कुतूहल अध्याय 13 पाठ्य प्रश्न

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
क्या आपने कभी यह विचार किया है कि वास्तव में पृथ्वी पर जीवन कहाँ विद्यमान है?
उत्तर

समस्त जीवन सतह पर एक अत्यंत पतली परत में ही है — भू-पर्पटी तथा उस पर स्थित जल एवं उसके ऊपर की वायु का निचला भाग।

सबसे ऊँचे पर्वत शिखर से सबसे गहरी गर्त तक ≈ 20 km
पृथ्वी की त्रिज्या ≈ 6400 km
अत: जीवन का संपूर्ण क्षेत्र त्रिज्या का लगभग तीन-सौवाँ भाग है

इसीलिए पुस्तक इसकी तुलना सेब से करती है — यदि पृथ्वी सेब के आकार की होती तो भू-पर्पटी सेब के छिलके से अधिक मोटी न होती (चित्र 13.1)।

भू-पर्पटी — समस्त जीवन यहीं केवल लगभग 5–70 km मोटी ऊपरी मैंटल निचला मैंटल बाह्य क्रोड — पिघला लोहा इसकी गति से ही पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र बनता है आंतरिक क्रोड पृथ्वी की त्रिज्या ≈ 6400 km (परतें मापक्रम में नहीं)
पृथ्वी की परतें। प्रत्येक वन, महासागर, नगर एवं व्यक्ति — सब कुछ किनारे की उसी हरी वलय तक सीमित है।
ऐसा क्यों होता है: जीवन को द्रव जल, वायु एवं सूर्य का प्रकाश एक ही स्थान पर चाहिए। ये तीनों केवल सतह पर मिलते हैं — कुछ किलोमीटर नीचे न प्रकाश है न मुक्त ऑक्सीजन; बहुत ऊपर वायु अत्यंत विरल हो जाती है। अत: जीवन उसी संकरी पट्टी में सिमटा है जहाँ भूमंडल, जलमंडल एवं वायुमंडल मिलते हैं।
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