु उसके समीप रखी होने पर |
खाली गिलास के पार पेंसिल सामान्य दिखती है। आधा जल भरते ही जल के पार दिखने वाला भाग जल-तल के ऊपर वाले भाग से स्पष्ट रूप से अधिक चौड़ा दिखता है और एक ओर थोड़ा खिसका हुआ भी — इसलिए पेंसिल जल के तल पर टूटी हुई प्रतीत होती है।