अधिकांश भारतीय पर्व प्रत्येक वर्ष भिन्न-भिन्न दिनाँक पर क्यों पड़ते हैं?
उत्तर
क्योंकि अधिकांश भारतीय पर्व चंद्रमा की कला से निर्धारित होते हैं, जबकि जो दिनाँक हम बताते हैं वे ग्रेगोरी सौर कालदर्शक के होते हैं — और चंद्र वर्ष तथा सौर वर्ष की अवधि समान नहीं है।
12 चंद्र मास = 12 × 29.5 ≈ 354 दिन 1 सौर वर्ष ≈ 365 दिन प्रतिवर्ष कमी = 365 − 354 = लगभग 11 दिन
इसके आगे क्या होगा, यह इस पर निर्भर है कि पर्व किस कालदर्शक का अनुसरण करता है।
कालदर्शक का प्रकार
उदाहरण
ग्रेगोरी दिनाँक का व्यवहार
शुद्ध चंद्र
ईद-उल-फितर, जो रमजान के अंत में बालचंद्र देखने के पश्चात मनाई जाती है
प्रतिवर्ष लगभग 11 दिन पहले खिसकती है और सभी ऋतुओं से होकर गुजरती है — किसी भी ग्रेगोरी माह में पड़ सकती है
चंद्र-सौर
दीपावली (कार्तिक की अमावस्या), होली (फाल्गुन की पूर्णिमा), बुद्ध पूर्णिमा (वैशाख की पूर्णिमा), दशहरा (आश्विन का दसवाँ दिन)
लगभग 11 दिन पहले खिसकती है, परंतु प्रत्येक 2–3 वर्ष में अधिक मास उसे एक माह आगे धकेल देता है। अतः वह लगभग एक माह के दायरे में डोलती रहती है, अपनी ऋतु कभी नहीं छोड़ती
चंद्र-सौर पर्व का दिनाँक डोलता तो है पर बहकता नहीं — प्रतिवर्ष की 11 दिन की कमी दो-तीन वर्ष में जोड़े गए एक अतिरिक्त मास से संतुलित हो जाती है।
ऐसा क्यों होता है: चंद्रमा से बँधे पर्व की चंद्र-तिथि निश्चित होती है, सौर दिनाँक नहीं। चूँकि 12 चंद्र मास सौर वर्ष से 11 दिन कम पड़ते हैं, अतः वह चंद्र-तिथि प्रत्येक बार ग्रेगोरी कालदर्शक में 11 दिन पहले आ जाती है। अधिक मास ठीक वही संशोधन है जो इस खिसकाव को रोकता है — इसीलिए दीपावली सदैव शरद ऋतु में रहती है जबकि ईद-उल-फितर किसी भी ऋतु में पड़ सकती है।
क्या आप जानते हैं? ये दिनाँक सूर्योदय के समय की यथार्थ चंद्र-कला से तय होते हैं, और पूर्वी भारत में सूर्योदय पहले तथा पश्चिमी भारत में बाद में होता है, अतः एक ही वर्ष में देश के भिन्न भागों में कोई पर्व एक दिन आगे-पीछे भी पड़ सकता है। एकरूपता बनाए रखने हेतु खगोल विज्ञान केंद्र प्रतिवर्ष राष्ट्रीय पंचांग प्रकाशित करता है।
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