कुतूहल अध्याय 10 जिज्ञासा बनाए रखें

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
किसी दर्पण पर आपतित प्रकाश की एक किरण एवं उसके संगत परिवर्तित किरण चित्र 10.12 में दर्शाई गई है आपतित किरण दर्पण पर अभिलंब के साथ 40° का कोण बनाती है। परावर्तित किरण और दर्पण के बीच बने कोण का मान कितना है? (i) 40° (ii) 50° (iii) 45° (iv) 60°
उत्तर

(ii) 50°

आपतन कोण, i = 40° (अभिलंब से मापा गया)
परावर्तन के पहले नियम से, r = i = 40°
अभिलंब दर्पण से 90° पर होता है, अतः
दर्पण से बना कोण = 90° − r = 90° − 40° = 50°
i = 40°r = 40°50°आपतित किरणपरावर्तित किरणअभिलंबदर्पणO
i और r दोनों अभिलंब से मापे जाते हैं, दर्पण से नहीं। यदि i = 40° है तो r = 40° होगा, और परावर्तित किरण तथा दर्पण के बीच का कोण 90° − 40° = 50° होगा।
40° क्यों नहीं: प्रश्न में कोण अभिलंब से दिया गया है, किंतु पूछा दर्पण से गया है। नियम i = r केवल अभिलंब के सापेक्ष है। r = 40° निकालने के बाद शेष केवल ज्यामिति है — अभिलंब और दर्पण परस्पर लंबवत हैं, इसलिए आपतन बिंदु पर उस ओर के दोनों कोणों का योग 90° होना ही चाहिए।
संकेत: परावर्तन का कोई भी प्रश्न हल करने से पहले रेखांकित कीजिए कि दिया गया कोण अभिलंब से है या दर्पण से। इस विषय की लगभग हर भूल यहीं से आरंभ होती है।
ध्यान दीजिए: हिंदी संस्करण में मुद्रण की भूल से ‘चित्र 10.12’ छपा है; प्रश्न वस्तुतः चित्र 10.21 से संबंधित है।
प्र2.
चित्र 10.22 में तीन भिन्न स्थितियाँ दर्शाई गई हैं जिनमें प्रकाश किरण एक दर्पण पर आपतित है— (i) प्रकाश किरण अभिलंब के अनुदिश दर्पण पर आपतित है। (ii) दर्पण को किसी कोण पर घुमा दिया गया है किंतु प्रकाश किरण अभी भी इस पर अभिलंब के अनुदिश आपतित है। (iii) दर्पण को किसी कोण पर घुमा दिया गया है और प्रकाश किरण इस पर अभिलंब से 20° का कोण बनाती हुई आपतित होती है। उपर्युक्त तीनों स्थितियों में परावर्तित किरण आरेखित कीजिए [(सही आरेख बनाने के लिए रेखनी (रूलर) एवं कोणमापक (प्रोट्रैक्टर) का उपयोग कीजिए)]। प्रत्येक स्थिति के लिए बताइए कि परावर्तन कोण का मान कितना है?
उत्तर

हर स्थिति में पहले अभिलंब खींचिए — जहाँ किरण दर्पण से मिलती है वहाँ पृष्ठ से 90° पर। फिर उसी अभिलंब से i मापिए और दूसरी ओर उतना ही r रख दीजिए।

आपतितपरावर्तितदर्पण(i) i = 0°, r = 0°आपतितपरावर्तितदर्पण(ii) i = 0°, r = 0°आपतितअभिलंबदर्पण(iii) i = 20°, r = 20°
प्रत्येक स्थिति में परावर्तित किरण। (i) और (ii) में किरण अभिलंब के अनुदिश आपतित होती है, इसलिए i = 0° और किरण अपने ही पथ पर लौट जाती है। (iii) में परावर्तित किरण अभिलंब के दूसरी ओर, 20° पर होती है।
स्थितिआपतन कोण (i)परावर्तन कोण (r)परावर्तित किरण का पथ
(i)आपतित किरण के अनुदिश सीधे वापस
(ii)आपतित किरण के अनुदिश सीधे वापस
(iii)20°20°अभिलंब की दूसरी ओर 20° पर (आपतित किरण से 40° दूर)
दर्पण की स्थिति भिन्न होने पर भी (i) और (ii) का उत्तर एक ही क्यों है: दर्पण घुमाने पर उसका अभिलंब भी उतना ही घूम जाता है। (ii) में किरण दर्पण के साथ ही घुमा दी गई है, इसलिए वह अब भी अभिलंब के अनुदिश है और i अब भी 0° है। उत्तर इस बात से तय नहीं होता कि दर्पण कमरे में कैसे रखा है, बल्कि इससे कि किरण और अभिलंब के बीच कितना कोण है — और वह अपरिवर्तित है।
स्वयं जाँचिए: (iii) में आपतित और परावर्तित किरणों के बीच का कोण 40° अर्थात 2 × 20° है। यह सदैव सत्य है — आपतित और परावर्तित किरण के बीच का कोण आपतन कोण का दुगुना होता है।
प्र3.
चित्र 10.23 में तीन प्रकार के दर्पणों के सामने स्केच पेन का ढक्कन रखा गया है। प्रतिबिंब का मिलान सही दर्पण से कीजिए। (i) समतल दर्पण (ii) उत्तल दर्पण (iii) अवतल दर्पण
उत्तर

प्रत्येक चित्र में दर्पण के प्रतिबिंब की तुलना उसके बगल में रखे वास्तविक ढक्कन से कीजिए।

प्रतिबिंबकैसा दिखता हैदर्पण
(i)सीधा, किंतु ढक्कन से बहुत छोटाउत्तल दर्पण
(ii)सीधा, और ढक्कन से बहुत बड़ाअवतल दर्पण
(iii)सीधा, और ढक्कन के बराबर आमाप कासमतल दर्पण
यहाँ केवल आमाप से ही निर्णय क्यों हो जाता है: ढक्कन तीनों दर्पणों के समीप रखा है, और इतनी कम दूरी पर तीनों को अलग पहचानना सरल है। समतल दर्पण बराबर आमाप के अतिरिक्त कुछ बना ही नहीं सकता। उत्तल दर्पण लघुकृत के अतिरिक्त कुछ नहीं बना सकता। अवतल दर्पण, वस्तु इतनी पास होने पर, आवर्धित प्रतिबिंब बनाता है। तीनों प्रतिबिंब सीधे हैं, इसलिए दिशा से कोई संकेत नहीं मिलता — आमाप ही निर्णायक है।
संकेत: यदि (ii) में ढक्कन को कहीं अधिक दूर रख दिया जाता तो अवतल दर्पण उसे उल्टा दिखाता। तीनों में से केवल अवतल दर्पण ही ऐसा कर सकता है।
प्र4.
चित्र 10.24 में एक स्केच पेन के ढक्कन को एक उत्तल लेंस, एक अवतल लेंस और एक समतल काँच पट्टिका के पीछे समान दूरी पर रखिए और प्रतिबिंबों का अवलोकन कीजिए। ये चित्र 10.24 में दर्शाए अनुसार हो सकते हैं। प्रत्येक प्रतिबिंब का मिलान सही प्रकाशिक युक्ति के साथ कीजिए। (i) काँच की समतल पारदर्शी पट्टिका (ii) उत्तल लेंस (iii) अवतल लेंस
उत्तर

तीनों चित्र समान वस्तु-दूरी पर लिए गए हैं, इसलिए आमाप में जो भी अंतर है वह केवल काँच के कारण है।

प्रतिबिंबकैसा दिखता हैलेंस/काँच
(i)सीधा और बहुत आवर्धित, गोल लेंस के पारउत्तल लेंस
(ii)सीधा और बहुत छोटा, गोल लेंस के पारअवतल लेंस
(iii)आमाप में अपरिवर्तित, चौकोर समतल पट्टिका के पारकाँच की समतल पारदर्शी पट्टिका
समतल पट्टिका ढक्कन को क्यों नहीं बदलती: उसके दोनों फलक समांतर हैं, इसलिए हर किरण काँच में घुसते समय जितनी मुड़ती है, निकलते समय ठीक उतनी ही वापस मुड़ जाती है। किरण अपनी मूल दिशा में ही आगे बढ़ती है, केवल थोड़ी बगल में खिसकी हुई — इसलिए ढक्कन अपने वास्तविक आमाप में दिखता है। दोनों लेंसों के फलक वक्रित और असमांतर हैं, इसलिए दोनों मोड़ नहीं कटते — उत्तल लेंस इस दूरी पर प्रकाश को अभिसरित कर ढक्कन को बड़ा दिखाता है और अवतल लेंस उसे अपसरित कर छोटा।
प्र5.
किसी समतल दर्पण पर प्रकाश अभिलंब के अनुदिश आपतित है। बताइए कि निम्नलिखित में से कौन सा कथन सत्य है— (i) आपतन कोण 90° है। (ii) आपतन कोण 0° है। (iii) परावर्तन कोण 90° है। (iv) इस स्थिति में प्रकाश परावर्तित नहीं होता है।
उत्तर

(ii) आपतन कोण 0° है।

आपतन कोण, आपतित किरण और अभिलंब के बीच का कोण होता है।
यहाँ आपतित किरण अभिलंब के अनुदिश ही है, अतः दोनों के बीच का कोण i = 0°
और इसलिए r = i =

प्रकाश अपने ही पथ पर सीधा वापस लौट जाता है।

शेष विकल्प क्यों गलत हैं: 90° वह कोण है जो किरण दर्पण के पृष्ठ से बनाती है, अभिलंब से नहीं — विकल्प (i) और (iii) गलत रेखा से मापने के कारण बनते हैं। विकल्प (iv) सर्वथा असत्य है: दर्पण प्रकाश को भली-भाँति परावर्तित करता है, बस उसे उसी दिशा में लौटा देता है जिससे वह आया था, इसलिए अलग से कोई परावर्तित पुंज दिखाई नहीं देता।
प्र6.
चित्र 10.25 में तीन दर्पण— समतल, अवतल एवं उत्तल रखे गए हैं। किसी ग्राफ पत्रक के दर्पण में बने प्रतिबिंब के आधार पर इन दर्पणों की पहचान कीजिए और चित्र में दर्पणों के ऊपर उनके नाम लिखिए।
उत्तर

प्रत्येक दर्पण में दिख रहे वर्गों की तुलना पीछे खड़े वास्तविक ग्राफ पत्रक के वर्गों से कीजिए।

चित्र 10.25 का दर्पणग्राफ पत्रक का प्रतिबिंब कैसा दिखता हैदर्पण
बायाँवर्ग वास्तविक पत्रक से बड़े, इसलिए दर्पण में कम वर्ग समाते हैंअवतल दर्पण
बीच वालावर्ग वास्तविक पत्रक के बराबर और रेखाएँ सीधी बनी रहती हैंसमतल दर्पण
दायाँवर्ग छोटे, कहीं अधिक वर्ग समा जाते हैं और रेखाएँ स्पष्ट रूप से मुड़ी दिखती हैंउत्तल दर्पण
ग्राफ पत्रक इतनी अच्छी परीक्षण-वस्तु क्यों है: सादी वस्तु केवल अपना कुल आमाप बताती है। जालीदार पत्रक एक साथ यह बता देता है कि दर्पण हर बिंदु पर क्या कर रहा है — यदि किनारे के वर्ग बीच के वर्गों से भिन्न आमाप के हैं तो दर्पण वक्रित है, और सीधी जाल-रेखाओं का मुड़ना बता देता है कि किस ओर वक्रित है। बीच वाले दर्पण में जाल हूबहू बनता है, जो कोई वक्रित दर्पण कर ही नहीं सकता; दाएँ में जाल छोटा भी है और मुड़ा भी — यह बाहर की ओर वक्रित पृष्ठ का लक्षण है।
स्वयं जाँचिए: उत्तल दर्पण में ग्राफ पत्रक की पट्टी शेष दोनों से चौड़ी दिखती है। उतनी ही चकती में अधिक चौड़ा दृश्य समाना ही उसमें वर्गों के छोटे दिखने का कारण है।
प्र7.
किसी संग्रहालय में कोई महिला एक विशाल अवतल दर्पण में अपना प्रतिबिंब देखती हुई चल कर उसकी ओर जाती है (चित्र 10.26)। वह देखेगी कि— (i) उसके सीधे प्रतिबिंब का आमाप घटता जाता है। (ii) उसके उल्टे प्रतिबिंब का आमाप घटता जाता है। (iii) उसके उल्टे प्रतिबिंब का आमाप बढ़ता जाता है और अंततः यह सीधा तथा आवर्धित हो जाता है। (iv) उसके सीधे प्रतिबिंब का आमाप बढ़ता जाता है।
उत्तर

(iii) उसके उल्टे प्रतिबिंब का आमाप बढ़ता जाता है और अंततः यह सीधा तथा आवर्धित हो जाता है।

दूर से चलना आरंभ कीजिए —

  1. दर्पण से दूर — प्रतिबिंब उल्टा और छोटा होता है, ठीक वैसा ही जैसा चित्र 10.26 में दर्पण के भीतर उसे उल्टा दिखाया गया है।
  2. पास आते हुए — प्रतिबिंब उल्टा ही रहता है पर बड़ा होता जाता है
  3. दर्पण के बहुत पास — प्रतिबिंब पलटकर सीधा और आवर्धित हो जाता है।
CFOIदर्पण
अवतल दर्पण, जिसमें वस्तु F और दर्पण के बीच रखी है। दोनों परावर्तित किरणें फैल जाती हैं, इसलिए वे दर्पण के सामने कहीं नहीं मिलतीं; पीछे की ओर बढ़ाने पर (बिंदुदार रेखाएँ) वे दर्पण के पीछे मिलती हैं। अतः प्रतिबिंब आभासी होता है — जिसे पर्दे पर नहीं लिया जा सकता — तथा सीधा और आवर्धित होता है।
पास आते-आते पलटाव क्यों होता है: अवतल दर्पण परावर्तित किरणों को अभिसरित करता है। जब तक वह दूर है, ये किरणें उसकी आँख तक पहुँचने से पहले दर्पण के सामने कट जाती हैं, और कटी हुई किरणें उसे उल्टा दिखाती हैं। पास आने पर उससे निकलती किरणें अधिक तेज़ी से फैल रही होती हैं, और एक निश्चित दूरी के बाद दर्पण उन्हें कटने योग्य अभिसरित कर ही नहीं पाता — वे आँख तक फैलती हुई ही पहुँचती हैं, और आँख उन्हें पीछे बढ़ाकर दर्पण के पीछे एक बिंदु पर ले जाती है। पीछे बना यह प्रतिबिंब सीधा और उससे बड़ा होता है; और चूँकि दर्पण के पीछे से वास्तव में कोई प्रकाश नहीं आता, इसे पर्दे पर नहीं लिया जा सकता — ऐसे प्रतिबिंब को आभासी प्रतिबिंब कहते हैं।
संकेत: विकल्प (i) और (iv) तुरंत हटाए जा सकते हैं — पूरे समय सीधा रहने वाला प्रतिबिंब समतल या उत्तल दर्पण देता है, अवतल नहीं।
प्र8.
एक आवर्धक लेंस को किसी मुद्रित पाठ्यसामग्री के ऊपर लाइए और उस दूरी को पहचानिए जिस पर पाठ्यसामग्री का आमाप बड़ा दिखाई देने लगता है। अब इसे पाठ्यसामग्री से दूर ले जाइए। आप क्या अवलोकन करते हैं? बताइए आवर्धक लेंस किस प्रकार का लेंस होता है?
उत्तर

आवर्धक लेंस एक उत्तल लेंस होता है — वह लेंस जो किनारों की अपेक्षा बीच में अधिक मोटा होता है।

क्रमशः क्या दिखाई देता है:

  1. पृष्ठ के समीप रखने पर अक्षर सीधे और आवर्धित दिखते हैं; कुछ सेंटीमीटर की एक पूरी परास ऐसी मिलती है जिसमें मुद्रण बड़ा भी है और स्पष्ट भी।
  2. लेंस को ऊपर उठाते जाने पर अक्षर एक सीमा तक और बड़े होते जाते हैं।
  3. एक विशेष ऊँचाई पर मुद्रण पूरी तरह धुँधला पड़ जाता है और पढ़ा नहीं जाता।
  4. और ऊपर उठाने पर मुद्रण उल्टा होकर लौटता है और अब ऊँचाई बढ़ाने के साथ छोटा होता जाता है।
अक्षर पलटते क्यों हैं: उत्तल लेंस पृष्ठ से आते प्रकाश को अभिसरित करता है। जब तक पृष्ठ एक निश्चित दूरी से पास है, किरणें आँख तक पहुँचते समय भी फैली हुई रहती हैं, इसलिए आँख उन्हें पीछे बढ़ाकर एक आवर्धित, सीधा प्रतिबिंब बनाती है। उस दूरी के बाद किरणें आँख तक पहुँचने से पहले ही मिलकर कट जाती हैं, और कटी हुई किरणें उल्टा दृश्य देती हैं। बीच की धुँधली स्थिति वही है जहाँ किरणें न ठीक से फैल रही हैं और न ठीक से कट रही हैं।
स्वयं जाँचिए: आवर्धक लेंस को हाथ भर दूर पकड़कर उसके पार दूर की खिड़की देखिए। खिड़की उल्टी और बहुत छोटी दिखेगी — यही ऊपर की सूची का अंतिम चरण है।
प्र9.
स्तंभ I की प्रविष्टियों का मिलान स्तंभ II में की गई प्रविष्टियों से कीजिए। स्तंभ I — (i) अवतल दर्पण (ii) उत्तल दर्पण (iii) उत्तल लेंस (iv) अवतल लेंस। स्तंभ II — (क) एक ऐसा गोलीय दर्पण जिसका परावर्तक पृष्ठ भीतर की ओर वक्रित होता है। (ख) यह सदैव सीधा और आमाप में वस्तु से छोटा प्रतिबिंब बनता है। (ग) इसके पीछे रखी वस्तु कुछ अधिक दूरी पर उल्टी रखी हुई प्रतीत होती है। (घ) इसके पीछे रखी वस्तु आमाप में सदैव अपने वास्तविक आमाप से छोटी दिखाई देती है।
उत्तर
स्तंभ Iस्तंभ IIक्यों
(i) अवतल दर्पण(क)परिभाषा से — इसका परावर्तक पृष्ठ भीतर की ओर वक्रित होता है
(ii) उत्तल दर्पण(ख)इसकी परावर्तित किरणें सदैव अपसरित होती हैं, इसलिए प्रतिबिंब सीधा और लघुकृत ही बन सकता है
(iii) उत्तल लेंस(ग)यह प्रकाश को अभिसरित करता है, इसलिए एक निश्चित दूरी के बाद किरणें कट जाती हैं और वस्तु उल्टी प्रतीत होती है
(iv) अवतल लेंस(घ)यह प्रकाश को अपसरित करता है, इसलिए इसके पार दिखने वाली वस्तु सदैव सीधी और लघुकृत होती है
(ख) और (घ) में भ्रम कैसे दूर करें: दोनों में ‘सदैव’ शब्द है, और ‘सदैव’ का वचन केवल अपसारी युक्तियाँ ही दे सकती हैं। (ख) कहता है प्रतिबिंब बनाता है — यह दर्पण की भाषा है, इसलिए वह उत्तल दर्पण है। (घ) कहता है इसके पीछे रखी वस्तु — इस अध्याय में यही भाषा लेंसों के लिए प्रयुक्त हुई है, क्योंकि लेंस के माध्यम से देखा जाता है, इसलिए वह अवतल लेंस है।
प्र10.
निम्नलिखित प्रश्न अभिकथन या कारण पर आधारित है। अभिकथन— पीछे के यातायात के अवलोकन के लिए उत्तल दर्पणों को वरीयता दी जाती है। कारण— उत्तल दर्पण समतल दर्पणों की तुलना में सार्थक रूप से व्यापक दृष्टि क्षेत्र प्रदान करता है। सही विकल्प का चयन कीजिए— (i) अभिकथन और कारण दोनों सही हैं और कारण अभिकथन की सही व्याख्या है। (ii) अभिकथन और कारण दोनों सही हैं परंतु कारण अभिकथन की सही व्याख्या नहीं है। (iii) अभिकथन सही है किंतु कारण असत्य है। (iv) अभिकथन और कारण दोनों असत्य हैं।
उत्तर

(i) अभिकथन और कारण दोनों सही हैं और कारण अभिकथन की सही व्याख्या है।

अभिकथन — सही। वाहनों में लगे पार्श्व-दृश्य दर्पण उत्तल दर्पण ही होते हैं।

कारण — सही। बाहर की ओर वक्रित होने के कारण उत्तल दर्पण पीछे की सड़क की कहीं अधिक चौड़ी पट्टी का प्रकाश समेटकर उसी छोटे दर्पण में दिखा देता है।

और कारण वास्तव में व्याख्या भी है। लेन बदलने से पहले चालक को पीछे की सड़क अधिक से अधिक दिखनी चाहिए, और सबसे छोटे दर्पण में सबसे चौड़ा दृश्य ठीक उत्तल दर्पण ही देता है। इसी कारण उतने ही आमाप के समतल दर्पण के स्थान पर इसे चुना जाता है।

इस गुण की कीमत भी है: उतनी ही चकती में चौड़ा दृश्य ठूँसने से हर वाहन छोटा दिखता है, और छोटा प्रतिबिंब अधिक दूर का प्रतीत होता है। इसी कारण दर्पण पर ‘वस्तुओं के बीच वास्तविक दूरी दर्पण में दिखाई देने वाली दूरी से कम होती है’ जैसी चेतावनी लिखी जाती है। यह उसी गुण की हानि है, कोई अलग गुण नहीं — इसलिए इससे कारण कमज़ोर नहीं पड़ता।
प्र11.
चित्र 10.27 में O वस्तु, M दर्पण तथा I प्रतिबिंब को निरूपित करता है। निम्नलिखित में से कौन सा कथन सत्य है? (i) चित्र (क) समतल दर्पण और चित्र (ख) अवतल दर्पण निरूपित करता है। (ii) चित्र (क) उत्तल दर्पण और चित्र (ख) अवतल दर्पण निरूपित करता है। (iii) चित्र (क) अवतल दर्पण तथा चित्र (ख) उत्तल दर्पण निरूपित करता है। (iv) चित्र (क) समतल दर्पण तथा चित्र (ख) उत्तल दर्पण निरूपित करता है।
उत्तर

(ii) चित्र (क) उत्तल दर्पण और चित्र (ख) अवतल दर्पण निरूपित करता है।

प्रत्येक चित्र में I वाले तीर की तुलना O वाले तीर से कीजिए। दोनों चित्रों में प्रतिबिंब सीधा है और दर्पण M के दूसरी ओर बना है, इसलिए भेद केवल आमाप से हो सकता है।

चित्रप्रतिबिंब की वस्तु से तुलनायह कौन-सा दर्पण कर सकता है
(क)सीधा और O से छोटाउत्तल दर्पण — इसका प्रतिबिंब सदैव सीधा और लघुकृत होता है
(ख)सीधा और O से बड़ाअवतल दर्पण, वस्तु उसके समीप रखी होने पर
FOIदर्पण
उत्तल दर्पण। परावर्तित किरणें सदैव अपसरित होती हैं, इसलिए प्रतिबिंब उन्हें पीछे की ओर बढ़ाकर प्राप्त होता है। यह आभासी होता है — जिसे पर्दे पर नहीं लिया जा सकता — तथा सीधा और लघुकृत होता है और सदैव दर्पण और F के बीच बनता है — वस्तु कितनी भी दूर ले जाई जाए, प्रतिबिंब दर्पण के निकट ही रहता है।
दोनों में समतल दर्पण क्यों नहीं हो सकता: समतल दर्पण वस्तु के ठीक बराबर आमाप का प्रतिबिंब बनाता है, और किसी भी चित्र में I की ऊँचाई O के बराबर नहीं है। इसलिए विकल्प (i) और (iv), जो किसी एक चित्र को समतल दर्पण बताते हैं, गलत हैं। विकल्प (iii) में दोनों उलटे हैं — आवर्धन अवतल दर्पण का काम है, उत्तल दर्पण का नहीं।
संकेत: दोनों चित्रों में I को M के उस ओर दिखाया गया है जिस ओर O नहीं है, अर्थात दर्पण के पीछे। अतः दोनों वे ही सीधे प्रतिबिंब हैं जो किरणों को पीछे बढ़ाकर मिलते हैं — उत्तल दर्पण केवल यही बनाता है, और अवतल दर्पण तब बनाता है जब वस्तु उसके समीप हो।
प्र12.
किसी पारदर्शी काँच के गिलास के पीछे एक पेंसिल रखिए (चित्र 10.28)। अब गिलास को आधा जल से भरिए (चित्र 10.28)। जल भरे भाग से गिलास के पार देखने पर पेंसिल कैसी दिखती है? व्याख्या कीजिए कि इसकी आकृति में परिवर्तन क्यों प्रतीत होता है?
उत्तर

खाली गिलास के पार पेंसिल सामान्य दिखती है। आधा जल भरते ही जल के पार दिखने वाला भाग जल-तल के ऊपर वाले भाग से स्पष्ट रूप से अधिक चौड़ा दिखता है और एक ओर थोड़ा खिसका हुआ भी — इसलिए पेंसिल जल के तल पर टूटी हुई प्रतीत होती है।

चौड़ा(क) खाली(ख) आधा जल भरा
खाली गिलास के पार पेंसिल सामान्य दिखती है। जल के पार इसका निचला भाग अधिक चौड़ा और एक ओर खिसका हुआ दिखता है, जिससे पेंसिल जल के तल पर टूटी हुई प्रतीत होती है।
आकृति बदली हुई क्यों प्रतीत होती है: जल से भरा गिलास एक ऐसा पारदर्शी पिंड है जिसका बाहरी पृष्ठ वक्रित है — अर्थात लिटाया हुआ बेलनाकार उत्तल लेंस। पेंसिल से आता प्रकाश जल और काँच से वायु में आते समय मुड़ता है। पृष्ठ वक्रित होने के कारण पेंसिल के बाएँ और दाएँ किनारों से चलने वाली किरणें भिन्न-भिन्न मात्रा में भीतर की ओर मुड़ती हैं, इसलिए वे आपकी आँख तक आरंभ की तुलना में अधिक दूर-दूर पहुँचती हैं। आँख उन्हें सीधी रेखाओं में पीछे बढ़ाकर पेंसिल को उसकी वास्तविक चौड़ाई से अधिक चौड़ा मान लेती है। जल-तल के ऊपर केवल वायु और काँच की पतली वक्रित परत है, जो प्रकाश को नाममात्र ही मोड़ती है — इसलिए वह भाग अपनी सही चौड़ाई में दिखता है और दोनों भाग आपस में मिलते नहीं।
यह भी कीजिए: वक्रित पृष्ठ केवल वक्रता की दिशा में ही आवर्धन करता है। गिलास को हाथ में घुमाइए — पेंसिल चौड़ी तो होती है पर लंबी कभी नहीं, क्योंकि गिलास केवल अपनी परिधि के अनुदिश वक्रित है, ऊपर-नीचे नहीं।
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