हाँ — चंद्रमा दिन के आकाश में उससे कहीं अधिक बार होता है जितना हम ध्यान देते हैं। मकर संक्रांति के दिन पतंग महोत्सव में मीरा ने इसे देखा था। यह दिन में इसलिए दिखाई देता है क्योंकि यह सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करके चमकता है, और यह परावर्तित प्रकाश इतना चमकीला होता है कि नीले आकाश की पृष्ठभूमि में भी दिख जाता है — बशर्ते चंद्रमा क्षितिज के ऊपर हो और सूर्य से पर्याप्त दूर हो।
ऐसा क्यों होता है: चंद्रमा प्रत्येक 24 घंटों में लगभग 12 घंटे क्षितिज के ऊपर रहता है, परंतु ये 12 घंटे रात्रि से बँधे नहीं हैं। चंद्रमा प्रतिदिन लगभग 50 मिनट देर से उदित होता है, अतः एक माह में उसका उदय-काल पूरे दिन-रात में घूम जाता है। लगभग आधे माह तक इसका बड़ा भाग दिन के उजाले में पड़ता है। अध्याय का ही उदाहरण देखिए — 7 अप्रैल 2025 को चंद्रोदय 14:23 बजे, अर्थात दोपहर बाद हुआ था।
नवचंद्र (अमावस्या) के आस-पास यह दिखाई नहीं देगा, और इसके दो कारण एक साथ काम करते हैं — तब चंद्रमा सूर्य की लगभग उसी दिशा में होता है अतः सूर्य के प्रकाश में खो जाता है, और उसका अदीप्त भाग ही पृथ्वी की ओर होता है।
स्वयं देखिए: पूर्णिमा के बाद वाले सप्ताह में अपराह्न में पूर्व दिशा में देखिए, अथवा अमावस्या के बाद वाले सप्ताह में प्रातःकाल पश्चिम दिशा में। एक बार देखना आरंभ कर दें तो नीले आकाश में फीका-सा चंद्रमा प्रायः दिखाई देने लगेगा।