कुतूहल अध्याय 11 खोजें, अभिकल्पित करें और चर्चा करें

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
बालचंद्र सदैव सूर्य की ओर उन्मुख होता है (चित्र 11.12)। जिस दिन आपको बालचंद्र दिखाई देता है उस दिन अपनी अँगुली सूर्य की ओर करके आकाश में सबसे छोटे पथ का अनुरेखण करते हुए चंद्रमा तक ले जाइए। ध्यान दीजिए कि आपकी अँगुली सदैव चंद्रमा के प्रकाशित भाग को पहले पार करती है जो स्पष्ट रूप से यह दर्शाता है कि हम चंद्रमा द्वारा परावर्तित सूर्य के प्रकाश को देख रहे हैं। बालचंद्र की नोकों को मिलाने वाली रेखा चंद्रमा का व्यास है।
उत्तर

कैसे करें। सूर्यास्त के ठीक बाद (वर्धमान बालचंद्र के लिए) ऐसे स्थान पर खड़े होइए जहाँ से पश्चिमी क्षितिज के पास सूर्य की आभा और बालचंद्र — दोनों दिखें। एक अँगुली सूर्य की ओर कीजिए और फिर उसे आकाश में सबसे छोटे पथ से चंद्रमा तक ले जाइए। सूर्य की ओर संकेत कीजिए, उसे सीधे देखिए मत।

आप क्या पाएँगे। हर बार आपकी अँगुली अदीप्त भाग से पहले बालचंद्र के चमकीले किनारे तक पहुँचती है। बालचंद्र का उभरा हुआ बाहरी किनारा सदैव सूर्य की ओर उन्मुख रहता है।

ऐसा क्यों होता है: यह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि चंद्रमा स्वयं के प्रकाश से नहीं, परावर्तित सूर्य-प्रकाश से चमकता है। चंद्रमा का जो आधा भाग दीप्त होता है वह सूर्य के सम्मुख वाला भाग है, अतः बिंब का जो पक्ष हमें चमकीला दिखता है वह आकाश में सूर्य की ओर वाला पक्ष ही होना चाहिए। यदि चंद्रमा स्वयं चमकता तो उसके चमकीले भाग के सदैव सूर्य की ओर संकेत करने का कोई कारण न होता।

नोकों को मिलाने वाली रेखा। बालचंद्र की दोनों नोकें वे बिंदु हैं जहाँ प्रकाश-अंधकार की सीमा चंद्रमा के किनारे से मिलती है। वह सीमा चंद्रमा के ध्रुवों से होकर जाने वाला एक बृहत् वृत्त है, अतः उसके दोनों दृश्य सिरे सदैव किनारे के विपरीत बिंदुओं पर पड़ते हैं — और वृत्त के विपरीत बिंदुओं को मिलाने वाली रेखा व्यास होती है। इसलिए नोकों के बीच की दूरी नापने का अर्थ है चंद्रमा की पूरी चौड़ाई नापना, चाहे बालचंद्र कितना ही पतला क्यों न हो।

यह कीजिए: दोनों नोकों पर एक सीधी छड़ी या तना हुआ धागा रखकर देखिए कि वह आपकी सूर्य-से-चंद्रमा वाली अँगुली के पथ से समकोण बनाता है। बालचंद्र सदैव सूर्य से दूर की ओर झुकता है, उसकी ओर कभी नहीं।
प्र2.
भारत के राष्ट्रीय कालदर्शक की अधिकांश तिथियों के संगत ग्रेगोरी कालदर्शक में आपको सदैव वही-वही दिनाँक प्राप्त हो सकती हैं। क्या आप बता सकते हैं कि कुछ निश्चित वर्षों में कौन से दिन भिन्न हो सकते हैं?
उत्तर

जो दिन भिन्न हो सकते हैं वे 29 फरवरी से 20 अप्रैल के बीच पड़ते हैं — अर्थात फाल्गुन के अंतिम तीन सप्ताह और संपूर्ण चैत्र। 1 वैशाख से 9 फाल्गुन तक की प्रत्येक तिथि प्रतिवर्ष उसी ग्रेगोरी दिनाँक पर आती है।

भारतीय राष्ट्रीय कालदर्शक का मासदिनसामान्य वर्ष में ग्रेगोरी दिनाँक
चैत्र30 (अधिवर्ष में 31)22 मार्च – 20 अप्रैल (अधिवर्ष में 21 मार्च – 20 अप्रैल)
वैशाख3121 अप्रैल – 21 मई
ज्येष्ठ3122 मई – 21 जून
आषाढ़3122 जून – 22 जुलाई
श्रावण3123 जुलाई – 22 अगस्त
भाद्रपद3123 अगस्त – 22 सितंबर
आश्विन3023 सितंबर – 22 अक्तूबर
कार्तिक3023 अक्तूबर – 21 नवंबर
अग्रहायण (मार्गशीर्ष)3022 नवंबर – 21 दिसंबर
पौष3022 दिसंबर – 20 जनवरी
माघ3021 जनवरी – 19 फरवरी
फाल्गुन3020 फरवरी – 21 मार्च (फरवरी 29 दिन की हो तो 20 फरवरी – 20 मार्च)
ऐसा क्यों होता है: भारतीय राष्ट्रीय कालदर्शक की लंबाई निश्चित 365 दिन है, अतः जब तक ग्रेगोरी वर्ष भी 365 दिन का है तब तक दोनों पूर्ण ताल में चलते हैं। एकमात्र व्यवधान ग्रेगोरी अधिवर्ष का दिन है। जब 29 फरवरी आती है तो वह 10 फाल्गुन बन जाती है, अतः 1 मार्च से 20 अप्रैल तक प्रत्येक ग्रेगोरी दिनाँक पर शक तिथि सामान्य से एक अधिक हो जाती है। फिर कालदर्शक चैत्र को 30 के स्थान पर 31 दिन देकर संतुलन बिठा देता है, जिससे नववर्ष 21 मार्च से आरंभ होता है और 1 वैशाख पुनः सदा की भाँति 21 अप्रैल पर आ जाता है।
स्वयं जाँचिए: स्वतंत्रता दिवस सदैव 24 श्रावण और गणतंत्र दिवस सदैव 6 माघ होता है — अधिवर्ष हो या न हो, क्योंकि दोनों वर्ष के उस भाग में पड़ते हैं जो कभी नहीं बदलता। जाँचिए — श्रावण 23 जुलाई से आरंभ होता है, अतः 15 अगस्त उसका 24वाँ दिन हुआ।
प्र3.
भारत के विभिन्न राज्य नववर्ष का उत्सव अपनी-अपनी स्थानीय संस्कृति के अनुसार मनाते हैं। भारत के किन्हीं 10 राज्यों में मनाए जाने वाले नववर्ष उत्सवों के नाम ज्ञात कीजिए। यह भी पता लगाइए कि यह चंद्र कालदर्शक आधारित हैं सौर कालदर्शक आधारित हैं अथवा चंद्र-सौर कालदर्शक आधारित हैं।
उत्तर

कैसे करें। भिन्न-भिन्न राज्यों के परिवारजनों और सहपाठियों से पूछिए, फिर प्रत्येक पर्व का दिनाँक तीन-चार वर्षों तक ग्रेगोरी कालदर्शक में देखिए। यही परीक्षण कालदर्शक का प्रकार बता देगा — जो दिनाँक लगभग नहीं हिलता वह सौर पर्व है; जो एक माह तक इधर-उधर डोलता है वह चंद्र-सौर; और जो निरंतर पहले-पहले खिसकता हुआ सभी ऋतुओं से गुजर जाए वह शुद्ध चंद्र पर्व है।

नमूना उत्तर:

राज्यनववर्ष का पर्वआधारित कालदर्शककब पड़ता है
महाराष्ट्रगुड़ी पड़वाचंद्र-सौरचैत्र की अमावस्या के अगले दिन (मार्च–अप्रैल)
कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगानाउगादिचंद्र-सौरगुड़ी पड़वा के ही दिन
गुजरातबेस्तु वरसचंद्र-सौरदीपावली के अगले दिन, कार्तिक में (अक्तूबर–नवंबर)
जम्मू और कश्मीरनवरेहचंद्र-सौरचैत्र का प्रथम दिन (मार्च–अप्रैल)
मणिपुरचेइराओबा (सजिबु नोंगमा पानबा)चंद्र-सौरसजिबु मास का प्रथम दिन (अप्रैल)
पंजाबवैशाखीसौर (नक्षत्र)प्रायः प्रतिवर्ष 13 अथवा 14 अप्रैल
पश्चिम बंगालपोयला बैसाखसौर (नक्षत्र)14 अथवा 15 अप्रैल
असमबोहाग बिहू (रोंगाली बिहू)सौर (नक्षत्र)14 अथवा 15 अप्रैल
तमिलनाडुपुथांडुसौर (नक्षत्र)14 अप्रैल
केरलविषुसौर (नक्षत्र)14 अथवा 15 अप्रैल
ओडिशापणा संक्रांति (महा विषुव संक्रांति)सौर (नक्षत्र)14 अप्रैल
ऐसा क्यों होता है: तालिका का यह प्रतिरूप संयोग नहीं है। अप्रैल के मध्य में पड़ने वाले सभी नववर्ष एक ही खगोलीय घटना को चिह्नित करते हैं — सौर नक्षत्र कालदर्शक में सूर्य का मेष तारा-समूह में प्रवेश — इसीलिए पंजाब से केरल तक वे 14 अप्रैल के आस-पास एकत्र हो जाते हैं। इसके विपरीत चंद्र-सौर नववर्ष किसी नामित मास की किसी चंद्र-कला से बँधे हैं, अतः उनके ग्रेगोरी दिनाँक बदलते रहते हैं — परंतु केवल एक माह के दायरे में, क्योंकि अधिक मास उन्हें सुधारता रहता है।
प्र4.
अपने परिवारजनों, शिक्षकों अथवा अंतर्जाल (इंटरनेट) की सहायता से पिछले पाँच वर्षों के ग्रेगोरी कालदर्शक एकत्रित कीजिए। प्रत्येक वर्ष के लिए वह दिनाँक देखिए जिन पर उस वर्ष ईद-उल-फितर तथा दीपावली उत्सव मनाए गए थे। एक तालिका बनाकर वर्ष अनुसार उन्हें उसमें अभिलेखित कीजिए। क्या आपके ध्यान में यह बात आई कि प्रत्येक आगामी वर्ष में ईद-उल-फितर 11 दिन पहले आ जाता है? क्या दीपावली भी इसी नियत प्रतिरूप का अनुसरण करती है अथवा उसमें कुछ आकस्मिक परिवर्तन होते हैं? अपने संचित्र (चार्ट) के आधार पर अनुमान लगाने का प्रयास कीजिए कि किस वर्ष में अंतर्वेशी माह (अधिक-मास) को सम्मिलित किया गया है।
उत्तर

नमूना उत्तर (आप जो कालदर्शक एकत्र करें उनसे अपनी तालिका भरकर मिलान कीजिए — किसी पर्व का दिनाँक क्षेत्र के अनुसार एक दिन आगे-पीछे हो सकता है):

वर्षईद-उल-फितरपिछले वर्ष से अंतरदीपावली (लक्ष्मी पूजा)पिछले वर्ष से अंतर
202114 मई4 नवंबर
20223 मई11 दिन पहले24 अक्तूबर11 दिन पहले
202322 अप्रैल11 दिन पहले12 नवंबर19 दिन बाद — एक छलाँग
202411 अप्रैल11 दिन पहले1 नवंबर11 दिन पहले
202531 मार्च11 दिन पहले20 अक्तूबर12 दिन पहले

ईद-उल-फितर प्रतिवर्ष लगभग ठीक 11 दिन पीछे खिसकती है, एक भी अपवाद के बिना। परंतु चंद्र कालदर्शक पर उसकी तिथि बिल्कुल नहीं बदलती — वह सदैव 1 शव्वाल, अर्थात रमजान के अंत में बालचंद्र देखने के अगले दिन ही रहती है।

दीपावली भी प्रायः लगभग 11 दिन पीछे खिसकती है, परंतु 2022 और 2023 के बीच वह 19 दिन आगे छलाँग गई। यही छलाँग अधिक मास की पहचान है — 2023 में एक अतिरिक्त चंद्र मास (अधिक श्रावण) जोड़ा गया था, जिसने उस वर्ष के बाद के सभी पर्वों को लगभग एक माह आगे धकेल दिया।

संशोधन के बिना अपेक्षित अंतर = 11 दिन पहले
2022 → 2023 में वास्तविक अंतर = 19 दिन बाद
अंतर = 19 + 11 = 30 दिन ≈ एक अतिरिक्त चंद्र मास
ऐसा क्यों होता है: ईद-उल-फितर शुद्ध चंद्र कालदर्शक का पर्व है, जो ऋतुओं के साथ ताल बिठाने का प्रयास ही नहीं करता — अतः वह प्रतिवर्ष 11 दिन खिसकता है और किसी भी ग्रेगोरी माह में पड़ सकता है। दीपावली चंद्र-सौर कालदर्शक का पर्व है, जिसमें वही खिसकाव होता है परंतु प्रत्येक दो-तीन वर्ष में अंतर्वेशी माह उसे रद्द कर देता है। इसीलिए दीपावली शरद ऋतु कभी नहीं छोड़ती जबकि ईद-उल-फितर पूरे वर्ष का चक्कर लगा लेती है।
संकेत: लगभग −11 दिन का अंतर सामान्य है; लगभग +19 दिन का अंतर अधिक मास वाले वर्ष को चिह्नित करता है। अपनी तालिका में होली अथवा दशहरा का एक स्तंभ और जोड़िए — उसी वर्ष में ठीक वैसी ही छलाँग मिलेगी।
प्र5.
प्रत्येक दिन प्रातः काल अपने विद्यालय जाते हुए मार्ग में ध्यान दीजिए कि सूर्य किस दिशा में उदित होता है। एक स्थान निश्चित कर लीजिए और प्रतिदिन वहीं से पूर्व दिशा की ओर देखिए और किसी खंभे अथवा भवन को संदर्भ बिंदु मान कर इसके सापेक्ष क्षितिज के ऊपर उठते सूर्य को देखिए। अपनी अभ्यास पुस्तिका में पूर्वी क्षितिज का रेखाचित्र बनाइए। अगले एक वर्ष तक प्रत्येक मास के आरंभ में उसी स्थान पर खड़े हो जाइए और अपने रेखाचित्र पर सूर्य की स्थिति अंकित कीजिए। वर्ष के अंत में अपने रेखाचित्र का विश्लेषण कीजिए। क्या आप यह पाते हैं कि सूर्योदय की स्थिति एक विशेष दिशा में स्थानांतरित होती है? क्या आप इस स्थानांतरण को हमारे पूर्वजों द्वारा देखे गए उत्तरायण और दक्षिणायन से जोड़ पाते हैं?
उत्तर

अच्छा प्रेक्षण कैसे करें। सब कुछ इस पर निर्भर है कि आप हर बार ठीक उसी स्थान पर खड़े हों, अतः भूमि पर कोई निश्चित चिह्न चुन लीजिए — कोई देहरी या कोई विशेष पत्थर — और पूर्वी क्षितिज का रेखाचित्र एक बार, ध्यानपूर्वक, वृक्षों, खंभों तथा छतों सहित बना लीजिए। उसके बाद प्रत्येक मास केवल सूर्य के लिए एक छोटा वृत्त और मास का नाम जोड़ते जाइए।

आप क्या पाएँगे। सूर्योदय का स्थान स्थिर नहीं रहता; वह क्षितिज पर लगातार खिसकता है और वर्ष में दो बार मुड़ता है।

वर्ष का समयसूर्य कहाँ उदित होता हैगति का नाम
लगभग 21 दिसंबर (शीत अयनांत)पूर्व से सर्वाधिक दक्षिण मेंमोड़ का बिंदु — उत्तरायण आरंभ
जनवरी से मार्चमास-दर-मास उत्तर की ओर सरकता हुआउत्तरायण
लगभग 21 मार्च (वसंत विषुव)ठीक पूर्व में — और सूर्य ठीक पश्चिम में अस्त होता हैउत्तरायण जारी
लगभग 21 जून (ग्रीष्म अयनांत)पूर्व से सर्वाधिक उत्तर मेंमोड़ का बिंदु — दक्षिणायन आरंभ
जुलाई से सितंबरदक्षिण की ओर सरकता हुआदक्षिणायन
लगभग 23 सितंबर (शरद विषुव)पुनः ठीक पूर्व मेंदक्षिणायन जारी

हाँ — यह ठीक वही उत्तरायण और दक्षिणायन है जिसका उल्लेख ‘हमारी वैज्ञानिक धरोहर’ बॉक्स में है। तैत्तिरीय संहिता इसी प्रतिरूप को अभिलिखित करती है — “इस प्रकार सूर्य छह माह दक्षिण की ओर और छह माह उत्तर की ओर गति करता है।”

ऐसा क्यों होता है: पृथ्वी का अक्ष झुका हुआ है, अतः सूर्य के परितः पृथ्वी के परिक्रमण के साथ-साथ वह बिंदु भी उत्तर-दक्षिण खिसकता रहता है जहाँ भोर में सूर्य की किरणें क्षितिज से मिलती हैं। भारत में यह झूला भारत के दक्षिणी छोर पर ठीक पूर्व से लगभग 24° और दिल्ली के आस-पास लगभग 27° दोनों ओर तक जाता है — क्षितिज पर इतना बड़ा अंतर कि प्राचीन प्रेक्षक बिना किसी उपकरण के, केवल स्थिर भू-चिह्नों के सापेक्ष उसे देख लेते थे और उसी से कालदर्शक बना लेते थे।
क्या आप जानते हैं? नक्षत्र वर्ष सायन वर्ष से 20 मिनट अधिक होने के कारण नक्षत्र कालदर्शक से बँधे पर्व उन अयनांतों से धीरे-धीरे खिसकते जाते हैं जिन्हें वे कभी चिह्नित करते थे। मकर संक्रांति अब प्रत्येक 71 वर्ष में एक दिन आगे बढ़ जाती है — इसीलिए वह आज जनवरी के मध्य में पड़ती है यद्यपि कभी वह दिसंबर के अयनांत से जुड़ी थी।
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