वह तब भी नीला ग्रह होती, परंतु एक नग्न ग्रह — केवल चट्टान, रेत एवं जल; कहीं भी हरा रंग नहीं।
परिवर्तन केवल रंग तक सीमित नहीं होता, क्योंकि जिसे हम ‘पृथ्वी’ कहते हैं उसका बहुत बड़ा भाग वास्तव में जीवों का ही बनाया हुआ है —
- हरी भूमि नहीं होती। वन, घास के मैदान एवं फसलें सभी जीवन हैं। महाद्वीप इस अध्याय में दिखाए गए मंगल के चित्रों जैसे नग्न चट्टान एवं धूल के दिखाई देते।
- वायु में ऑक्सीजन नहीं के बराबर होती। जिस ऑक्सीजन में हम श्वास लेते हैं वह पौधों द्वारा प्रकाश संश्लेषण में उत्सर्जित होती है। पौधों एवं समुद्री प्लवकों के बिना वायुमंडल में यह लगभग नहीं होती — और ऑक्सीजन के बिना ओजोन परत भी न बनती, अत: पराबैंगनी किरणें सीधे सतह तक पहुँचतीं।
- मृदा नहीं, केवल टूटी चट्टान होती। मृदा में नाइट्रोजन एवं पोटैशियम इसलिए हैं क्योंकि चट्टानों का मंद अपक्षय होता है और उसमें पौधों व जंतुओं के अवशेष मिलते हैं। जीवन के बिना यह केवल निर्जीव खनिज धूल होती।
- महासागर एवं मौसम तब भी होते। जल द्रव अवस्था में रहता, बादल बनते एवं वर्षा होती, क्योंकि यह सब पृथ्वी की सूर्य से दूरी एवं उसके वायुमंडल पर निर्भर है, जीवन पर नहीं।