कुतूहल अध्याय 12 क्रियाकलाप 12.3

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
शोधकर्ताओं ने यह देखने के लिए एक अध्ययन किया कि तालाबों में मछलियाँ अपने आस-पास के पादपों में बीज उत्पादन को कैसे प्रभावित करती हैं। उन्होंने दो तालाबों का अवलोकन किया— तालाब ‘क’ जिसमें मछलियाँ और उनके आस-पास बड़ी संख्या में पुष्पीय पादप थे, तालाब ‘ख’ जिसमें मछलियाँ नहीं थीं और आस-पास पुष्पीय पादप भी कम थे (चित्र 12.3)। इन अवलोकनों के किसी एक कारण पर विचार कीजिए।
उत्तर

एक संभावित कारण — मछलियाँ पादपों को सीधे प्रभावित कर ही नहीं रहीं; वे उन कीटों को प्रभावित कर रही हैं जो पादपों का परागण करते हैं

कड़ियाँ देखिए। मछलियाँ व्याधपतंग के लार्वा खाती हैं, जो जल में रहते हैं। वयस्क व्याधपतंग मक्खियाँ, मधुमक्खियाँ और तितलियाँ खाते हैं, जो तालाब के ऊपर वायु में उड़ते हैं और आस-पास के पुष्पों पर जाते हैं। अत:—

तालाब ‘क’: मछलियाँ हैं → व्याधपतंग के लार्वा कम → व्याधपतंग कम → मधुमक्खियाँ, मक्खियाँ और तितलियाँ अधिक → अधिक परागण → अधिक बीज
तालाब ‘ख’: मछलियाँ नहीं → लार्वा बच जाते हैं → व्याधपतंग अधिक → मधुमक्खियाँ और तितलियाँ कम → कम परागण → कम बीज

इसीलिए तालाब ‘क’ के आस-पास पुष्पीय पादप बड़ी संख्या में हैं और तालाब ‘ख’ के आस-पास कम।

संकेत: चित्र 12.4 यही दर्शाता है। लाल तीर प्रत्यक्ष प्रभाव हैं (मछली का लार्वा पर, व्याधपतंग का मधुमक्खी पर); हरे तीर अप्रत्यक्ष प्रभाव हैं (मछली का मधुमक्खी पर, मछली का पादप पर)। अप्रत्यक्ष प्रभाव किसी तीसरे जीव के माध्यम से पहुँचता है।
प्र2.
दोनों तालाबों में व्याधपतंग, मधुमक्खियों और तितलियों की संख्या की तुलना कीजिए। क्या आपको व्याधपतंग और मधुमक्खियों या तितलियों की संख्या के बीच कोई संबंध दिखाई देता है? हमने देखा कि तालाब ‘क’ (जिसमें मछलियाँ थीं) में तालाब ‘ख’ की तुलना में व्याधपतंग की संख्या कम थी। ऐसा क्यों था?
उत्तर

हाँ — संबंध विपरीत है। जहाँ व्याधपतंग अधिक हैं वहाँ मधुमक्खियाँ और तितलियाँ कम हैं; जहाँ व्याधपतंग कम हैं वहाँ मधुमक्खियाँ और तितलियाँ अधिक हैं।

 तालाब ‘क’ (मछलियों सहित)तालाब ‘ख’ (मछलियों रहित)
व्याधपतंगकमअधिक
मधुमक्खियाँ, मक्खियाँ, तितलियाँअधिककम
आस-पास के पुष्पों से बने बीजअधिककम

तालाब ‘क’ में व्याधपतंग कम इसलिए हैं क्योंकि मछलियाँ व्याधपतंग के लार्वा खाती हैं। व्याधपतंग अपना आरंभिक जीवन जल में लार्वा के रूप में बिताता है, और वहीं मछली उस तक पहुँच सकती है। कम लार्वा बचते हैं, इसलिए कम वयस्क व्याधपतंग वायु में निकलते हैं।

ऐसा क्यों होता है: व्याधपतंग मधुमक्खियों और तितलियों का परभक्षी है। परभक्षी हटा दीजिए तो उसका शिकार बढ़ जाता है — इसलिए तालाब ‘क’ में मधुमक्खियाँ, मक्खियाँ और तितलियाँ अधिक हो जाती हैं। यही नियम आप जिज्ञासा को बनाए रखें के प्रश्न 4 में फिर लगाएँगे, जहाँ आहार श्रृंखला से मेंढक लुप्त हो जाते हैं।
प्र3.
यह अध्ययन क्या दर्शाता है? तालाब में मछलियों की समष्टि आस-पास के पादपों में बीज उत्पादन को कैसे प्रभावित करती है?
उत्तर

यह दर्शाता है कि समुदाय के जीव तब भी जुड़े होते हैं जब वे कभी मिलते तक नहीं — और एक समष्टि का परिवर्तन समुदाय से होकर बिलकुल भिन्न प्रकार के जीव तक पहुँच सकता है।

मछली कभी किसी पुष्प को छूती नहीं। फिर भी तालाब में मछलियों की संख्या तय करती है कि पुष्प कितने बीज बनाएँगे — तीन चरणों की एक कड़ी से—

मछलियाँ अधिक → व्याधपतंग के लार्वा कम
→ वयस्क व्याधपतंग कम
मधुमक्खियाँ, मक्खियाँ और तितलियाँ अधिक
→ एक पुष्प से दूसरे पुष्प तक अधिक पराग
अधिक बीज उत्पन्न

अध्ययन यह भी दर्शाता है कि जैविक घटक (मछली, व्याधपतंग, परागणकारी, पादप) और अजैविक घटक (तापमान, जल, पोषक तत्व) परस्पर क्रिया करते हैं और एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। अत: खंड के शीर्षक का उत्तर — क्या किसी समुदाय में प्रत्येक जीव महत्त्वपूर्ण होता है? — हाँ है: प्रत्येक जीव एक कड़ी है जिस पर कुछ और निर्भर है।

क्या आप जानते हैं? जो प्रभाव किसी दूसरे जीव से होकर पहुँचे, जैसे मछली का पुष्पों पर प्रभाव, उसे अप्रत्यक्ष प्रभाव कहते हैं। अप्रत्यक्ष प्रभाव प्राय: प्रत्यक्ष प्रभावों से भी अधिक प्रबल होते हैं, और यही कारण है कि एक प्रजाति हटाने पर पारितंत्र ऐसे बदल जाता है जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी।
प्र4.
इसी प्रकार क्या मनुष्यों द्वारा अत्यधिक मछली पकड़ने से इस संतुलन में परिवर्तन हो सकता है? आपके विचार से यह पर्यावास के जैविक और अजैविक घटकों को कैसे प्रभावित कर सकता है?
उत्तर

हाँ। अत्यधिक मछली पकड़ने से मछलियाँ हट जाती हैं, अत: चित्र 12.4 की पूरी कड़ी उल्टी दिशा में चलने लगती है।

जैविक घटकों पर प्रभाव—

मछलियाँ कम → व्याधपतंग के अधिक लार्वा बचते हैं → अधिक वयस्क व्याधपतंग
→ मधुमक्खियाँ, मक्खियाँ और तितलियाँ कम
→ कम परागण → आस-पास के पादपों में कम बीज और फल
→ अगली ऋतु में कम पादप → अन्य जलीय जीवों के लिए कम भोजन और आश्रय

मछलियाँ छोटे जलीय जंतुओं और शैवाल की उपभोक्ता भी हैं। मछलियों के हटते ही मच्छरों के लार्वा तथा अन्य कीट अनियंत्रित रूप से बढ़ सकते हैं और शैवाल सतह पर फैल सकते हैं।

अजैविक घटकों पर प्रभाव— शैवाल की मोटी परत नीचे के पादपों तक सूर्य का प्रकाश नहीं पहुँचने देती। वे पादप मर जाते हैं, और मरते पादपों का अर्थ है जल में ऑक्सीजन का कम उत्पादन। मृत पदार्थों के अपघटन में और ऑक्सीजन खर्च होती है। इस प्रकार जल स्वयं — एक अजैविक घटक — अधिक गंदला और ऑक्सीजन में कम हो जाता है, और पूरा पर्यावास रहने के लिए कठिन हो जाता है।

ऐसा क्यों होता है: पारितंत्र का संतुलन गतिशील है, स्थिर नहीं। वह जीवों की परस्पर क्रियाओं से बना रहता है, किसी एक जीव से नहीं। एक पूरी समष्टि को एक साथ हटाने से अनेक परस्पर क्रियाएँ एक साथ हट जाती हैं और पारितंत्र एक नई तथा प्राय: निर्धन अवस्था में बैठ जाता है।
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