कुतूहल अध्याय 11 जिज्ञासा बनाए रखें

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
बताइए कि नीचे दिए गए कथन सत्य हैं या असत्य — (i) हम चंद्रमा के केवल उस भाग को देख पाते हैं जो सूर्य के प्रकाश को हमारी ओर परावर्तित करता है। (ii) पृथ्वी की छाया सूर्य के प्रकाश को चंद्रमा तक नहीं पहुँचने देती और चंद्रमा की कलाओं का कारण बनती है। (iii) कालदर्शक विभिन्न खगोलीय चक्रों पर आधारित होते हैं जो निश्चित क्रम में बारंबार घटित होते हैं। (iv) चंद्रमा को केवल रात्रि के समय ही देखा जा सकता है।
उत्तर
कथनसत्य / असत्यकारण
(i) हम चंद्रमा के केवल उस भाग को देख पाते हैं जो सूर्य के प्रकाश को हमारी ओर परावर्तित करता है।सत्यचंद्रमा स्वयं का प्रकाश उत्सर्जित नहीं करता। केवल वही भाग दिखता है जो सूर्य से दीप्त हो और पृथ्वी की ओर उन्मुख भी हो।
(ii) पृथ्वी की छाया सूर्य के प्रकाश को चंद्रमा तक नहीं पहुँचने देती और चंद्रमा की कलाओं का कारण बनती है।असत्यकलाएँ चंद्रमा के परिक्रमण से सूर्य, पृथ्वी एवं चंद्रमा के सापेक्ष अभिविन्यास में परिवर्तन के कारण होती हैं। चंद्रमा पर पृथ्वी की छाया से चंद्र-ग्रहण होता है, जो केवल कुछ पूर्णिमाओं को ही होता है।
(iii) कालदर्शक विभिन्न खगोलीय चक्रों पर आधारित होते हैं जो निश्चित क्रम में बारंबार घटित होते हैं।सत्यदिन, मास और वर्ष क्रमशः पृथ्वी के घूर्णन, चंद्रमा की कलाओं के चक्र और पृथ्वी के परिक्रमण से आते हैं।
(iv) चंद्रमा को केवल रात्रि के समय ही देखा जा सकता है।असत्यचंद्रमा प्रतिदिन लगभग 50 मिनट देर से उदित होता है, अतः अनेक दिनों में वह दिन के उजाले में क्षितिज के ऊपर होता है — जैसा मीरा ने पतंग महोत्सव में देखा।
संकेत: कथन (ii) चंद्रमा के विषय में सबसे प्रचलित भ्रांत धारणा है। यदि कलाओं का कारण पृथ्वी की छाया होती तो वह प्रत्येक माह पड़ती और छाया का किनारा सदैव पृथ्वी के अपने आमाप का वृत्तीय चाप होता — इनमें से कुछ भी हम नहीं देखते।
प्र2.
अमोल का जन्म 6 मई को पूर्णिमा के दिन हुआ था। क्या उसका जन्मदिन प्रतिवर्ष पूर्णिमा के दिन ही होता है? अपने उत्तर की व्याख्या कीजिए।
उत्तर

नहीं। उसका जन्मदिन प्रतिवर्ष 6 मई को आता है, परंतु पूर्णिमा नहीं आती।

एक ग्रेगोरी वर्ष = 365 दिन
चंद्रमा की कलाओं के 12 चक्र = 12 × 29.5 = 354 दिन
अंतर = 365 − 354 = लगभग 11 दिन
ऐसा क्यों होता है: उसके जन्म के एक वर्ष बाद चंद्रमा 354 दिनों में 12 चक्र पूरे कर चुका होता है और फिर 11 दिन और आगे बढ़ चुका होता है। अतः अगले वर्ष 6 मई को चंद्रमा पूर्णिमा से लगभग 11 दिन आगे, अर्थात क्षीयमाण बालचंद्र के रूप में और अमावस्या के निकट होगा। दीवार के कालदर्शक का दिनाँक सूर्य से तय होता है और कला चंद्रमा से; ये दोनों चक्र एक-दूसरे में पूरे-पूरे बँटते ही नहीं।
क्या आप जानते हैं? ये दोनों पुनः मिलते अवश्य हैं, पर धीरे-धीरे। 235 चंद्र मास (लगभग 6940 दिन) लगभग ठीक 19 सौर वर्षों (भी लगभग 6940 दिन) के बराबर होते हैं, अतः वही कला उसी दिनाँक पर लगभग प्रत्येक 19 वर्ष में लौटती है। अमोल को 19, 38 और 57 वर्ष की आयु में पूर्णिमा वाला जन्मदिन मिलेगा।
प्र3.
ऐसी दो बातें बताइए जो चित्र 11.10 में सही नहीं दर्शाई गई हैं।
उत्तर

उस चित्र में दो बातें ऐसी हैं जो हो ही नहीं सकतीं —

  1. चंद्रमा के अदीप्त भाग के भीतर तारे दर्शाए गए हैं। चंद्रमा लगभग 3500 किलोमीटर व्यास का ठोस, अपारदर्शी पिंड है। उसके पीछे की हर वस्तु ढक जाती है, अतः चंद्रमा के बिंब के भीतर कोई तारा कभी दिखाई नहीं दे सकता। तारे चंद्रमा के चारों ओर बनाए जा सकते हैं, उस पर नहीं।
  2. चंद्रमा का अदीप्त भाग एक दृश्यमान काले बिंब के रूप में दिखाया गया है। हम केवल उसी भाग को देख सकते हैं जो सूर्य का प्रकाश हमारी ओर परावर्तित करता है। बालचंद्र की रात्रि में शेष चंद्रमा आकाश की पृष्ठभूमि में काला नहीं दिखता — वह दिखता ही नहीं, और आकाश तथा उसके तारे चमकीले बालचंद्र के किनारे तक दिखाई देते हैं।
अशुद्ध (जैसा चित्र 11.10 में है) शुद्ध — केवल दीप्त बालचंद्र दिखता है
बाएँ — अदीप्त भाग एक दृश्यमान बिंब के रूप में और उसके भीतर चमकते तारे। दाएँ — आकाश वास्तव में जैसा दिखता है: केवल बालचंद्र, और तारे चंद्रमा के बाहर।
स्वयं देखिए: अगली बालचंद्र रात्रि को ध्यान से देखिए। शेष बिंब हल्का-सा चमकता दिख सकता है — यह पृथ्वी-प्रकाश है, अर्थात पृथ्वी से परावर्तित होकर चंद्रमा की रात्रि वाली सतह पर पड़ता सूर्य का प्रकाश। तब भी उसमें से कोई तारा नहीं झाँकता।
प्र4.
चित्र 11.11 में दर्शाई गई चंद्रमा की कलाओं के चित्रों को देखिए और निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए। (i) उपर्युक्त चित्र में दर्शाई गई चंद्रमा की कलाओं के संगत सही नामाक्षर लिखिए। [अमावस्या के तीन दिन पश्चात; पूर्णिमा; पूर्णिमा के तीन दिन पश्चात; पूर्णिमा के एक सप्ताह पश्चात; अमावस्या के दिन] (ii) चित्र में दर्शाई गई चंद्रमा की उन कलाओं के नामाक्षर लिखिए जो पृथ्वी से दिखाई नहीं देतीं। (संकेत — संदर्भ के लिए आप क्रियाकलाप 11.1 के अपने अवलोकनों अथवा चित्र 11.2 का उपयोग कर सकते हैं।)
उत्तर

(i) प्रत्येक चित्र का मिलान एक ही प्रश्न से कीजिए — बिंब का कितना अंश चमकीला है? तीन दिन पखवाड़े का लगभग पाँचवाँ भाग है और एक सप्ताह उसका आधा।

चित्र का नामाक्षरचंद्रमा की कलाक्यों
अमावस्या के तीन दिन पश्चातपतला बालचंद्र — बिंब का लगभग दसवाँ भाग ही चमकीला है और वह बढ़ रहा है (वर्धमान)
पूर्णिमापूरा बिंब चमकीला है
पूर्णिमा के तीन दिन पश्चातलगभग पूर्ण, एक किनारे से पतला अदीप्त बालचंद्र कटा हुआ — अभी-अभी क्षीण होना आरंभ हुआ अर्धाधिक चंद्र
पूर्णिमा के एक सप्ताह पश्चातठीक आधा चमकीला, विभाजक रेखा सीधी — चंद्रमा अब सूर्य से 90° दूर है
अमावस्या के दिनपूर्णतः अदीप्त — केवल अदीप्त भाग ही पृथ्वी की ओर है

(ii) चित्र ‘प’ पृथ्वी से कभी दिखाई नहीं देता।

संभव — दोनों नोकें एक ही व्यास के सिरे हैं असंभव (प): अदीप्त धब्बे के दोनों ओर दीप्त चंद्रमा है
प्रकाश और अंधकार को बाँटने वाली रेखा सदैव चंद्रमा के किनारे के दो विपरीत बिंदुओं को जोड़ती है और बिंब को ठीक दो भागों में काटती है। ‘प’ में अदीप्त भाग बिंब के भीतर पड़ा एक पत्ती जैसा धब्बा है जिसके दोनों ओर दीप्त चंद्रमा है — सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा की कोई भी व्यवस्था ऐसा नहीं बना सकती।
ऐसा क्यों होता है: सूर्य का प्रकाश चंद्रमा के पूरे आधे भाग को दीप्त करता है, अतः दीप्त और अदीप्त अर्धगोलों की सीमा एक वृत्त है जो चंद्रमा के दोनों ध्रुवों से होकर उसके चारों ओर जाता है। पृथ्वी से यह सीधी रेखा (अर्धवृत्ताकार चंद्रमा) अथवा एक ओर उभरा वक्र (बालचंद्र) या दूसरी ओर उभरा वक्र (अर्धाधिक) दिख सकती है, परंतु उसके दोनों सिरे सदैव चंद्रमा के किनारे के विपरीत बिंदुओं पर ही पड़ेंगे। चित्र ‘प’ ठीक इसी नियम को तोड़ता है।
प्र5.
मालिनी ने सूर्यास्त के समय चंद्रमा को ठीक अपने सिर के ऊपर देखा — (i) मालिनी द्वारा प्रेक्षित चंद्रमा की कला का चित्र बनाइए। (ii) क्या यह चंद्रमा का वर्धमान काल है या क्षीयमाण काल है?
उत्तर

(i) उसने अर्धवृत्ताकार चंद्रमा देखा — ठीक आधा बिंब चमकीला, विभाजक रेखा सीधी, और चमकीला आधा भाग पश्चिम में अस्त होते सूर्य की ओर।

अर्धवृत्ताकार चंद्रमा (दीप्त भाग सूर्य की ओर) पूर्व पश्चिम अस्त होता सूर्य सिर के ऊपर चंद्रमा 90°
सूर्यास्त के समय सिर के ऊपर होने का अर्थ है कि चंद्रमा आकाश में सूर्य से एक चौथाई चक्कर अर्थात 90° दूर है, और 90° की दूरी पर सदैव अर्धवृत्ताकार चंद्रमा दिखता है।

(ii) यह चंद्रमा का वर्धमान काल (शुक्ल पक्ष) है।

ऐसा क्यों होता है: अध्याय इसका दर्पण-रूप बताता है — जब चमकीला भाग घटकर अर्धवृत्ताकार होता है तो चंद्रमा सूर्योदय के समय सिर के ऊपर होता है; वह क्षीयमाण अर्धचंद्र है। सूर्यास्त के समय सिर के ऊपर होना माह का ठीक दूसरा आधा भाग है। यह पृष्ठ 173 के नियम से भी मेल खाता है — वर्धमान चंद्रमा सूर्यास्त के समय और क्षीयमाण चंद्रमा सूर्योदय के समय देखना सुविधाजनक होता है। अगले सप्ताह इसका चमकीला भाग बढ़ता जाएगा और पूर्णिमा को यह ठीक सूर्यास्त के समय उदित होगा।
प्र6.
रवि ने कहा, “मैंने एक बालचंद्र देखा और जब सूर्य अस्त हो रहा था तो यह पूर्व में उदित हो रहा था।” कौशल्या ने कहा, “एक बार मैंने दोपहर के समय पूर्व दिशा में अर्धाधिक चंद्र देखा था।” दोनों में से किसकी बात सत्य है?
उत्तर

कौशल्या की बात सत्य है। रवि की बात सही नहीं हो सकती।

  • रवि: जिस क्षण सूर्य पश्चिम में अस्त हो रहा हो उसी क्षण पूर्व में उदित होता चंद्रमा सूर्य से 180° दूर होता है। 180° पर संपूर्ण दीप्त भाग हमारी ओर होता है — अर्थात वह पूर्णचंद्र होगा, बालचंद्र नहीं। बालचंद्र सूर्य से मात्र 30°–45° दूर होता है, अतः वह कभी विपरीत क्षितिज पर हो ही नहीं सकता। रवि जो बता रहा है वह ज्यामितीय रूप से असंभव है।
  • कौशल्या: अर्धाधिक चंद्र सूर्य से लगभग 135° दूर होता है। दोपहर बाद सूर्य आकाश के पश्चिमी भाग में होता है, अतः पूर्व में नीचा कोई बिंदु उससे लगभग इतनी ही दूरी पर होता है। वर्धमान अर्धाधिक चंद्रमा वास्तव में अपराह्न में पूर्व दिशा में उदित होता है — अध्याय स्वयं बताता है कि कभी-कभी चंद्रोदय 2:00–4:00 बजे के लगभग होता है, इसीलिए चंद्रमा दिन के उजाले में दिख जाता है।
ऐसा क्यों होता है: कला और स्थिति परस्पर बँधी हुई हैं। यदि आपको पता है कि चंद्रमा का कितना भाग दीप्त है तो आपको यह भी पता चल जाता है कि वह आकाश में सूर्य से कितनी दूर होगा और इसलिए लगभग कब उदित होगा। पूर्णचंद्र सूर्यास्त पर उदित होता है; वर्धमान अर्धाधिक चंद्र सूर्यास्त से कुछ घंटे पूर्व; वर्धमान बालचंद्र दिन चढ़े उदित होकर सूर्यास्त के ठीक बाद पश्चिम में नीचा दिखाई देता है।
प्र7.
वैज्ञानिक अध्ययन दर्शाते हैं कि चंद्रमा पृथ्वी से दूर हट रहा है और इसकी परिक्रमण गति कम हो रही है। इससे चंद्र-सौर कालदर्शक में प्रायः अंतर्वेशी मास बढ़ाने की आवश्यकता होगी या घटाने की आवश्यकता होगी।
उत्तर

घटाने की आवश्यकता होगी — अर्थात अंतर्वेशी मास कम बार जोड़ना पड़ेगा।

वर्तमान में: 12 चंद्र मास = 12 × 29.5 = 354 दिन
सौर वर्ष से कमी = 365 − 354 = 11 दिन प्रतिवर्ष
अतिरिक्त मास तब चाहिए जब यह कमी लगभग 29.5 दिन हो जाए
लगने वाला समय = 29.5 ÷ 11 ≈ 2.7 वर्ष — अध्याय का ‘प्रत्येक 2 से 3 वर्ष’

मान लीजिए चंद्रमा इतना धीमा हो जाए कि एक चक्र 30 दिन का हो जाए:
12 चंद्र मास = 12 × 30 = 360 दिन
कमी = 365 − 360 = मात्र 5 दिन प्रतिवर्ष
लगने वाला समय = 30 ÷ 5 = 6 वर्ष
ऐसा क्यों होता है: धीमे चंद्रमा का अर्थ है कलाओं का लंबा चक्र, अतः 12 चंद्र मास आज की अपेक्षा अधिक दिनों के हो जाएँगे और चंद्र वर्ष सौर वर्ष के अधिक निकट आ जाएगा। प्रतिवर्ष की कमी — जो अधिक मास के अस्तित्व का एकमात्र कारण है — घट जाएगी, अतः पूरे एक मास जितना अंतर जमा होने में कहीं अधिक वर्ष लगेंगे। इसलिए यह संशोधन कम बार करना पड़ेगा।
क्या आप जानते हैं? यह एक वास्तविक, मापा गया प्रभाव है। चंद्र अभियानों द्वारा चंद्रमा पर छोड़े गए परावर्तकों से पता चलता है कि चंद्रमा प्रतिवर्ष लगभग 4 सेंटीमीटर हमसे दूर हट रहा है, और दूर जाने के साथ उसका परिक्रमण धीमा होता जाता है।
प्र8.
किसी सौर कालदर्शक में 3 वर्ष की अवधि में कुल 37 पूर्णिमाएँ आती हैं। दर्शाइए कि इन 37 पूर्णिमाओं में से कम से कम दो पूर्णिमाएँ सौर कालदर्शक के एक ही महीने में आएँगी।
उत्तर

उपलब्ध महीनों को गिनकर पूर्णिमाओं की संख्या से तुलना कीजिए।

सौर कालदर्शक के 3 वर्षों में महीने = 3 × 12 = 36 महीने
पूर्णिमाओं की संख्या = 37
37, 36 से अधिक है

मान लीजिए इसके विपरीत कोई भी दो पूर्णिमाएँ एक ही महीने में न आती हों। तब 37 में से प्रत्येक पूर्णिमा को अपना-अपना अलग महीना चाहिए, अर्थात कम से कम 37 भिन्न महीने चाहिए। परंतु उन तीन वर्षों में केवल 36 महीने हैं। यह असंभव है, अतः हमारी कल्पना गलत है — कम से कम एक महीने में दो पूर्णिमाएँ अवश्य आएँगी।

ऐसा क्यों होता है: यह तर्क ‘पिजनहोल’ विचार है — 36 खानों में 37 वस्तुएँ रखने पर किसी न किसी खाने में एक से अधिक आएँगी। इसके पीछे की खगोलीय बात यह है कि 29.5 दिन का चंद्र चक्र लगभग हर कालदर्शक-मास से छोटा है, अतः पूर्णिमाएँ महीनों से थोड़ी तेज़ी से आती हैं और कोई एक महीना दो बार पकड़ ही लेता है। 3 वर्षों में 3 × 365 = 1095 दिन होते हैं, अर्थात 1095 ÷ 29.5 ≈ 37 पूर्णिमाएँ — ठीक वही संख्या जो प्रश्न में दी है।
क्या आप जानते हैं? एक ही कालदर्शक-मास में आने वाली दूसरी पूर्णिमा को लोकप्रिय भाषा में ‘ब्लू मून’ कहा जाता है। इसमें नीला कुछ भी नहीं होता, और यह चंद्रमा के विषय में नहीं बल्कि हमारे कालदर्शक के विषय में एक तथ्य है।
प्र9.
किसी विशेष रात्रि में वैशाली ने आकाश में चंद्रमा का सूर्यास्त से सूर्योदय तक अवलोकन किया। उसने चंद्रमा की किस कला का अवलोकन किया होगा?
उत्तर

उसने पूर्णचंद्र (पूर्णिमा) देखा होगा।

ऐसा क्यों होता है: पूरी रात्रि क्षितिज के ऊपर रहने के लिए चंद्रमा को ठीक सूर्यास्त के समय उदित और ठीक सूर्योदय के समय अस्त होना पड़ेगा। यह तभी संभव है जब चंद्रमा आकाश में सूर्य के ठीक विपरीत हो, अर्थात 180° की दूरी पर। 180° पर पृथ्वी चंद्रमा को लगभग उसी दिशा से देखती है जिस दिशा से सूर्य का प्रकाश आता है, अतः संपूर्ण दीप्त भाग हमारी ओर होता है — एक पूर्ण चमकीला वृत्त। यह चित्र 11.5 की स्थिति ‘त’, दिन 1 है।

कोई अन्य कला यह नहीं कर सकती। अर्धवृत्ताकार चंद्रमा सूर्य से मात्र 90° दूर है अतः लगभग आधी रात्रि ही आकाश में रहता है; बालचंद्र सूर्य के समीप होता है अतः या तो उसके तुरंत बाद अस्त हो जाता है या उससे ठीक पहले उदित होता है।

प्र10.
यदि हम अधिवर्षों (लीप वर्ष) को गणना में लेना बंद कर दें तो लगभग कितने वर्षों के पश्चात भारत का स्वतंत्रता दिवस शीत ऋतु में पड़ेगा?
उत्तर

लगभग 700 से 750 वर्ष — मोटे तौर पर सात शताब्दियाँ।

ऋतुएँ लगभग 365¼ दिनों में दोहराती हैं; अधिवर्ष रहित कालदर्शक केवल 365 दिन गिनता है
प्रतिवर्ष खिसकाव = ¼ दिन = 0.25 दिन
अतः कालदर्शक प्रत्येक 4 वर्ष में ऋतुओं से 1 दिन पीछे रह जाता है

15 अगस्त अभी वर्षा ऋतु में है। शीत ऋतु का मौसम ऋतु-चक्र में लगभग 6 माह पहले आता है:
आवश्यक खिसकाव = 365 ÷ 2 ≈ 183 दिन
आवश्यक वर्ष = 183 × 4 = लगभग 730 वर्ष
ऐसा क्यों होता है: अतिरिक्त दिन के बिना प्रत्येक कालदर्शक-वर्ष पृथ्वी की परिक्रमा पूरी होने से लगभग छह घंटे पहले समाप्त हो जाता है। अतः कालदर्शक थोड़ा तेज़ चलता है और 15 अगस्त जैसा स्थिर दिनाँक प्रतिवर्ष ऋतु-चक्र में कुछ पहले आने लगता है। लगभग 730 वर्षों के पश्चात वह वहाँ आ जाएगा जहाँ आज मध्य फरवरी है — अर्थात शीत ऋतु में। ऋतुओं को पूरा चक्कर लगाकर वापस उसी स्थान पर आने में लगभग 4 × 365 ≈ 1460 वर्ष लगेंगे।
संकेत: ठीक इसी समस्या को रोकने के लिए अधिवर्ष की अवधारणा आई, और इसीलिए ग्रेगोरी कालदर्शक इससे भी आगे जाकर 1700, 1800 तथा 1900 में अधिवर्ष छोड़ देता है और 1600 तथा 2000 में रखता है। ये छोटे-छोटे संशोधन ऋतुओं को हज़ारों वर्ष तक उनके दिनाँकों से बाँधे रखते हैं।
प्र11.
कृत्रिम उपग्रहों के प्रमोचन का उद्देश्य क्या होता है?
उत्तर

कृत्रिम उपग्रह इसलिए प्रमोचित किए जाते हैं क्योंकि कक्षा में स्थापित कोई यंत्र पृथ्वी के कहीं बड़े भाग को देख, सुन और उस तक पहुँच सकता है, जितना भूमि पर स्थित कोई भी साधन नहीं कर सकता।

उद्देश्यहमारे लिए क्या करता है
संचारदूरभाष, दूरदर्शन और अंतर्जाल के संकेतों को ऐसे स्थानों के बीच पहुँचाता है जो सीधे जुड़ने के लिए बहुत दूर हैं
यान संचालन (नेविगेशन)भूमि, जलयान अथवा वायुयान पर स्थित ग्राही को उसकी यथार्थ अवस्थिति बताता है
मौसम-अनुवीक्षणऊपर से बादलों, तूफानों और चक्रवातों पर दृष्टि रखता है जिससे समय रहते चेतावनी दी जा सके
आपदा प्रबंधनबाढ़, चक्रवात और भूकंप का मानचित्रण करता है जिससे राहत सही स्थान पर भेजी जा सके
वैज्ञानिक अनुसंधानवायुमंडल के ऊपर से पृथ्वी, सूर्य, ग्रहों, तारों तथा अन्य खगोलीय पिंडों का अध्ययन करता है

भारत के अपने अभियान इनमें से प्रत्येक को दर्शाते हैं। कार्टोसैट मानचित्रों को सुधारने, नगरों के नियोजन और प्राकृतिक आपदाओं के प्रबंधन हेतु पृथ्वी की उच्च गुणवत्ता की छवियाँ लेता है, और भुवन मंच इन छवियों से भू-रूप, मृदा, भूमि-उपयोग तथा वनस्पति दर्शाता है। एस्ट्रोसैट तारों एवं अन्य खगोलीय पिंडों का अवलोकन करता है। चंद्रयान–1, 2 एवं 3 चंद्रमा तक गए, आदित्य एल–1 सूर्य का अध्ययन करता है और मंगलयान मंगल तक गया। इसरो भारतीय विद्यार्थियों को आजादीसैट, इंसपायरसैट–1 और जुगनु जैसे छोटे उपग्रह बनाने एवं प्रमोचित करने की अनुमति भी देता है।

क्या आप जानते हैं? उपयोग की अवधि पूर्ण होने के पश्चात ये उपग्रह और उनके रॉकेटों के अवयव अंतरिक्ष में कचरा बन जाते हैं। छोटे टुकड़े पृथ्वी की ओर गिरते समय वायु के घर्षण से जल जाते हैं, परंतु बड़े टुकड़े भूमि पर आ गिरते हैं और कोई भी टुकड़ा कार्यरत उपग्रह से टकरा सकता है — इसीलिए विश्व के देश अब मिलजुल कर इस कचरे के निपटान पर कार्य कर रहे हैं।
प्र12.
समय के निम्नलिखित माप किन आवर्ती परिघटनाओं पर आधारित हैं — (i) दिवस (ii) मास (iii) वर्ष
उत्तर
समय का मापआधारभूत आवर्ती परिघटनाअवधि
(i) दिवसपृथ्वी का अपने अक्ष के परितः घूर्णन, जिससे सूर्य आकाश में पुनः अपनी उच्चतम स्थिति पर लौटता है — जिसे लघुतम छाया से ज्ञात किया जाता है24 घंटे (माध्य सौर दिन)
(ii) मासचंद्रमा की कलाओं का एक पूर्ण चक्र, जो पृथ्वी के परितः चंद्रमा के परिक्रमण से होता हैलगभग 29.5 दिन
(iii) वर्षसूर्य के परितः पृथ्वी का परिक्रमण, जिससे ऋतुओं का एक पूर्ण चक्र मिलता हैलगभग 365¼ दिन
ऐसा क्यों होता है: प्रत्येक मात्रक एक भिन्न पहिये का एक चक्कर है — पृथ्वी का घूर्णन, पृथ्वी के परितः चंद्रमा का परिक्रमण, और सूर्य के परितः पृथ्वी का परिक्रमण (चित्र 11.8)। चूँकि इनमें से कोई भी पहिया दूसरे के एक चक्कर में पूर्ण संख्या में चक्कर नहीं लगाता, अतः कालदर्शकों में समायोजन करना पड़ता है — वर्ष के लिए अधिवर्ष का दिन और चंद्र-सौर मासों के लिए अधिक मास।
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