कुतूहल अध्याय 10 खोजें, अभिकल्पित करें और चर्चा करें

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
अपने शिक्षक अथवा अभिभावक के साथ किसी निकटवर्ती चिकित्सालय अथवा किसी कान, नाक, गला (ई.एन.टी) विशेषज्ञ अथवा दंत चिकित्सक के चिकित्सालय में जाइए। चिकित्सक से अनुरोध कीजिए कि वे आपको वह दर्पण दिखाएँ जो वे कान, नाक, गले अथवा दाँतों के परीक्षण के लिए उपयोग में लाते हैं। पहचानिए कि इन यंत्रों में किस प्रकार का दर्पण लगा होता है।
उत्तर

कैसे कीजिए। भ्रमण शिक्षक के माध्यम से तय कीजिए। अभ्यास पुस्तिका साथ ले जाइए और हर दिखाए गए यंत्र के लिए तीन बातें लिखिए — पार्श्व से देखने पर परावर्तक पृष्ठ की आकृति, उसके पास कोई छोटी वस्तु रखने पर प्रतिबिंब बड़ा दिखता है या छोटा, और चिकित्सक उस यंत्र का उपयोग किसलिए करते हैं।

आपको क्या मिलेगा।

यंत्रदर्पण का प्रकारवही क्यों
दंत दर्पण (मुख दर्पण)अवतलदाँत के पास रखने पर सीधा और आवर्धित प्रतिबिंब बनता है, जिससे छोटी गुहिका भी स्पष्ट दिखती है। लंबी डंडी के कारण दाँत का पिछला भाग भी देखा जा सकता है।
ई.एन.टी. चिकित्सक का माथे पर बाँधा जाने वाला दर्पणअवतल, बीच में एक छोटा छिद्ररोगी के पीछे रखे लैंप का प्रकाश समेटकर कान, नाक या गले की गहरी और सँकरी जगह पर संकेंद्रित करता है। चिकित्सक बीच के छिद्र से उसी दिशा में देखते हैं।
डंडी पर लगा छोटा परीक्षण दर्पण (गले का दर्पण)समतल अथवा हल्का अवतलयह मुख्यतः दृष्टि को मोड़कर गले के भीतर पहुँचाने के लिए है; समतल पृष्ठ दृश्य को बिना विकृत किए दिखाता है।
साझा विचार: चिकित्सा के यंत्रों में अवतल दर्पण तब चुना जाता है जब प्रकाश को किसी अँधेरी गुहा में समेटना हो या किसी छोटी रचना को आवर्धित करना हो। जहाँ दर्पण से केवल मोड़ पर से देखना है, वहाँ समतल पृष्ठ बेहतर है, क्योंकि वह चिकित्सक को दिखने वाली वस्तु का आमाप नहीं बदलता।
संकेत: चिकित्सक से पूछिए कि माथे वाले दर्पण के बीच छिद्र क्यों होता है। पूरे अध्याय में यह सबसे सुंदर उदाहरण है जहाँ प्रकाश एक ओर भेजा जाता है और उसी रेखा के अनुदिश देखा भी जाता है।
प्र2.
सूर्य के प्रकाश का उपयोग करना भावी ऊर्जा चुनौतियों के समाधान की कुंजी है। सौर-कुकर (चित्र 10.29) जैसी युक्तियों में सूर्य के विकिरणों को अभिसरित करने और ऊष्मा उत्पन्न करने के लिए दर्पणों का उपयोग किया जाता है। भारत के गाँवों में इस प्रकार की रचनाओं का उपयोग विद्युत की बचत करने और जीवाश्म ईंधनों के उपयोग में कमी लाने के लिए किया जाता है। अपने विद्यालय अथवा घर के लिए सौर-कुकर की अभिकल्पना पर विचार कीजिए और इसके लिए एक विस्तृत प्रस्ताव तैयार कीजिए जिसमें आवश्यक आय-व्यय पत्र भी सम्मिलित हों।
उत्तर

अच्छे प्रस्ताव में ये छह बातें होनी चाहिए: (1) आवश्यकता, (2) प्रयुक्त भौतिकी, (3) माप सहित नामांकित अभिकल्पना, (4) सामग्री और व्यय की तालिका, (5) परीक्षण की विधि, और (6) सीमाएँ।

नमूना प्रस्ताव — विद्यालय की रसोई के लिए समतल परावर्तक वाला बक्सा-प्रकार का सौर-कुकर

1. आवश्यकता. विद्यालय में मध्याह्न भोजन के लिए जल गर्म करने और दाल पकाने में एल.पी.जी. का उपयोग होता है। वर्ष में लगभग 250 स्वच्छ धूप वाले दिनों में सौर-कुकर उस काम का एक भाग सँभालकर गैस का खर्च और ईंधन दोनों घटा सकता है।

2. प्रयुक्त भौतिकी. ढक्कन पर कब्ज़े से लगा समतल दर्पण सूर्य का एक अतिरिक्त किरणपुंज बक्से के भीतर परावर्तित करता है, जिससे भोजन को दो दिशाओं से धूप मिलती है। भीतर का काला पृष्ठ उस प्रकाश को अवशोषित कर ऊष्मा में बदल देता है, और दोहरा काँच का ढक्कन धूप भीतर आने देता है पर गर्म वायु को बाहर नहीं जाने देता — इससे भीतर का ताप लगभग 100–120 °C तक पहुँच जाता है।

3. अभिकल्पना. बाहरी लकड़ी का बक्सा 60 सेमी × 60 सेमी × 20 सेमी; भीतरी एलुमिनियम ट्रे 50 सेमी × 50 सेमी, मैट काले रंग से रँगी हुई; दोनों के बीच 5 सेमी थर्मोकोल अथवा काँच-ऊन का ऊष्मारोधन; ढक्कन के लिए 4 मिमी मोटी दो काँच की चादरें, 2 सेमी की दूरी पर; ढक्कन से कब्ज़े द्वारा जुड़ा 60 सेमी × 60 सेमी का समतल दर्पण; ढक्कनदार चार काले रँगे एलुमिनियम बर्तन।

सामग्रीविशिष्टिअनुमानित व्यय (₹)
लकड़ी का बाहरी बक्सा60 × 60 × 20 सेमी, प्लाईवुड1200
एलुमिनियम भीतरी ट्रे50 × 50 सेमी700
ऊष्मारोधनथर्मोकोल / काँच-ऊन, 5 सेमी300
दोहरा काँच ढक्कन2 चादरें, 4 मिमी600
समतल दर्पण एवं कब्ज़े60 × 60 सेमी800
काला रंग, सीलेंट, पेंच400
चार बर्तनएलुमिनियम, काले रँगे, ढक्कन सहित600
तापमापी (0–150 °C)परीक्षण हेतु200
कुल4800

4. परीक्षण. किसी स्वच्छ धूप वाले दिन प्रातः 10 बजे से अपराह्न 3 बजे तक हर 15 मिनट पर भीतर का ताप लिखिए — एक बार दर्पण-ढक्कन खोलकर और एक बार बंद रखकर — और दोनों वक्र आलेखित कीजिए। फिर 500 ग्राम चावल पकने में लगा समय नापिए और बची हुई एल.पी.जी. की कीमत से तुलना करके निकालिए कि कुकर कितने महीनों में अपनी लागत लौटा देगा।

5. सीमाएँ, ईमानदारी से. यह बादल वाले दिन या लगभग 3 बजे के बाद काम नहीं करता; इसमें तलना संभव नहीं; और कुकर को सूर्य की ओर बनाए रखने के लिए लगभग हर घंटे घुमाना पड़ता है।

यहाँ समतल दर्पण पर्याप्त क्यों है और बड़े संयंत्र में अवतल क्यों चाहिए: बक्सा-कुकर को केवल एक और किरणपुंज चौड़े बक्से में जोड़ना है, और समतल दर्पण यह बिना सटीक लक्ष्य-साधन के कर देता है। तलने योग्य — या बड़े पैमाने पर सौर भट्टी योग्य — कहीं ऊँचा ताप पाने के लिए धूप को एक बिंदु पर लाना पड़ता है, और यह केवल अवतल (अभिसारी) परावर्तक ही कर सकता है।
प्र3.
गोलीय दर्पणों और लेंसों के साथ आभासी (वर्चुअल) प्रयोग करने के लिए ऑनलाइन साधनों (टूल्स) अथवा एनिमेशन का उपयोग कीजिए। अनुरूपण में (सिमुलेशन) वस्तु की स्थिति परिवर्तित कीजिए और प्रतिबिंब में होने वाले परिवर्तनों का अवलोकन कीजिए।
उत्तर

अनुरूपण का सही उपयोग। अनुरूपण तभी उपयोगी है जब आप कोई प्रश्न लेकर उसमें जाएँ। पहले प्रश्न तय कीजिए, एक बार में केवल एक ही बात बदलिए, और केवल चित्र नहीं — मान भी लिखिए।

करने योग्य प्रयोग

क्रमक्या बदलिएक्या अभिलेखित कीजिए
1अवतल दर्पण; वस्तु को बहुत दूर से धीरे-धीरे पास लाइएवह वस्तु-दूरी जिस पर प्रतिबिंब उल्टे से सीधा हो जाता है
2अवतल दर्पण; वस्तु बहुत दूरप्रतिबिंब कहाँ बनता है — यह फोकस पर होना चाहिए
3उत्तल दर्पण; वस्तु को पास से बहुत दूर तक ले जाइएक्या प्रतिबिंब कभी उल्टा या बड़ा होता है (नहीं होना चाहिए)
4उत्तल लेंस; क्रम 1 दोहराइएपलटाव की दूरी की तुलना अवतल दर्पण से कीजिए
5अवतल लेंस; क्रम 3 दोहराइएक्या प्रतिबिंब पूरे समय सीधा और लघुकृत रहता है
6कोई भी दर्पण; वस्तु स्थिर रखकर वक्रता बदलिएदर्पण अधिक गहरा करने पर प्रतिबिंब का आमाप कैसे बदलता है

आप क्या निष्कर्ष निकाल सकेंगे। अवतल दर्पण और उत्तल लेंस एक जैसा व्यवहार करते हैं, तथा उत्तल दर्पण और अवतल लेंस एक जैसा। प्रत्येक जोड़ी में अंतर केवल इतना है कि प्रकाश परावर्तित होता है या पारगत; प्रतिबिंब तो इससे तय होता है कि किरणें अभिसरित कराई गईं या अपसरित

संकेत: अनुरूपण में किरण-प्रदर्शन (ray display) चालू रखिए। किरणें कहाँ कटती हैं — या कहाँ नहीं कटतीं — यह देखना अकेले प्रतिबिंब देखने से कहीं अधिक समझाता है।
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