कुतूहल अध्याय 11 खोजबीन और विचार करें

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
क्या आपने कभी दिन के समय चाँद देखा है? आपके विचार से यह कभी-कभी सूर्य के क्षितिज पर विद्यमान होने पर भी क्यों दिखाई देता है?
उत्तर

हाँ — चंद्रमा दिन के आकाश में उससे कहीं अधिक बार होता है जितना हम ध्यान देते हैं। मकर संक्रांति के दिन पतंग महोत्सव में मीरा ने इसे देखा था। यह दिन में इसलिए दिखाई देता है क्योंकि यह सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करके चमकता है, और यह परावर्तित प्रकाश इतना चमकीला होता है कि नीले आकाश की पृष्ठभूमि में भी दिख जाता है — बशर्ते चंद्रमा क्षितिज के ऊपर हो और सूर्य से पर्याप्त दूर हो।

ऐसा क्यों होता है: चंद्रमा प्रत्येक 24 घंटों में लगभग 12 घंटे क्षितिज के ऊपर रहता है, परंतु ये 12 घंटे रात्रि से बँधे नहीं हैं। चंद्रमा प्रतिदिन लगभग 50 मिनट देर से उदित होता है, अतः एक माह में उसका उदय-काल पूरे दिन-रात में घूम जाता है। लगभग आधे माह तक इसका बड़ा भाग दिन के उजाले में पड़ता है। अध्याय का ही उदाहरण देखिए — 7 अप्रैल 2025 को चंद्रोदय 14:23 बजे, अर्थात दोपहर बाद हुआ था।

नवचंद्र (अमावस्या) के आस-पास यह दिखाई नहीं देगा, और इसके दो कारण एक साथ काम करते हैं — तब चंद्रमा सूर्य की लगभग उसी दिशा में होता है अतः सूर्य के प्रकाश में खो जाता है, और उसका अदीप्त भाग ही पृथ्वी की ओर होता है।

स्वयं देखिए: पूर्णिमा के बाद वाले सप्ताह में अपराह्न में पूर्व दिशा में देखिए, अथवा अमावस्या के बाद वाले सप्ताह में प्रातःकाल पश्चिम दिशा में। एक बार देखना आरंभ कर दें तो नीले आकाश में फीका-सा चंद्रमा प्रायः दिखाई देने लगेगा।
प्र2.
मान लीजिए कि आप पृथ्वी पर नहीं चाँद पर रहते हैं तब आपके लिए एक दिन, एक माह अथवा एक वर्ष से क्या अभिप्राय होगा?
उत्तर

समय का प्रत्येक मात्रक उसी प्राकृतिक चक्र से आता है जो हमें अपने स्थान से दिखाई देता है, अतः तीनों मात्रक बदल जाएँगे।

  • एक दिन — एक सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक। अध्याय बताता है कि चंद्रमा का मात्र आधा भाग ही सर्वदा पृथ्वी के सामने रहता है। यह तभी संभव है जब चंद्रमा अपने अक्ष पर ठीक उतने ही समय में एक घूर्णन करे जितने में वह पृथ्वी की एक परिक्रमा करता है। अतः चंद्रमा पर एक दिन लगभग 29.5 पृथ्वी-दिनों का होगा — लगभग 14¾ दिन लगातार सूर्य का प्रकाश और फिर 14¾ दिन अंधकार।
  • एक माह — पृथ्वी पर माह आकाश में हमारे साथी पिंड की कलाओं का एक चक्र है। चंद्रमा से देखने पर वह साथी पिंड पृथ्वी होगी, और पृथ्वी भी ठीक इसी 29.5 दिन की लय में कलाएँ दिखाएगी। परंतु यह लय तो चंद्र-दिवस के बराबर है, अतः चंद्रमा पर माह और दिन एक ही मात्रक हो जाएँगे। संभवतः वहाँ अलग से माह की आवश्यकता ही न पड़े।
  • एक वर्ष — चंद्रमा पृथ्वी के साथ ही सूर्य के परितः परिक्रमा करता है, अतः उसका ऋतु-चक्र पृथ्वी का ही चक्र है। चंद्रमा पर भी वर्ष लगभग 365¼ दिनों का ही रहेगा।
ऐसा क्यों होता है: ‘दिन’ घूर्णन को मापता है, ‘माह’ साथी पिंड के परिक्रमण को और ‘वर्ष’ सूर्य के परितः यात्रा को। चंद्रमा पर पहले दो चक्रों की अवधि समान हो गई है, इसीलिए वहाँ का कालदर्शक हमें इतना विचित्र लगेगा।
प्र3.
क्या होता यदि पृथ्वी के दो चंद्रमा होते? इससे रात्रि आकाश का दृश्य कैसे परिवर्तित हो जाता?
उत्तर

दो चंद्रमाओं की कक्षाएँ और परिक्रमण काल भिन्न-भिन्न होते, और इसी एक बात से आगे सब कुछ बदल जाता।

  • एक साथ दो कला-चक्र। प्रत्येक चंद्रमा अपनी-अपनी दर से कलाएँ बदलता। अधिकांश रात्रियों में एक वर्धमान बालचंद्र होता तो दूसरा क्षीयमाण अर्धाधिक चंद्र, और दोनों का एक साथ पूर्ण होना विरल घटना होती।
  • अधिक प्रकाशमान रात्रियाँ। पूर्णतः अंधकारमय रात्रियाँ — जब दोनों नवचंद्र हों अथवा दोनों क्षितिज के नीचे हों — दुर्लभ हो जातीं।
  • ‘मास’ एक स्पष्ट मात्रक न रह जाता। हमारा मास इसलिए है क्योंकि कलाओं का एक ही चक्र नियमित रूप से दोहराता है। दो चंद्रमाओं के साथ कालदर्शक बनाने वाले को किसी एक को चुनना पड़ता, अथवा ऐसा बड़ा मात्रक गढ़ना पड़ता जिसमें दोनों चक्र समा जाएँ — यह एक वर्ष में 12 चंद्र मास बैठाने से कहीं कठिन कार्य होता।
  • अधिक ग्रहण। प्रत्येक चक्र में किसी चंद्रमा के पृथ्वी की छाया में आने अथवा सूर्य के सामने से गुजरने के दो अवसर होते; दोनों चंद्रमा परस्पर भी एक-दूसरे को ढक सकते।
  • जटिल ज्वार-भाटा। ज्वार-भाटा चंद्रमा की स्थिति और कला से जुड़े हैं। दो आकर्षणों के कारण ज्वार कभी जुड़ते और कभी कटते, अतः उनका समय और ऊँचाई कहीं कम नियमित होते।
क्या आप जानते हैं? मंगल ग्रह के वास्तव में दो छोटे चंद्रमा हैं — फ़ोबोस और डीमोस। फ़ोबोस मंगल की एक परिक्रमा मात्र साढ़े सात घंटे में कर लेता है, जो मंगल के घूर्णन से भी तीव्र है, इसलिए मंगल की सतह से वह पश्चिम में उदित होकर पूर्व में अस्त होता दिखाई देता है।
प्र4.
यदि हमारे पास घड़ियाँ अथवा कालदर्शक (कैलेंडर) नहीं होते तो हम समय का मापन कैसे करते?
उत्तर

प्राकृतिक आवर्ती घटनाओं को गिनकर — अर्थात ऐसी घटनाएँ जो निश्चित अंतराल पर दोहराती हैं। इतिहास का प्रत्येक कालदर्शक इसी प्रकार आरंभ हुआ, और यह अध्याय उनमें से तीन का उपयोग करता है।

प्राकृतिक चक्रवास्तव में क्या गति कर रहा हैउपयोग कैसे करतेअवधि
सूर्योदय, मध्याह्न, सूर्यास्तपृथ्वी का अपने अक्ष पर घूर्णनएक छड़ी ऊर्ध्वाधर गाड़कर उसकी छाया के सिरे पर बिंदु अंकित कीजिए। मध्याह्न में छाया लघुतम होती है; दो मध्याह्नों का अंतराल एक दिन है (क्रियाकलाप 11.3)24 घंटे
चंद्रमा की कलाएँपृथ्वी के परितः चंद्रमा का परिक्रमणएक पूर्णिमा से अगली पूर्णिमा तक रातें गिनिए; प्रत्येक रात की आकृति बता देती है कि गिनती कहाँ पहुँचीलगभग 29.5 दिन
ऋतुओं का चक्र; क्षितिज पर सूर्योदय के स्थान का खिसकनासूर्य के परितः पृथ्वी का परिक्रमणकिसी वृक्ष या पहाड़ी के सापेक्ष सूर्योदय का स्थान अंकित कीजिए। यह लगभग 21 जून तक उत्तर की ओर और 21 दिसंबर तक दक्षिण की ओर सरकता है — उत्तरायण और दक्षिणायनलगभग 365 दिन

दिन के भीतर लोग आकाश के स्थान पर किसी स्थिर प्रक्रिया पर आधारित युक्तियाँ भी काम में लाते थे — धूपघड़ी, जलघड़ी, बालूघड़ी अथवा चिह्नित दीपक का जलना।

यह क्यों काम करता है: समय मापना और कुछ नहीं, किसी विश्वसनीय रूप से दोहराने वाली घटना की पुनरावृत्तियाँ गिनना है। आकाश ऐसी सर्वाधिक विश्वसनीय आवर्ती घटनाएँ देता है, इसीलिए प्राचीन खगोलज्ञ बिना किसी उपकरण के भी वर्ष की अवधि लगभग 365 दिन निर्धारित कर सके।
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