प्र1.
जब आपने चंद्रमा का अवलोकन क्रमागत दिनों में एक ही समय पर (उदाहरण के लिए सूर्योदय के समय) किया तो क्या आपने उसकी स्थिति आकाश के भिन्न-भिन्न भागों में पाई?
उत्तर
हाँ, और यह खिसकाव पूर्णतः पूर्वानुमेय है, क्योंकि चंद्रमा की कला और आकाश में सूर्य से उसकी दूरी — दोनों एक ही सूचना हैं।
| पूर्णिमा के बाद दिन | दिखाई देने वाली कला | आकाश में सूर्य से कोणीय दूरी | सूर्योदय के समय स्थिति |
|---|---|---|---|
| 0 | पूर्णवृत्त | लगभग 180° | पश्चिमी क्षितिज पर अस्त होता हुआ |
| लगभग 7 | अर्धवृत्त | लगभग 90° | ठीक सिर के ऊपर |
| लगभग 11 | बालचंद्र | लगभग 45° | पूर्वी आकाश में, सूर्य से काफी ऊपर |
| लगभग 15 | दिखाई नहीं देता | लगभग 0° | सूर्य के साथ उदित — प्रकाश में लुप्त |
ऐसा क्यों होता है: सूर्य का प्रकाश चंद्रमा के आधे भाग को दीप्त करता है। उस दीप्त भाग का कितना अंश हमें दिखेगा, यह केवल इस बात पर निर्भर है कि हम उसे किस कोण से देख रहे हैं — और वही कोण हमारे आकाश में चंद्रमा-सूर्य की दूरी है। अतः जैसे-जैसे चंद्रमा दिन-प्रतिदिन सूर्य की ओर सरकता है, उसका चमकीला भाग भी साथ-साथ घटता जाना ही चाहिए। एक ही अवलोकन, दो परिणाम।
संकेत: इसे उलट दीजिए तो यह एक उपयोगी कौशल बन जाता है। यदि आज का चंद्रमा मोटा अर्धाधिक और वर्धमान है तो वह सूर्य से लगभग 135° दूर है, अतः सूर्यास्त से कुछ घंटे पूर्व पूर्व दिशा में देखिए। क्षीयमाण बालचंद्र सूर्य से मात्र 30° दूर होता है — उसे सूर्योदय से ठीक पहले पूर्व में नीचे देखिए।