जब चंद्रमा सूर्य के समीप दिखाई देता है तो इसका पृथ्वी से दर्शनीय दीप्त भाग घट क्यों जाता है?
उत्तर
क्योंकि हमें कितना अंश दिखेगा यह पूर्णतः इस बात पर निर्भर करता है कि हम दीप्त भाग को किस कोण से देख रहे हैं, और वही कोण आकाश में चंद्रमा-सूर्य की दूरी है।
सूर्य का प्रकाश सदैव चंद्रमा के ठीक आधे भाग को — सूर्य के सामने वाले आधे भाग को — दीप्त करता है (चित्र 11.3)। यह कभी नहीं बदलता। जो बदलता है वह है उस दीप्त भाग को देखने के लिए पृथ्वी की स्थिति।
जब चंद्रमा आकाश में सूर्य से दूर हो (पूर्णिमा, लगभग 180°), तब हम चंद्रमा को लगभग उसी दिशा से देख रहे होते हैं जिस दिशा से सूर्य का प्रकाश आ रहा है, अतः दीप्त भाग लगभग सीधा हमारी ओर होता है। हमें वह पूरा दिखता है।
जैसे-जैसे चंद्रमा आकाश में सूर्य के समीप आता है, हम उस दीप्त भाग को अधिकाधिक तिरछा देखने लगते हैं। उसका कम-से-कम अंश हमारी ओर रह जाता है, अतः चमकीली आकृति सिकुड़ती जाती है — अर्धाधिक, फिर अर्धवृत्त, फिर पतला बालचंद्र।
नवचंद्र (लगभग 0°) पर हम चंद्रमा को सूर्य के प्रकाश की ठीक विपरीत दिशा से देखते हैं। पूरा दीप्त भाग परे मुड़ जाता है और केवल अदीप्त भाग हमारी ओर रहता है।
प्रत्येक स्थिति में सूर्य चंद्रमा के उसी आधे भाग को दीप्त करता है। ज्यों-ज्यों चंद्रमा आकाश में सूर्य की दिशा की ओर बढ़ता है, पृथ्वी उस दीप्त भाग को अधिकाधिक तिरछा देखती है, अतः चमकीली आकृति पूर्णवृत्त से बालचंद्र और फिर शून्य हो जाती है।
सावधान: इसका पृथ्वी की छाया से कोई संबंध नहीं है। चंद्रमा पर पृथ्वी की छाया पड़ने से चंद्र-ग्रहण होता है, जो केवल पूर्णिमा के दिन ही हो सकता है और प्रत्येक माह नहीं होता, क्योंकि चंद्रमा की कक्षा सूर्य के परितः पृथ्वी की कक्षा के सापेक्ष थोड़ी झुकी हुई है।
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