कुतूहल अध्याय 12 जिज्ञासा को बनाए रखें

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
दिए गए आरेख (चित्र 12.19) को देखिए और गलत कथन का चयन कीजिए। (i) समुदाय समष्टि से बड़ा होता है। (ii) समुदाय एक पारितंत्र से छोटा होता है। (iii) पारितंत्र किसी समुदाय का भाग होता है।
उत्तर

गलत कथन है (iii) पारितंत्र किसी समुदाय का भाग होता है।

वास्तव में इसका उल्टा सही है। चित्र 12.19 में तीन वृत्त एक के भीतर एक दिखाए गए हैं—

समष्टि समुदाय पारितंत्र
  • समष्टि एक निश्चित समय में एक पर्यावास में एक ही प्रकार के जीवों का समूह है — जैसे किसी खेत की सारी घास।
  • समुदाय उस पर्यावास को साझा करने वाली सभी विभिन्न समष्टियाँ हैं — घास, टिड्डे, मेंढक, सूक्ष्मजीव। अत: समुदाय समष्टि से बड़ा होता है: कथन (i) सही है।
  • पारितंत्र वही समुदाय है साथ में वे अजैविक घटक जिनसे वह परस्पर क्रिया करता है — मृदा, जल, सूर्य का प्रकाश और तापमान। अत: समुदाय पारितंत्र से छोटा होता है: कथन (ii) सही है।
ऐसा क्यों होता है: बाहर की ओर हर चरण कुछ जोड़ता है। समष्टि से समुदाय तक जाते समय अन्य प्रकार के जीव जुड़ते हैं; समुदाय से पारितंत्र तक जाते समय निर्जीव परिवेश जुड़ता है। इसलिए समुदाय सदा पारितंत्र के भीतर रहता है, वह उसे कभी अपने भीतर नहीं ले सकता।
प्र2.
समष्टि किसी समुदाय का भाग होती है। यदि सभी अपघटक, अकस्मात एक वन पारितंत्र से लुप्त हो जाएँ तो आपके विचार से क्या परिवर्तन होंगे? व्याख्या कीजिए कि अपघटक आवश्यक क्यों होते हैं।
उत्तर

वन पहले मृत पदार्थों से भर जाएगा और फिर धीरे-धीरे भूखा मरने लगेगा।

अपघटक लुप्त → गिरी पत्तियाँ, गिरे वृक्ष, मल और मृत जंतु विघटित होना बंद
→ वन की भूमि पर कूड़ा एकत्र होता जाएगा
→ पोषक तत्व मृत शरीरों में ही बंद रहेंगे, मृदा तक कभी नहीं पहुँचेंगे
→ मृदा अपने पोषक तत्व और ह्यूमस खो देगी; वह कठोर होकर अपरदित होगी
उत्पादकों की वृद्धि रुक जाएगी
→ शाकाहारियों के लिए कम भोजन → कम माँसाहारी → पूरा आहार जाल पतला पड़ जाएगा

अपघटक आवश्यक क्यों हैं: अपघटक ही एकमात्र ऐसे जीव हैं जो पारितंत्र में पदार्थ को पीछे की ओर ले जाते हैं। आहार जाल का हर दूसरा तीर ऊपर की ओर है — घास से टिड्डा, टिड्डे से मेंढक। केवल अपघटक पदार्थ को श्रृंखला के आरंभ तक लौटाते हैं। कवक और जीवाणु जैसे सूक्ष्मजीव मृत पादपों और जंतुओं के जटिल पदार्थों को सरल पदार्थों में विघटित करते हैं और इस प्रक्रिया से मृदा में महत्त्वपूर्ण पोषक तत्व वापस आ जाते हैं। पादप मृदा में उगते हैं और मृदा के कई पोषक तत्व अपघटन से ही आते हैं।

ऐसा क्यों होता है: किसी पारितंत्र में पोषक तत्वों का भंडार सीमित होता है। यदि उनका पुनर्चक्रण न हो तो उनकी पूर्ति नहीं हो सकती, जबकि ऊर्जा की पूर्ति सूर्य से बाहर से होती रहती है। इसलिए अपघटकों का लुप्त होना केवल गंदगी की समस्या नहीं है; यह उत्पादकों की, और इसलिए उनके ऊपर की हर चीज की, पोषक-आपूर्ति काट देता है।
प्र3.
तमिलनाडु के कुड्डालोर जिले के सेल्वम ने बताया कि उनका गाँव मैंग्रोव वनों की उपस्थिति के कारण 2004 की सुनामी से आस-पास के गाँवों की तुलना में कम प्रभावित हुआ था। इससे सरिता, शबनम और शिजो को आश्चर्य हुआ। वे सोच रही थीं कि क्या मैंग्रोव वन गाँव की सुरक्षा कर रहे थे। क्या आप इसे समझने में उनकी सहायता कर सकते हैं?
उत्तर

सेल्वम ठीक कह रहे हैं — मैंग्रोव समुद्र और गाँव के बीच एक जीवित दीवार का काम कर रहे थे।

मैंग्रोव वन तट के उथले जल में खड़ा होता है। उसके वृक्ष घनी, मेहराबदार अवस्तंभ जड़ों पर टिके रहते हैं और हजारों छोटी जड़ें कीचड़ से बाहर निकली रहती हैं। आती हुई लहर को इन सबके बीच से होकर जाना पड़ता है। हर जड़ लहर की थोड़ी-थोड़ी ऊर्जा ले लेती है, इसलिए वन के पीछे बसे गाँव तक पहुँचते-पहुँचते जल धीमा और नीचा हो जाता है।

लहर की ऊर्जा हजारों अवस्तंभ जड़ों से टकराती है → ऊर्जा बिखरकर अवशोषित
→ पट्टी के पीछे जल धीमा और उथला पहुँचता है
→ घरों और खेतों को कम क्षति
जड़ें कीचड़ को थामे रहती हैं → तट बहता नहीं

अध्याय सुंदरबन के विषय में यही कहता है — वे चक्रवात और बाढ़ के समय तेज वायु और लहरों को मंद करके हमारी रक्षा करते हैं। जिन गाँवों ने ईंधन या तालाबों के लिए अपने मैंग्रोव साफ कर दिए थे, उनके पास उसी लहर को धीमा करने वाला कुछ नहीं था, इसलिए उन्हें अधिक क्षति हुई।

ऐसा क्यों होता है: यह पारितंत्र से मिला एक लाभ है — वह कार्य जो पारितंत्र हमारे लिए करता है और अन्यथा हमें बनाना पड़ता। कंक्रीट की दीवार यह काम आंशिक रूप से कर सकती है, परंतु मैंग्रोव मृदा को भी थामता है, कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करके ऑक्सीजन निर्मुक्त करता है, और उन मछलियों तथा केकड़ों को आश्रय देता है जिन्हें गाँव खाता है। इसी महत्त्व के कारण संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) ने 1987 में सुंदरबन को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया।
प्र4.
इस आहार श्रृंखला को देखें— घास → टिड्डा → मेंढक → साँप। यदि इस पारितंत्र से मेंढक लुप्त हो जाएँ तो टिड्डों और साँपों की समष्टि पर क्या प्रभाव पड़ेगा और क्यों?
उत्तर

टिड्डों की संख्या बढ़ेगी और साँपों की घटेगी। मेंढक ही वह कड़ी है जो दोनों को जोड़ती है, और उसके हटते ही श्रृंखला बीच से कट जाती है।

घास टिड्डा ▲ बढ़ता है मेंढक साँप ▼ घटता है टूट के नीचे: परभक्षी हट गया। टूट के ऊपर: भोजन हट गया। टिड्डे बढ़ने पर घास भी अधिक चरी जाएगी।
एक कड़ी हटने पर उसके नीचे और ऊपर के स्तर विपरीत दिशाओं में बदलते हैं।

टिड्डे बढ़ेंगे क्योंकि मेंढक उनका परभक्षी था। उन्हें खाने वाला कोई नहीं बचा, इसलिए अधिक टिड्डे जीवित रहकर जनन करेंगे और उनकी संख्या चढ़ेगी। फिर वे कहीं अधिक घास खाएँगे, अत: घास पर भी संकट आएगा — प्रभाव नीचे की ओर भी जाता है।

साँप घटेंगे क्योंकि मेंढक उनका भोजन था। साँप को जो ऊर्जा मेंढक के रास्ते मिलती थी, वह रास्ता अब बंद है। यदि पारितंत्र में चूहे या पक्षी जैसे अन्य शिकार हों तो कुछ साँप उनकी ओर मुड़ सकते हैं; जहाँ वे नहीं हैं, वहाँ साँपों की समष्टि गिर जाएगी।

ऐसा क्यों होता है: श्रृंखला का प्रत्येक जीव एक साथ दो भूमिकाएँ निभाता है — वह अपने ऊपर वाले स्तर का भोजन है और अपने नीचे वाले स्तर पर नियंत्रण है। उसे हटाइए तो दोनों भूमिकाएँ एक साथ चली जाती हैं, इसीलिए प्रभाव केवल एक दिशा में नहीं, दोनों दिशाओं में चलता है।
प्र5.
एक विद्यालय के उद्यान में विद्यार्थियों ने पिछले मौसम में अपेक्षाकृत कम तितलियाँ देखीं। इसके संभावित कारण क्या हो सकते हैं? परिसर में अधिक तितलियाँ लाने के लिए विद्यार्थी क्या कदम उठा सकते हैं?
उत्तर

तितली को दो बिलकुल भिन्न वस्तुएँ चाहिए — वयस्क के लिए मकरंद वाले पादप और इल्ली (कैटरपिलर) के लिए पोषक पादप। तितलियाँ कम होने का अर्थ प्राय: यह है कि इनमें से कोई एक समाप्त हो गया है।

संभावित कारण

  • पुष्पीय पादप हटा दिए गए, अथवा उद्यान में ऐसे पादप लगाए गए जिनमें मकरंद कम है।
  • किनारों की झाड़ियाँ और खरपतवार साफ कर दिए गए — वे ही इल्लियों के पोषक पादप थे।
  • उद्यान में या पास के खेत में पीड़कनाशक का छिड़काव हुआ; वह पीड़कों के साथ इल्लियों को भी मार देता है।
  • घास और बाड़ें ठीक उसी समय काटी गईं जब इल्लियाँ उन पर पल रही थीं।
  • जल और नम खुली मृदा नहीं, जहाँ से तितलियाँ जल लेती हैं।
  • अत्यधिक धूल, धुआँ अथवा बहुत शुष्क मौसम।

विद्यार्थी क्या कदम उठा सकते हैं

कदमयह क्यों काम करता है
मकरंद वाले पादप लगाइए — गेंदा, ज़ीनिया, इक्सोरा, पेंटास, तुलसीवयस्क तितलियों को भोजन देकर उन्हें बुलाते हैं
पोषक पादप लगाइए — करी पत्ता और नींबू, आक (मदार), सौंफ, कैसियाइल्लियों को वही पादप देते हैं जिसे वे खा सकती हैं, जिससे तितलियाँ परिसर में केवल आती नहीं, जनन भी करती हैं
उद्यान में पीड़कनाशक का छिड़काव बंद कीजिएपीड़कनाशक इल्लियों और प्यूपा को मार देता है, और अगली ऋतु की तितलियाँ वहीं से आती हैं
एक कोना बिना काटे और बिना साफ किए छोड़िएवहाँ के खरपतवार पोषक पादप हैं; गिरी पत्तियाँ शुष्क महीनों में प्यूपा को आश्रय देती हैं
गीली रेत या मिट्टी सहित उथले पात्र में जल रखिएतितलियाँ नम मृदा से जल और खनिज लेती हैं
धूप वाले, वायु से बचे स्थान पर लगाइए और वर्ष भर कुछ न कुछ खिलता रहेतितलियाँ धूप में सक्रिय रहती हैं और उन्हें केवल एक महीने नहीं, पूरे वर्ष मकरंद चाहिए
ऐसा क्यों होता है: तितलियाँ परागणकारी हैं, केवल सजावट नहीं। यहाँ तर्क वही है जो क्रियाकलाप 12.3 में था — एक वस्तु बदलिए (पादप अथवा छिड़काव) और उस पर निर्भर कीट की समष्टि उसी के साथ बदल जाएगी।
प्र6.
ऐसा पारितंत्र क्यों संभव नहीं है जिसमें केवल उत्पादक हों और कोई उपभोक्ता या अपघटक न हों?
उत्तर

क्योंकि ऐसे तंत्र में ऊर्जा तो प्रवेश कर सकेगी, परंतु पदार्थ कभी गति नहीं करेगा — और पारितंत्र को दोनों चाहिए।

देखिए क्या होगा। उत्पादक प्रकाश संश्लेषण करके बढ़ेंगे। ऐसा करने के लिए वे मृदा से पोषक तत्व लेंगे। अंतत: प्रत्येक पादप मरेगा। अब—

  • कोई अपघटक नहीं है, इसलिए मृत पादप विघटित नहीं होंगे। उन्होंने मृदा से जो पोषक तत्व लिए थे वे सदा के लिए उन्हीं में बंद रह जाएँगे;
  • अत: मृदा के पोषक तत्व समाप्त हो जाएँगे और पादपों की अगली पीढ़ी उग ही नहीं पाएगी;
  • मृत पादप पदार्थ ऊपर ढेर होता जाएगा और किसी नए अंकुर के लिए प्रकाश तथा स्थान दोनों रोक देगा।

उपभोक्ता भी महत्त्वपूर्ण हैं, यद्यपि दूसरे ढंग से। अनेक पादप अपने पुष्पों के परागण और बीजों के प्रकीर्णन के लिए जंतुओं पर निर्भर रहते हैं। जंतुओं के बिना अधिकांश पुष्पीय पादप बहुत कम बीज बनाएँगे और नई भूमि तक फैल नहीं सकेंगे।

सूर्य का प्रकाश → उत्पादक → मृत पादप पदार्थआगे कहीं नहीं
पोषक तत्व: मृदा → पादप → मृत पादप → मृदा में कभी वापस नहीं
ऐसा क्यों होता है: प्रकृति में ऊर्जा बहती है और पदार्थ चक्र में घूमता है। ऊर्जा की पूर्ति सूर्य प्रतिदिन करता है, इसलिए उसे अकेले उत्पादक भी ग्रहण कर सकते हैं। पदार्थ की पूर्ति नहीं होती — वही पोषक तत्व बार-बार उपयोग होने चाहिए, और उन्हें आरंभ तक केवल अपघटक ही लौटा सकते हैं। केवल उत्पादकों वाले पारितंत्र में ऊर्जा की आपूर्ति चालू रहती है और पदार्थ की आपूर्ति टूटी रहती है, इसलिए वह कुछ ही पीढ़ियों में रुक जाता है।
प्र7.
अपने घर या विद्यालय के समीप दो अलग-अलग स्थानों का अवलोकन कीजिए (जैसे एक उद्यान और सड़क के किनारे का कोई स्थल)। आपको दिखाई देने वाले सजीव एवं निर्जीव घटकों की सूची बनाइए। दोनों पारितंत्र किस प्रकार भिन्न हैं?
उत्तर

विधि: प्रत्येक स्थान पर दिन के एक ही समय दस मिनट खड़े रहिए। जो भी सजीव दिखे या सुनाई दे और जो भी निर्जीव वस्तु उन्हें प्रभावित करती हो, उसे लिखिए। फिर तुलना कीजिए।

नमूना उत्तर — विद्यालय के पास का उद्यान और सड़क का किनारा—

 उद्यानसड़क का किनारा
सजीव (जैविक)घास, नीम और गुलमोहर, बाड़ें, पुष्पीय झाड़ियाँ, तितलियाँ, मधुमक्खियाँ, चींटियाँ, केंचुए, मैना, गौरैया, गिलहरी, एक कुत्ताकुछ कठोर वृक्ष, दरारों में धूल भरी घास और खरपतवार, कौवे, कबूतर, घरेलू मक्खियाँ, चींटियाँ, एक कुत्ता
निर्जीव (अजैविक)कोमल नम मृदा, छाया, नल तथा पक्षियों के पात्र में जल, ठंडी वायु, गिरी पत्तियाँकंक्रीट और तारकोल, दबी हुई कठोर मृदा, दिन के अधिकांश समय छाया नहीं, धूल, अधिक गरम वायु, नाली का जल
जीवों के प्रकार कितनेअनेक — कई वृक्ष, झाड़ियाँ, कीट और पक्षीबहुत कम — गिनी-चुनी कठोर प्रजातियाँ
आहार श्रृंखलाएँकई, जो जुड़कर एक छोटा जाल बनाती हैंबहुत छोटी, और प्राय: उत्पादकों के बजाय मानव कचरे पर टिकी हुई

दोनों में अंतर कैसे: सजीवों का अंतर निर्जीवों के अंतर से निकलता है। कोमल नम मृदा और छाया जड़ों, केंचुओं और पत्तियों के ढेर को बनने देती हैं, इसलिए उद्यान में उत्पादक, कई प्रकार के उपभोक्ता और मृदा में काम करते अपघटक — तीनों हैं। तारकोल और दबी मृदा जड़ों तथा जल को रोक देती है, और ऊष्मा तथा धूल स्थितियों को कठोर बना देती हैं, इसलिए सड़क किनारे केवल कुछ सहनशील प्रजातियाँ ही टिक पाती हैं। सड़क का किनारा वह स्थान भी है जहाँ मनुष्य लगातार हस्तक्षेप करते हैं — बुहारना, काटना, कचरा डालना — इसलिए वहाँ का समुदाय कभी बन ही नहीं पाता।

ऐसा क्यों होता है: अजैविक घटक तय करते हैं कि किसी स्थान पर कौन-से जीव रह भी सकते हैं, और फिर जीवों की संख्या तय करती है कि आहार जाल में कितनी कड़ियाँ बन सकती हैं। मृदा और छाया बदल दीजिए तो आपने पूरा समुदाय बदल दिया।
प्र8.
कृषि क्षेत्र जैसे मानव निर्मित पारितंत्र आवश्यक हैं परंतु उन्हें संधारणीय बनाया जाना चाहिए। इस कथन पर टिप्पणी करें।
उत्तर

कथन के दोनों भाग सही हैं, और दोनों आपस में जुड़े हुए हैं।

वे आवश्यक हैं। मनुष्य सहस्रों वर्षों से फसल उगाने के लिए खेती कर रहे हैं, और जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ी, कृषि पर हमारी निर्भरता भी बढ़ती गई। 1950 से 1965 के बीच भारत को कम फसल उत्पादन के कारण खाद्य संकट का सामना करना पड़ा; 20वीं शताब्दी के मध्य में ट्रैक्टरों, मशीनों, संश्लेषित उर्वरकों और पीड़कनाशकों — अर्थात हरित क्रांति — ने खाद्य उत्पादन बढ़ाकर देश को खाद्य सुरक्षा दी। इतनी बड़ी जनसंख्या को कोई प्राकृतिक पारितंत्र नहीं खिला सकता।

उन्हें संधारणीय बनाया जाना चाहिए। वही पद्धतियाँ अब असंधारणीय मानी जाती हैं — संश्लेषित रसायनों का अत्यधिक उपयोग, भूजल का अत्यधिक दोहन और व्यावसायिक लाभ के लिए मात्र एक ही प्रकार की फसल उगाना। परिणाम है मृदा का क्षरण: कम ह्यूमस, कम हितैषी सूक्ष्मजीव, अपरदन, गिरता जलस्तर, प्रतिरोधक क्षमता वाले पीड़क और घटते परागणकारी।

खेत एक पारितंत्र है जिसका प्रबंधन हम करते हैं
अच्छा प्रबंधन → मृदा के जीव, परागणकारी और पीड़क-परभक्षी हमारे लिए काम करते रहते हैं
बुरा प्रबंधन → उनका काम हमें रसायनों से करना पड़ता है → लागत बढ़ती है, मृदा घटती है

यहाँ "संधारणीय" का अर्थ: खेत का ऐसा उपयोग जो मृदा को अगले वर्ष भी उतना ही अच्छा छोड़े जितनी वह इस वर्ष है। कंपोस्ट और गोबर की खाद, धान्य कृषि के स्थान पर फसल चक्र और मिश्रित फसल, कुशल सिंचाई, आवश्यकता पड़ने पर ही छिड़काव, तथा वे जैविक और प्राकृतिक कृषि पद्धतियाँ जो प्राकृतिक पारितंत्र में न्यूनतम हस्तक्षेप करती हैं।

ऐसा क्यों होता है: वन के विपरीत, मानव निर्मित पारितंत्र को मानव द्वारा देखभाल और प्रबंधन की आवश्यकता होती है — उसे बनाते समय हमने उसके अधिकांश प्राकृतिक नियंत्रण हटा दिए थे। इसलिए विकल्प खेती और बिना खेती के बीच नहीं है; विकल्प उस खेती और इस खेती के बीच है जो मृदा को नया करती है अथवा उसे खर्च कर देती है।
प्र9.
यदि किसी रोग के कारण भारतीय शशकों की समष्टि कम हो जाती है (चित्र 12.20) तो इसका अन्य जीवों की संख्या पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर

चित्र 12.20 यह जाल दिखाता है — सूर्य घास और पादप को पोषित करता है, जिनसे शशक और हिरण को भोजन मिलता है; शशक को लोमड़ी खाती है और हिरण को उकाब। अत: शशकों की कमी दोनों शाखाओं में फैल जाती है।

सूर्य घास और पादप शशक हिरण लोमड़ी उकाब ▼ घटता है ▲ बढ़ता है — शशकों की कमी एक शाखा में नीचे और दूसरी में ऊपर जाती है
चित्र 12.20 के जाल में शशकों की समष्टि घटने का प्रभाव।
जीवपरिवर्तनकारण
लोमड़ीघटेगीइस जाल में शशक उसका भोजन है। शशक कम होने पर लोमड़ियों को कम भोजन मिलेगा, वे कम शावक पालेंगी और उनकी संख्या गिरेगी। कुछ लोमड़ियाँ दूसरे शिकार की ओर मुड़ सकती हैं — जिससे दबाव उन जीवों पर चला जाएगा।
घास और पादपआरंभ में बढ़ेंगेउन्हें चरने वाले दो शाकाहारियों में से एक कम हो गया है, अत: घास कम चरी जाएगी।
हिरणबढ़ेंगेअधिक घास उपलब्ध है और उसके लिए स्पर्धा कम है, इसलिए अधिक हिरण जीवित रहकर जनन करेंगे।
उकाबबढ़ेंगेइस जाल में हिरण उसका भोजन है, अत: अधिक हिरण का अर्थ अधिक उकाब।
ऐसा क्यों होता है: शशक की दो भूमिकाएँ हैं — वह घास का उपभोग करता है और लोमड़ी को पोषण देता है। उसके हटने से घास पर दबाव घटता है (संख्या बढ़ती है) और लोमड़ी भूखी रहती है (संख्या घटती है)। चूँकि घास हिरण के साथ साझा है, यह छूट वहीं नहीं रुकती: वह जाल की दूसरी शाखा से होकर हिरण और फिर उकाब तक पहुँच जाती है। इसीलिए एक समष्टि का परिवर्तन कभी एक स्थान पर नहीं रुकता — आहार जाल उसे हर उस दिशा में ले जाता है जिधर तीर जाते हैं।
स्वयं जाँचिए: हिरणों की वृद्धि सदा नहीं चलेगी। संख्या बढ़ते ही वे घास चर डालेंगे और आपसी स्पर्धा उनकी संख्या फिर नीचे ले आएगी — संतुलन गतिशील है, वह असीम रूप से बढ़ने के बजाय किसी नए स्तर पर आकर बैठ जाता है।
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