| कथन | सत्य / असत्य | कारण |
|---|---|---|
| (i) हम चंद्रमा के केवल उस भाग को देख पाते हैं जो सूर्य के प्रकाश को हमारी ओर परावर्तित करता है। | सत्य | चंद्रमा स्वयं का प्रकाश उत्सर्जित नहीं करता। केवल वही भाग दिखता है जो सूर्य से दीप्त हो और पृथ्वी की ओर उन्मुख भी हो। |
| (ii) पृथ्वी की छाया सूर्य के प्रकाश को चंद्रमा तक नहीं पहुँचने देती और चंद्रमा की कलाओं का कारण बनती है। | असत्य | कलाएँ चंद्रमा के परिक्रमण से सूर्य, पृथ्वी एवं चंद्रमा के सापेक्ष अभिविन्यास में परिवर्तन के कारण होती हैं। चंद्रमा पर पृथ्वी की छाया से चंद्र-ग्रहण होता है, जो केवल कुछ पूर्णिमाओं को ही होता है। |
| (iii) कालदर्शक विभिन्न खगोलीय चक्रों पर आधारित होते हैं जो निश्चित क्रम में बारंबार घटित होते हैं। | सत्य | दिन, मास और वर्ष क्रमशः पृथ्वी के घूर्णन, चंद्रमा की कलाओं के चक्र और पृथ्वी के परिक्रमण से आते हैं। |
| (iv) चंद्रमा को केवल रात्रि के समय ही देखा जा सकता है। | असत्य | चंद्रमा प्रतिदिन लगभग 50 मिनट देर से उदित होता है, अतः अनेक दिनों में वह दिन के उजाले में क्षितिज के ऊपर होता है — जैसा मीरा ने पतंग महोत्सव में देखा। |
कुतूहल अध्याय 11 जिज्ञासा बनाए रखें
अद्यतन2026-09-05
नहीं। उसका जन्मदिन प्रतिवर्ष 6 मई को आता है, परंतु पूर्णिमा नहीं आती।
चंद्रमा की कलाओं के 12 चक्र = 12 × 29.5 = 354 दिन
अंतर = 365 − 354 = लगभग 11 दिन
उस चित्र में दो बातें ऐसी हैं जो हो ही नहीं सकतीं —
- चंद्रमा के अदीप्त भाग के भीतर तारे दर्शाए गए हैं। चंद्रमा लगभग 3500 किलोमीटर व्यास का ठोस, अपारदर्शी पिंड है। उसके पीछे की हर वस्तु ढक जाती है, अतः चंद्रमा के बिंब के भीतर कोई तारा कभी दिखाई नहीं दे सकता। तारे चंद्रमा के चारों ओर बनाए जा सकते हैं, उस पर नहीं।
- चंद्रमा का अदीप्त भाग एक दृश्यमान काले बिंब के रूप में दिखाया गया है। हम केवल उसी भाग को देख सकते हैं जो सूर्य का प्रकाश हमारी ओर परावर्तित करता है। बालचंद्र की रात्रि में शेष चंद्रमा आकाश की पृष्ठभूमि में काला नहीं दिखता — वह दिखता ही नहीं, और आकाश तथा उसके तारे चमकीले बालचंद्र के किनारे तक दिखाई देते हैं।
(i) प्रत्येक चित्र का मिलान एक ही प्रश्न से कीजिए — बिंब का कितना अंश चमकीला है? तीन दिन पखवाड़े का लगभग पाँचवाँ भाग है और एक सप्ताह उसका आधा।
| चित्र का नामाक्षर | चंद्रमा की कला | क्यों |
|---|---|---|
| ध | अमावस्या के तीन दिन पश्चात | पतला बालचंद्र — बिंब का लगभग दसवाँ भाग ही चमकीला है और वह बढ़ रहा है (वर्धमान) |
| न | पूर्णिमा | पूरा बिंब चमकीला है |
| त | पूर्णिमा के तीन दिन पश्चात | लगभग पूर्ण, एक किनारे से पतला अदीप्त बालचंद्र कटा हुआ — अभी-अभी क्षीण होना आरंभ हुआ अर्धाधिक चंद्र |
| द | पूर्णिमा के एक सप्ताह पश्चात | ठीक आधा चमकीला, विभाजक रेखा सीधी — चंद्रमा अब सूर्य से 90° दूर है |
| थ | अमावस्या के दिन | पूर्णतः अदीप्त — केवल अदीप्त भाग ही पृथ्वी की ओर है |
(ii) चित्र ‘प’ पृथ्वी से कभी दिखाई नहीं देता।
(i) उसने अर्धवृत्ताकार चंद्रमा देखा — ठीक आधा बिंब चमकीला, विभाजक रेखा सीधी, और चमकीला आधा भाग पश्चिम में अस्त होते सूर्य की ओर।
(ii) यह चंद्रमा का वर्धमान काल (शुक्ल पक्ष) है।
कौशल्या की बात सत्य है। रवि की बात सही नहीं हो सकती।
- रवि: जिस क्षण सूर्य पश्चिम में अस्त हो रहा हो उसी क्षण पूर्व में उदित होता चंद्रमा सूर्य से 180° दूर होता है। 180° पर संपूर्ण दीप्त भाग हमारी ओर होता है — अर्थात वह पूर्णचंद्र होगा, बालचंद्र नहीं। बालचंद्र सूर्य से मात्र 30°–45° दूर होता है, अतः वह कभी विपरीत क्षितिज पर हो ही नहीं सकता। रवि जो बता रहा है वह ज्यामितीय रूप से असंभव है।
- कौशल्या: अर्धाधिक चंद्र सूर्य से लगभग 135° दूर होता है। दोपहर बाद सूर्य आकाश के पश्चिमी भाग में होता है, अतः पूर्व में नीचा कोई बिंदु उससे लगभग इतनी ही दूरी पर होता है। वर्धमान अर्धाधिक चंद्रमा वास्तव में अपराह्न में पूर्व दिशा में उदित होता है — अध्याय स्वयं बताता है कि कभी-कभी चंद्रोदय 2:00–4:00 बजे के लगभग होता है, इसीलिए चंद्रमा दिन के उजाले में दिख जाता है।
घटाने की आवश्यकता होगी — अर्थात अंतर्वेशी मास कम बार जोड़ना पड़ेगा।
सौर वर्ष से कमी = 365 − 354 = 11 दिन प्रतिवर्ष
अतिरिक्त मास तब चाहिए जब यह कमी लगभग 29.5 दिन हो जाए
लगने वाला समय = 29.5 ÷ 11 ≈ 2.7 वर्ष — अध्याय का ‘प्रत्येक 2 से 3 वर्ष’
मान लीजिए चंद्रमा इतना धीमा हो जाए कि एक चक्र 30 दिन का हो जाए:
12 चंद्र मास = 12 × 30 = 360 दिन
कमी = 365 − 360 = मात्र 5 दिन प्रतिवर्ष
लगने वाला समय = 30 ÷ 5 = 6 वर्ष
उपलब्ध महीनों को गिनकर पूर्णिमाओं की संख्या से तुलना कीजिए।
पूर्णिमाओं की संख्या = 37
37, 36 से अधिक है
मान लीजिए इसके विपरीत कोई भी दो पूर्णिमाएँ एक ही महीने में न आती हों। तब 37 में से प्रत्येक पूर्णिमा को अपना-अपना अलग महीना चाहिए, अर्थात कम से कम 37 भिन्न महीने चाहिए। परंतु उन तीन वर्षों में केवल 36 महीने हैं। यह असंभव है, अतः हमारी कल्पना गलत है — कम से कम एक महीने में दो पूर्णिमाएँ अवश्य आएँगी।
उसने पूर्णचंद्र (पूर्णिमा) देखा होगा।
कोई अन्य कला यह नहीं कर सकती। अर्धवृत्ताकार चंद्रमा सूर्य से मात्र 90° दूर है अतः लगभग आधी रात्रि ही आकाश में रहता है; बालचंद्र सूर्य के समीप होता है अतः या तो उसके तुरंत बाद अस्त हो जाता है या उससे ठीक पहले उदित होता है।
लगभग 700 से 750 वर्ष — मोटे तौर पर सात शताब्दियाँ।
प्रतिवर्ष खिसकाव = ¼ दिन = 0.25 दिन
अतः कालदर्शक प्रत्येक 4 वर्ष में ऋतुओं से 1 दिन पीछे रह जाता है
15 अगस्त अभी वर्षा ऋतु में है। शीत ऋतु का मौसम ऋतु-चक्र में लगभग 6 माह पहले आता है:
आवश्यक खिसकाव = 365 ÷ 2 ≈ 183 दिन
आवश्यक वर्ष = 183 × 4 = लगभग 730 वर्ष
कृत्रिम उपग्रह इसलिए प्रमोचित किए जाते हैं क्योंकि कक्षा में स्थापित कोई यंत्र पृथ्वी के कहीं बड़े भाग को देख, सुन और उस तक पहुँच सकता है, जितना भूमि पर स्थित कोई भी साधन नहीं कर सकता।
| उद्देश्य | हमारे लिए क्या करता है |
|---|---|
| संचार | दूरभाष, दूरदर्शन और अंतर्जाल के संकेतों को ऐसे स्थानों के बीच पहुँचाता है जो सीधे जुड़ने के लिए बहुत दूर हैं |
| यान संचालन (नेविगेशन) | भूमि, जलयान अथवा वायुयान पर स्थित ग्राही को उसकी यथार्थ अवस्थिति बताता है |
| मौसम-अनुवीक्षण | ऊपर से बादलों, तूफानों और चक्रवातों पर दृष्टि रखता है जिससे समय रहते चेतावनी दी जा सके |
| आपदा प्रबंधन | बाढ़, चक्रवात और भूकंप का मानचित्रण करता है जिससे राहत सही स्थान पर भेजी जा सके |
| वैज्ञानिक अनुसंधान | वायुमंडल के ऊपर से पृथ्वी, सूर्य, ग्रहों, तारों तथा अन्य खगोलीय पिंडों का अध्ययन करता है |
भारत के अपने अभियान इनमें से प्रत्येक को दर्शाते हैं। कार्टोसैट मानचित्रों को सुधारने, नगरों के नियोजन और प्राकृतिक आपदाओं के प्रबंधन हेतु पृथ्वी की उच्च गुणवत्ता की छवियाँ लेता है, और भुवन मंच इन छवियों से भू-रूप, मृदा, भूमि-उपयोग तथा वनस्पति दर्शाता है। एस्ट्रोसैट तारों एवं अन्य खगोलीय पिंडों का अवलोकन करता है। चंद्रयान–1, 2 एवं 3 चंद्रमा तक गए, आदित्य एल–1 सूर्य का अध्ययन करता है और मंगलयान मंगल तक गया। इसरो भारतीय विद्यार्थियों को आजादीसैट, इंसपायरसैट–1 और जुगनु जैसे छोटे उपग्रह बनाने एवं प्रमोचित करने की अनुमति भी देता है।
| समय का माप | आधारभूत आवर्ती परिघटना | अवधि |
|---|---|---|
| (i) दिवस | पृथ्वी का अपने अक्ष के परितः घूर्णन, जिससे सूर्य आकाश में पुनः अपनी उच्चतम स्थिति पर लौटता है — जिसे लघुतम छाया से ज्ञात किया जाता है | 24 घंटे (माध्य सौर दिन) |
| (ii) मास | चंद्रमा की कलाओं का एक पूर्ण चक्र, जो पृथ्वी के परितः चंद्रमा के परिक्रमण से होता है | लगभग 29.5 दिन |
| (iii) वर्ष | सूर्य के परितः पृथ्वी का परिक्रमण, जिससे ऋतुओं का एक पूर्ण चक्र मिलता है | लगभग 365¼ दिन |