कुतूहल अध्याय 11 क्रियाकलाप 11.1

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
तालिका 11.1 में आपने जो आँकड़े अभिलेखित किए हैं उनका विश्लेषण कीजिए। क्या चंद्रमा की आकृति प्रत्येक दिन भिन्न-भिन्न दिखाई देती है?
उत्तर

हाँ। चमकीले भाग की आकृति प्रत्येक दिन थोड़ी भिन्न होती है, और यह परिवर्तन पूरे पखवाड़े एक ही दिशा में चलता है, तत्पश्चात उलट जाता है।

पूर्णिमा के अगले दिन सूर्योदय से आरंभ करने पर आपकी तालिका 11.1 कुछ इस प्रकार बनेगी —

लगभग कौन-सा दिनचंद्रमा की आकृतिचमकीला भाग (पिछले दिन की अपेक्षा)चंद्रमा-सूर्य दूरी (पिछले दिन की अपेक्षा)
दिन 1पूर्ण चमकीला वृत्त
दिन 2–7अर्धाधिक (गिब्बस), घटता हुआघटाकम हुई
लगभग दिन 8अर्धवृत्तघटाकम हुई
दिन 9–14बालचंद्र, पतला होता हुआघटाकम हुई
लगभग दिन 15दिखाई नहीं देता (नवचंद्र)घटकर शून्यसूर्य के निकटतम
दिन 16–29बालचंद्र → अर्धवृत्त → अर्धाधिक → पुनः पूर्णचंद्रबढ़ाअधिक हुई
ऐसा क्यों होता है: पहला पखवाड़ा क्षीयमाण काल (कृष्ण पक्ष) है और दूसरा वर्धमान काल (शुक्ल पक्ष)। पूरा चक्र लगभग 29.5 दिन का होने के कारण एक दिन से दूसरे दिन में दिखाई देने वाली आकृति लगभग एक-पंद्रहवाँ भाग ही बदलती है — कम, परंतु रेखाचित्र बनाने पर सरलता से दिख जाती है।
प्र2.
क्या चंद्रमा सभी दिन दिखाई दिया था?
उत्तर

नहीं। नवचंद्र (अमावस्या) के आस-पास एक-दो दिन चंद्रमा बिल्कुल नहीं मिलेगा।

ऐसा क्यों होता है: उस दिन प्रेक्षक के विरुद्ध दो बातें एक साथ होती हैं। पहली — चंद्रमा का केवल अदीप्त भाग पृथ्वी की ओर होता है, अतः देखने योग्य कुछ चमकीला बचता ही नहीं। दूसरी — चंद्रमा तब सूर्य की लगभग उसी दिशा में होता है, अतः सूर्य के साथ ही उदित और अस्त होता है और दिन के उजाले में डूब जाता है।

इसी कारण क्रियाकलाप में बीच में अवलोकन का समय बदलने को कहा गया है। पहले पखवाड़े में चंद्रमा क्षीयमाण है, अतः उसे सूर्योदय के समय देखना सुगम है; दूसरे पखवाड़े में वह वर्धमान है, अतः सूर्यास्त के समय। बीच में, नवचंद्र के निकट, वह किसी भी समय उपलब्ध नहीं रहता।

प्र3.
क्या प्रत्येक दिन चंद्रमा आकाश में उसी स्थान पर दिखाई दिया जहाँ पिछले दिन दिखाई दिया था?
उत्तर

नहीं। प्रत्येक दिन एक ही समय पर देखने पर चंद्रमा स्पष्ट रूप से खिसका हुआ मिलता है — वह पूर्व की ओर आगे होता है और क्षीयमाण पखवाड़े में क्रमशः सूर्य के समीप आता जाता है।

चंद्रमा पृथ्वी के परितः 360° की परिक्रमा लगभग 29.5 दिनों में करता है
प्रतिदिन पूर्व की ओर खिसकाव = 360° ÷ 29.5 ≈ 12.2° प्रतिदिन
पृथ्वी 24 घंटे में 360° घूमती है = 15° प्रति घंटा
अतिरिक्त घूर्णन में लगा समय = 12.2° ÷ 15° प्रति घंटा ≈ 0.81 घंटा = लगभग 49 मिनट
ऐसा क्यों होता है: पृथ्वी जब तक एक घूर्णन पूरा करती है, तब तक चंद्रमा अपनी कक्षा में थोड़ा आगे बढ़ चुका होता है। चंद्रमा को पुनः उसी स्थान पर लाने के लिए पृथ्वी को कुछ और घूमना पड़ता है, और यह ‘कुछ और’ लगभग 50 मिनट बनता है (चित्र 11.6)।

पखवाड़े भर सूर्योदय के समय का प्रतिरूप बहुत नियमित रहता है — पूर्णिमा के दिन चंद्रमा पश्चिम में अस्त हो रहा होता है; लगभग एक सप्ताह बाद अर्धवृत्त होने पर वह ठीक सिर के ऊपर होता है; उसके कुछ दिन बाद पतला बालचंद्र सूर्य के समीप पूर्व में नीचा दिखाई देता है।

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