कुतूहल अध्याय 11 क्रियाकलाप 11.2

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
गेंद का वह भाग जो आपकी ओर है क्या वह दीप्त है अथवा अदीप्त है?
उत्तर

‘न’ स्थिति में — अर्थात गेंद को लैंप की ओर करके पकड़ने पर — आपकी ओर वाला भाग अदीप्त होता है। आपको काली गेंद दिखाई देती है।

ऐसा क्यों होता है: लैंप गेंद के उस आधे भाग को दीप्त करता है जो आपकी आँख से परे है। आपकी ओर वाला आधा भाग गेंद की अपनी छाया में रहता है। आपका सिर पृथ्वी है, गेंद चंद्रमा और लैंप सूर्य — अतः यह व्यवस्था, जिसमें चंद्रमा पृथ्वी और सूर्य के बीच है, ठीक नवचंद्र (अमावस्या) का दिन है।
प्र2.
क्या गेंद के दीप्त भाग का आकार परिवर्तित होता है?
उत्तर

हाँ, और वामावर्त घूमने पर यह सुचारु रूप से एक निश्चित क्रम में बदलता है —

न (कुछ भी दीप्त नहीं) → प पतला बालचंद्र → फ अर्धवृत्त → ब अर्धाधिक → त संपूर्ण दीप्त वृत्त → थ अर्धाधिक → द अर्धवृत्त → ध बालचंद्र → पुनः न
ऐसा क्यों होता है: लैंप जो दीप्त करता है उसमें कोई परिवर्तन नहीं होता — वह सदैव गेंद का ठीक आधा भाग ही दीप्त करता है। जो बदलता है वह है आपकी दृष्टि-रेखा। घूमने से आपकी आँख नए कोण पर आ जाती है, अतः दीप्त भाग का भिन्न अंश आपकी ओर होता है। यही चंद्रमा की कलाओं की संपूर्ण क्रियाविधि है, जिसे एक अंधेरे कमरे में दोहराया गया है।
संकेत: गेंद को सिर से थोड़ा ऊपर रखिए। यदि आप उसे ठीक सिर के स्तर पर रखेंगे तो ‘त’ स्थिति पर आपका अपना सिर बीच में आ जाएगा — लघु रूप में यही कारण है कि प्रत्येक माह चंद्र-ग्रहण नहीं होता।
प्र3.
क्या गेंद के दीप्त एवं अदीप्त भागों को पृथक करने वाली रेखा वक्रित है?
उत्तर

हाँ — दो अर्ध-दीप्त स्थितियों (‘द’ और ‘फ’) को छोड़कर प्रत्येक स्थिति पर, जहाँ यह पूर्णतः सीधी दिखाई देती है।

ऐसा क्यों होता है: गेंद पर प्रकाश और अंधकार की सीमा वास्तव में एक वृत्त है जो पूरी गेंद के चारों ओर जाता है। किसी वृत्त को तिरछे कोण से देखने पर वह वृत्त नहीं, बल्कि चपटा वृत्त अर्थात दीर्घवृत्त दिखता है, और उसका आधा भाग एक वक्र रेखा होती है। केवल तब जब आपकी आँख उस वृत्त के तल में हो — अर्थात अर्ध-दीप्त स्थितियों पर — यह दीर्घवृत्त दबकर बीचोबीच सीधी रेखा बन जाता है।

इसी कारण बालचंद्र और अर्धाधिक चंद्र की भीतरी सीमा वक्रित होती है जबकि अर्धवृत्ताकार चंद्रमा की सीधी। यह एक उपयोगी संकेत है — सीधी भीतरी सीमा का अर्थ है कि चंद्रमा आकाश में सूर्य से ठीक 90° दूर है।

प्र4.
क्या आपके अवलोकन 11.4 (ग) में दर्शाई गए गेंद के दीप्त भाग के परिवर्तित होते आकार के समरूप थे?
उत्तर

हाँ। आपको दिखाई देने वाला क्रम चित्र 11.4 (ग) से स्थिति-दर-स्थिति मेल खाता है, और प्रत्येक स्थिति चित्र 11.5 की किसी वास्तविक चंद्र-कला से मेल खाती है —

गेंद की स्थितिलैंप के सापेक्ष स्थानआपको क्या दिखता हैसंगत चंद्र-कला
लैंप के विपरीतसंपूर्ण वृत्त दीप्तपूर्णचंद्र (पूर्णिमा), दिन 1
थ और ब‘त’ से थोड़ा एक ओरआधे से अधिक दीप्तअर्धाधिक कला (गिब्बस)
द और फलैंप के समकोण परठीक आधा दीप्त, सीधी सीमाअर्धवृत्ताकार चंद्रमा
ध और प‘न’ से थोड़ा एक ओरआधे से कम दीप्तबालचंद्र कला (क्रीसेंट)
लैंप की ओरकोई दीप्त भाग नहींनवचंद्र (अमावस्या), दिन 15
ऐसा क्यों होता है: यह क्रियाकलाप वास्तविक ज्यामिति को हूबहू दोहराता है — एक स्थिर प्रकाश स्रोत, केवल आधे भाग पर प्रकाशित एक गोला, और एक गतिशील प्रेक्षक। चूँकि उत्तर केवल सूर्य-पृथ्वी-चंद्रमा के कोण पर निर्भर है, अतः एक गेंद, एक टॉर्च और अंधेरा आँगन ही चंद्रमा की कलाएँ व्युत्पन्न करने के लिए पर्याप्त हैं।
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