कुतूहल अध्याय 2 जिज्ञासा बनाए रखें

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
कोशिका के विभिन्न भागों के नाम निम्नलिखित हैं। इन्हें निम्नांकित आरेख में उपयुक्त स्थानों पर लिखिए। केंद्रक, कोशिकाद्रव्य, हरित लवक, कोशिका भित्ति, कोशिका झिल्ली, केंद्रकाभ
उत्तर

आरेख इस प्रकार भरिए —

आरेख का भागवहाँ क्या लिखें
तीनों कोशिकाओं में समानकोशिका झिल्ली, कोशिकाद्रव्य
केवल पादप कोशिका मेंहरित लवक, कोशिका भित्ति
केवल जीवाणु कोशिका मेंकेंद्रकाभ
केवल जंतु कोशिका मेंकेंद्रक
जंतु कोशिका जीवाणु कोशिका पादप कोशिका केंद्रक कोशिका झिल्ली कोशिकाद्रव्य केंद्रकाभ हरित लवक कोशिका भित्ति
प्रत्येक भाग कहाँ आता है। बीच का उभयनिष्ठ भाग वही है जो तीनों कोशिकाओं में समान है।
प्रत्येक वहीं क्यों जाता है:
  • कोशिका झिल्ली और कोशिकाद्रव्य — प्रत्येक कोशिका में होते हैं। जंतु और पादप कोशिकाओं की भाँति सूक्ष्मजीवों की कोशिकाएँ भी कोशिका झिल्ली से घिरी होती हैं।
  • हरित लवक — पर्णहरित युक्त लवक केवल पादप कोशिकाओं में होते हैं, इसीलिए केवल वे ही प्रकाश संश्लेषण से भोजन बना पाती हैं। कवक और जीवाणु कोशिकाओं में हरित लवक नहीं होते।
  • केंद्रकाभ — जीवाणुओं में सुस्पष्ट केंद्रक और केंद्रकीय झिल्ली नहीं होती; उसके स्थान पर केंद्रकाभ होता है। यही विशेषता जीवाणु को यीस्ट, प्रोटोजोआ, शैवाल, कवक, पौधों और जंतुओं की कोशिकाओं से अलग करती है।
  • केंद्रक — सुस्पष्ट केंद्रक ही वह वस्तु है जिसका जीवाणु कोशिका में अभाव है, इसलिए इसे आरेख के जंतु वाले भाग में लिखा जाता है।
  • कोशिका भित्ति — जंतु कोशिका में यह नहीं होती, इसलिए यह पादप वाले भाग में जाती है।
इन दो के विषय में सतर्क रहिए। कड़े अर्थ में पादप कोशिका में भी केंद्रक होता है, और पुस्तक स्वयं कहती है कि पादप, कवक और जीवाणु — तीनों की कोशिकाओं में कोशिका भित्ति होती है। अत: इन छह में से केवल हरित लवक ही ऐसा है जो केवल पादप कोशिका में मिलता है और केवल केंद्रकाभ ऐसा जो केवल जीवाणु कोशिका में। केंद्रक और कोशिका भित्ति — दोनों तीन में से दो-दो कोशिकाओं में मिलते हैं, और आरेख में ऐसे साझे भाग के लिए कोई स्थान चिह्नित नहीं है — इसलिए इन्हें उस भाग में लिखा जाता है जो यह दर्शाता है कि किस कोशिका में ये नहीं हैं।
प्र2.
आनंदी ने दो परखनली लीं एवं उन्हें ‘क’ और ‘ख’ से चिह्नित किया। उसने प्रत्येक परखनली में दो चम्मच चीनी का घोल डाला। परखनली ‘ख’ में उसने एक चम्मच खमीर (यीस्ट) डाला। इसके पश्चात उसने प्रत्येक परखनली के मुँह पर दो कम फूले हुए गुब्बारे लगाए। उसने इस व्यवस्थापन को धूप से दूर गरम स्थान पर रखा। (i) क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि 3–4 घंटे के पश्चात क्या होगा? उसने देखा कि परखनली ‘ख’ से जुड़ा गुब्बारा फूला हुआ था। इसका संभावित स्पष्टीकरण क्या हो सकता है? (क) परखनली ‘ख’ में पानी वाष्पित हो गया और गुब्बारे में जलवाष्प भर गई। (ख) गरम वातावरण ने परखनली ‘ख’ के भीतर की हवा को फैला दिया जिससे गुब्बारा फूल गया। (ग) यीस्ट ने परखनली ‘ख’ के भीतर एक गैस उत्पन्न की जिससे गुब्बारा फूल गया। (घ) चीनी ने गरम हवा के साथ अभिक्रिया की जिससे गैस उत्पन्न हुई और अंततः गुब्बारा फूल गया। (ii) आनंदी ने एक और परखनली ली जो चूने के पानी से ¼ भरी थी। उसने परखनली ‘ख’ से गुब्बारे को इस तरह निकाला कि गुब्बारे में भरी हुई गैस बाहर न निकले। उसने गुब्बारे को चूने के पानी वाली परखनली से जोड़ा और उसे अच्छी तरह हिलाया। आपके विचार से वह क्या जानना चाहती है?
उत्तर

(i) अनुमान: 3–4 घंटे पश्चात परखनली ‘ख’ (जिसमें यीस्ट है) का गुब्बारा फूल जाएगा, जबकि परखनली ‘क’ का गुब्बारा जैसा था वैसा ही रहेगा।

सही स्पष्टीकरण है (ग) — यीस्ट ने परखनली ‘ख’ के भीतर एक गैस उत्पन्न की जिससे गुब्बारा फूल गया।

शेष विकल्प क्यों गलत हैं —

  • (क) गलत है। परखनली ‘क’ में भी उतनी ही गरमाहट पर वही चीनी का घोल है। यदि वाष्पन कारण होता तो ‘क’ का गुब्बारा भी फूल जाता।
  • (ख) भी इसी कारण गलत है — दोनों परखनलियाँ एक ही गरम स्थान पर हैं, अत: गरम हवा दोनों में समान रूप से फैलती।
  • (घ) गलत है। चीनी गरम हवा से अभिक्रिया करके गैस नहीं देती; और फिर परखनली ‘क’ में भी चीनी तथा गरम हवा दोनों थे, पर कुछ नहीं हुआ।
  • (ग) सही है क्योंकि ‘क’ और ‘ख’ में एकमात्र अंतर यीस्ट का है। यीस्ट श्वसन करके चीनी को विघटित करता है और ऊर्जा के साथ कार्बन डाइऑक्साइड निर्मुक्त करता है — वही गैस जो क्रियाकलाप 2.8 में आटे को फुलाती है।
इसके पीछे का तर्क: ‘क’ और ‘ख’ हर दृष्टि से एक जैसे हैं, केवल एक बात को छोड़कर — यीस्ट। जब दो व्यवस्थापनों में केवल एक ही अंतर हो और उनमें से केवल एक में प्रभाव दिखे, तो वही एक अंतर कारण होना चाहिए। परखनली ‘क’ यहाँ तुलना है, और वही एक झटके में (क), (ख) और (घ) को निरस्त कर देती है।

(ii) वह यह जानना चाहती है कि यीस्ट ने कौन-सी गैस उत्पन्न की — विशेष रूप से यह कि वह कार्बन डाइऑक्साइड है या नहीं।

चूने का पानी कार्बन डाइऑक्साइड की पहचान का परीक्षण है — कार्बन डाइऑक्साइड को स्वच्छ चूने के पानी के साथ हिलाने पर चूने का पानी दूधिया हो जाता है। अत: यदि गुब्बारे में एकत्र गैस चूने के पानी को दूधिया कर दे तो यीस्ट द्वारा निर्मुक्त गैस कार्बन डाइऑक्साइड है। गुब्बारा हटाते समय वह ध्यान रखती है कि गैस बाहर न निकले, क्योंकि साधारण वायु पर किया गया परीक्षण कुछ भी सिद्ध नहीं करता।

प्र3.
एक किसान अपने खेत में गेहूँ की फसल की बुवाई कर रहा था। उसने फसल की अच्छी उपज पाने के लिए मिट्टी में नाइट्रोजन समृद्ध उर्वरक डाला। पड़ोस के खेत में एक और किसान सेम की फसल उगा रहा था परंतु उसने स्वस्थ फसल प्राप्त करने के लिए नाइट्रोजन समृद्ध उर्वरक नहीं डाला। क्या आप इसके कारणों पर विचार कर सकते हैं?
उत्तर

क्योंकि सेम का पौधा अपनी नाइट्रोजन की आपूर्ति अपनी जड़ों में स्वयं रखता है, और गेहूँ का पौधा नहीं।

  • सेम एक फलीदार पौधा है। कुछ फलीदार पौधों — सेम, मटर और मसूर — की जड़ों में फूले हुए क्षेत्र होते हैं जिन्हें मूल ग्रंथिकाएँ कहते हैं।
  • इन ग्रंथिकाओं में राइजोबियम जीवाणु रहते हैं।
  • ये जीवाणु वायु से नाइट्रोजन अवशोषित कर लेते हैं एवं उसे पौधे के लिए उपयोगी बनाते हैं।
  • अत: सेम की फसल को नाइट्रोजन स्वाभाविक रूप से मिल जाती है और वह रासायनिक उर्वरकों के बिना उत्कृष्ट वृद्धि करती है। नाइट्रोजन उर्वरक डालना अनावश्यक व्यय होता।
  • गेहूँ में न मूल ग्रंथिकाएँ होती हैं और न राइजोबियम, अत: उसे नाइट्रोजन मृदा से ही लेनी पड़ती है। इसीलिए किसान अच्छी उपज के लिए नाइट्रोजन समृद्ध उर्वरक डालता है।
किसान फसल चक्रण क्यों करते हैं: सेम के खेत का राइजोबियम उस मृदा में नाइट्रोजन जोड़ता रहता है। इसीलिए किसान अन्य फसलों के साथ-साथ चक्रण में फलीदार फसलें भी उगाते हैं — इससे मृदा में नाइट्रोजन की मात्रा स्वाभाविक रूप से बढ़ती है और अगली फसल, जैसे गेहूँ, के लिए मृदा स्वस्थ रहती है। यह उर्वरक का काम एक सूक्ष्मजीव से कराने की विधि है।
प्र4.
स्नेहल ने अपने बगीचे में दो गड्ढे ‘क’ और ‘ख’ खोदे। गड्ढा ‘क’ में उसने फलों और सब्जियों के छिलके डाले और उन्हें सूखे पत्तों के साथ मिला दिया। गड्ढा ‘ख’ में उसने उसी तरह के कचरे को सूखे पत्तों के साथ मिलाए बिना डाल दिया। उसने दोनों गड्ढों को मिट्टी से ढक दिया और 3 सप्ताह बाद देखा। वह क्या जाँचने का प्रयास कर रही है?
उत्तर

वह यह जाँच रही है कि गीले छिलकों में सूखे पत्ते मिलाने से विघटन बेहतर होता है या नहीं — अर्थात सूखे पत्ते इस बात को कितना बदलते हैं कि कचरा कितनी शीघ्रता से और कितनी अच्छी तरह खाद में बदलता है।

ध्यान दीजिए कि प्रयोग कितनी सावधानी से बनाया गया है — दोनों गड्ढों में एक ही प्रकार का कचरा है, मिट्टी का वही आवरण है, वही बगीचा है और वही तीन सप्ताह। केवल एक बात भिन्न है — सूखे पत्ते। अत: 3 सप्ताह बाद जो भी अंतर मिलेगा वह केवल सूखे पत्तों के कारण होगा।

उसे संभवत: क्या मिलेगा —

गड्ढा ‘क’ — छिलके + सूखे पत्तेगड्ढा ‘ख’ — केवल छिलके
3 सप्ताह बादगहरे रंग की, भुरभुरी, मिट्टी जैसी गंध वाली खाद; छिलके पहचान में नहीं आतेगीला, दबा हुआ, लसलसा ढेर; विघटन धीमा और अधूरा, दुर्गंध के साथ
सूखे पत्ते सहायता क्यों करते हैं: सूक्ष्मजीवों को अपने कार्य के लिए वायु और उचित नमी चाहिए, और खाद का निर्माण इष्टतम तापमान तथा उचित नमी पर होता है। केवल गीले छिलके जमकर एक ठोस, लसलसा पिंड बन जाते हैं — जल हर रिक्ति भर देता है और भीतर के सूक्ष्मजीवों तक वायु पहुँच ही नहीं पाती। मिलाए गए सूखे पत्ते ढेर को पोला रखते हैं जिससे वायु के स्थान बने रहते हैं, और वे अतिरिक्त नमी सोख भी लेते हैं। तब कवक और जीवाणुओं को वायु और उपयुक्त नमी दोनों मिलती हैं और कचरा शीघ्रता से तथा पूर्ण रूप से विघटित हो जाता है।
प्र5.
निम्नलिखित सूक्ष्मजीवों की पहचान करें — (i) मैं प्रत्येक प्रकार के वातावरण में और आपकी आँत में रहता हूँ। (ii) मैं पावरोटी और केक को मुलायम और फूला हुआ बनाता हूँ। (iii) मैं दलहनी (फलीदार) फसलों की जड़ों में रहता हूँ और उनकी वृद्धि के लिए पोषक तत्व प्रदान करता हूँ।
उत्तर
संकेतसूक्ष्मजीवसंकेत से पहचान कैसे हुई
(i) मैं प्रत्येक प्रकार के वातावरण में और आपकी आँत में रहता हूँजीवाणुजीवाणु सर्वत्र पाए जाते हैं — जल, मृदा और वायु में, गरम पानी के झरनों और बर्फीले ठंडे क्षेत्रों में — और हमारी आँत में अनेक जीवाणु होते हैं जो पाचन में सहायता करते हैं
(ii) मैं पावरोटी और केक को मुलायम और फूला हुआ बनाता हूँखमीर (यीस्ट) — एक कवकखमीर आटे में श्वसन करके कार्बन डाइऑक्साइड निर्मुक्त करता है जिसके बुलबुले आटे को फुला देते हैं; इसी गुण का उपयोग पावरोटी और केक बनाने में होता है
(iii) मैं दलहनी फसलों की जड़ों में रहता हूँ और पोषक तत्व प्रदान करता हूँराइजोबियम — एक जीवाणुयह सेम, मटर और मसूर जैसी फलियों की मूल ग्रंथिकाओं में रहता है और वायु से नाइट्रोजन अवशोषित करके पौधे को देता है
संकेत: (ii) का उत्तर केवल ‘कवक’ नहीं, खमीर लिखिए — खमीर वही विशेष एककोशिकीय कवक है जो यह कार्य करता है, जबकि फफूँदी एक बहुकोशिकीय कवक है जो ब्रेड को फुलाने के बजाय खराब करती है।
प्र6.
यह जाँचने के लिए एक प्रयोग अभिकल्पित कीजिए कि सूक्ष्मजीवों को अपनी वृद्धि के लिए इष्टतम तापमान, वायु और नमी की आवश्यकता होती है।
उत्तर

सूक्ष्मजीवों के भोजन के रूप में ब्रेड लीजिए और चार टुकड़े ऐसे रखिए कि हर बार केवल एक ही स्थिति भिन्न हो।

सामग्री: एक ही ब्रेड के चार स्लाइस, चार स्वच्छ पारदर्शी डिब्बे या पॉलिथीन की थैलियाँ, थोड़ा जल, चम्मच या दस्ताने।

व्यवस्थापनकैसे तैयार करेंक्या जाँचा जा रहा है4–6 दिन बाद अपेक्षित परिणाम
क (तुलना)स्लाइस पर जल की कुछ बूँदें छिड़ककर कमरे के गरम, अँधेरे कोने में हल्का ढककर रखिएतीनों स्थितियाँ उपस्थितरुई जैसी या पाउडर जैसी फफूँदी अच्छी वृद्धि करती है
ख (तापमान)वही नम स्लाइस, हल्का ढककर, परंतु रेफ्रिजरेटर मेंकेवल तापमान बदलाबहुत कम या कोई वृद्धि नहीं
ग (नमी)स्लाइस को पहले धूप में भली-भाँति सुखाइए, फिर उसी गरम कोने में हल्का ढककर रखिएकेवल नमी बदलीबहुत कम या कोई वृद्धि नहीं
घ (वायु)नम स्लाइस को थैली में रखकर हवा निकालकर बंद कर दीजिए, उसी गरम कोने में रखिएकेवल वायु बदली‘क’ की तुलना में बहुत कम वृद्धि

प्रयोग कैसे चलाएँ: चारों को एक ही समय पर रखिए; प्रतिदिन एक ही समय पर देखिए; डिब्बे खोलिए नहीं; जो दिखे उसका चित्र बनाइए या वृद्धि की रूपरेखा डिब्बे पर अंकित कीजिए।

परिणाम कैसे पढ़ें: ‘क’ में अच्छी वृद्धि होती है। यदि ‘ख’, ‘ग’ और ‘घ’ — तीनों में ‘क’ की तुलना में बहुत कम वृद्धि हो, तो जो-जो स्थिति आपने हटाई थी — ताप, नमी, वायु — वह आवश्यक सिद्ध होती है। यही निष्कर्ष इस प्रयोग का उद्देश्य है।

एक बार में केवल एक ही चीज़ क्यों बदली जाती है: यदि आपने सूखा स्लाइस रेफ्रिजरेटर में रखा होता और उस पर फफूँदी न उगती, तो आप यह नहीं कह पाते कि ठंड ने रोका या सूखेपन ने। ठीक एक स्थिति बदलना और शेष सब वैसा ही रखना ही परिणाम को एक निश्चित कारण की ओर संकेत करने देता है।
सावधानी: पुस्तक का ही निर्देश मानिए जो क्रियाकलाप 2.5 में दिया है — फफूँदी लगी सामग्री को नंगे हाथों से न छुएँ, चम्मच या दस्तानों का उपयोग कीजिए। फेंकने से पहले डिब्बे बंद कर दीजिए और बाद में हाथ धो लीजिए।
प्र7.
ब्रेड के 2 स्लाइस लीजिए। एक स्लाइस को सिंक के पास एक प्लेट में रखिए। दूसरे स्लाइस को रेफ्रिजरेटर में रखिए। तीन दिन पश्चात दोनों स्लाइस की तुलना कीजिए। अपने अवलोकनों को अभिलेखित कीजिए। अपने अवलोकनों के कारण बताइए।
उत्तर

अवलोकन: तीन दिन पश्चात सिंक के पास रखे स्लाइस पर वृद्धि के धब्बे दिखते हैं — पहले सफ़ेद और रुई जैसे, बाद में हरे-काले या धूसर — और धब्बे के नीचे की ब्रेड मुलायम तथा विवर्ण हो चुकी होती है। रेफ्रिजरेटर वाले स्लाइस पर ऐसी वृद्धि लगभग नहीं होती; वह मुख्यत: सूखकर कड़ा हो जाता है।

सिंक के पास रखा स्लाइसरेफ्रिजरेटर में रखा स्लाइस
3 दिन बाद रूपरुई जैसे या पाउडर जैसे धब्बे, हरे-काले या सफ़ेदलगभग अपरिवर्तित, सूखा और कड़ा
गंधसीलन भरी, अप्रियसामान्य

कारण —

  1. सूक्ष्मजीव वायु में सर्वत्र उपस्थित हैं, अत: कवक के सूक्ष्म रूप दोनों स्लाइसों पर आ बैठते हैं। इस दृष्टि से दोनों में कोई अंतर नहीं।
  2. सिंक के पास का स्थान गरम और नम है। ये ठीक वही स्थितियाँ हैं जिनमें सूक्ष्मजीव वृद्धि करते हैं, अत: कवक गुणन करके शाखित तंतु बना लेता है — ठीक वैसा ही जैसा तालिका 2.2 में ब्रेड मोल्ड के लिए लिखा है, ‘पर्णहरित हीन शाखित तंतु जिनमें थैली जैसी संरचना होती है’। इतने तंतु मिलकर नग्न आँखों से दिखने योग्य धब्बा बना देते हैं।
  3. कवकों में पर्णहरित नहीं होता, अत: वे प्रकाश संश्लेषण से अपना भोजन स्वयं नहीं बना सकते और ब्रेड को ही खाते हैं। इसीलिए धब्बे के नीचे की ब्रेड खराब हो जाती है।
  4. रेफ्रिजरेटर में तापमान कम है, अत: इन सूक्ष्मजीवों की वृद्धि लगभग रुक जाती है। वे वहाँ भी हैं — ठंड ने उन्हें मारा नहीं — इसीलिए बाहर निकालकर गरम स्थान पर रखते ही ब्रेड शीघ्र फफूँदीदार हो जाती है।
स्वयं जाँचिए: यही एक तुलना भोजन को सुरक्षित रखने की लगभग सभी विधियाँ समझा देती है — रेफ्रिजरेटर ठंड से सूक्ष्मजीवों को धीमा करता है, सुखाना उनकी नमी छीन लेता है, और अचार बनाना नमक या चीनी से उनका मुक्त जल हर लेता है।
प्र8.
एक विद्यार्थी अवलोकन करता है कि जब दही को एक दिन के लिए बाहर रखा जाता है तो वह अधिक खट्टा हो जाता है। इस अवलोकन के दो संभावित स्पष्टीकरण क्या हो सकते हैं?
उत्तर

स्पष्टीकरण 1 — दही में पहले से उपस्थित लैक्टोबैसिलस कार्य करता रहता है। दही में अनेक प्रकार के जीवाणु होते हैं, उनमें से एक लैक्टोबैसिलस है। यह दूध में विद्यमान शर्करा (लैक्टोज) से भोजन प्राप्त करता है, गुणन करता है और किण्वन के साथ लैक्टिक अम्ल बनाता है। कमरे के तापमान पर बाहर रखे रहने पर कुछ लैक्टोज अब भी शेष रहता है और जीवाणु उसे अम्ल में बदलते रहते हैं, अत: दही में और अधिक लैक्टिक अम्ल एकत्र हो जाता है। अधिक अम्ल का अर्थ है अधिक खटास।

स्पष्टीकरण 2 — कमरे का तापमान इन जीवाणुओं के लिए सर्वथा अनुकूल है। ये जीवाणु गरम स्थितियों में अच्छी तरह पनपते हैं। रेफ्रिजरेटर से बाहर वे भीतर की तुलना में कहीं तेज़ी से गुणन करते हैं, अत: एक दिन में जीवाणुओं की संख्या — और इसलिए अम्ल बनने की दर — तेज़ी से बढ़ जाती है। इसके साथ ही वायु, चम्मच या बर्तन से आए अन्य अम्ल-उत्पादक सूक्ष्मजीव भी खुले दही में पनपकर खटास बढ़ा सकते हैं।

दोनों में समान विचार: दोनों स्पष्टीकरणों में खटास लैक्टिक अम्ल से ही आती है। पहला कहता है कि वही जीवाणु और अधिक अम्ल बनाते हैं; दूसरा कहता है कि गरमाहट अधिक जीवाणुओं को अधिक तेज़ी से अम्ल बनाने देती है। इसीलिए जम जाने के बाद दही रेफ्रिजरेटर में रखा जाता है — ठंड जीवाणुओं को रोकती नहीं, केवल इतना धीमा कर देती है कि दही एक-दो दिन स्वादिष्ट बना रहे।
प्र9.
चित्र 2.15 में दिए गए व्यवस्थापन का अवलोकन कीजिए और निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए। (i) फ्लास्क ‘क’ में चीनी के घोल का क्या होता है? (ii) चार घंटे पश्चात आप परखनली ‘ख’ में क्या देखते हैं? आपके विचार से ऐसा क्यों हुआ? (iii) यदि फ्लास्क ‘क’ में यीस्ट न डाला जाए तो क्या होगा?
उत्तर

व्यवस्थापन — फ्लास्क ‘क’ में चीनी का गुनगुना घोल और यीस्ट है; एक नलिका ‘क’ में बनी गैस को परखनली ‘ख’ तक ले जाती है, जिसमें चूने का पानी है।

चीनी का गुनगुनाघोल + यीस्ट चूने का पानी कार्बन डाइऑक्साइड नलिका से जाती है
चित्र 2.15 का व्यवस्थापन — फ्लास्क ‘क’ के यीस्ट से बनी गैस परखनली ‘ख’ के चूने के पानी में से गुज़ारी जाती है।

(i) फ्लास्क ‘क’ में यीस्ट श्वसन आरंभ कर देता है। वह घोल की चीनी को विघटित करके अपनी वृद्धि के लिए आवश्यक ऊर्जा निर्मुक्त करता है, अत: चीनी धीरे-धीरे समाप्त होती जाती हैकार्बन डाइऑक्साइड निर्मुक्त होती है और थोड़ी मात्रा में एल्कोहल बनता है। आप द्रव में से बुलबुले उठते और ऊपर झाग जमा होते देखेंगे, यीस्ट के गुणन से घोल धुँधला हो जाएगा और उसमें एल्कोहल की हल्की गंध आने लगेगी।

(ii) परखनली ‘ख’ में चार घंटे पश्चात स्वच्छ चूने का पानी दूधिया हो जाता है।

ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि फ्लास्क ‘क’ में निर्मुक्त कार्बन डाइऑक्साइड के पास निकलने का और कोई मार्ग नहीं है — वह नलिका से होकर चूने के पानी में से बुलबुलों के रूप में गुज़रती है। कार्बन डाइऑक्साइड गुज़ारने पर चूने का पानी दूधिया हो जाता है, और यही परीक्षण उस गैस की पहचान करता है। अत: परखनली ‘ख’ सिद्ध करती है कि ‘क’ से निकलने वाली गैस कार्बन डाइऑक्साइड है।

(iii) यदि फ्लास्क ‘क’ में यीस्ट न डाला जाए तो कुछ भी नहीं होगा। चीनी को विघटित करने वाला कोई जीव ही नहीं होगा, अत: कार्बन डाइऑक्साइड नहीं बनेगी, चीनी के घोल में बुलबुले नहीं उठेंगे, नलिका से कोई गैस नहीं जाएगी और ‘ख’ का चूने का पानी स्वच्छ ही बना रहेगा। चीनी का घोल भी अपरिवर्तित रहेगा।

यह व्यवस्थापन इतना विश्वसनीय क्यों है: यह कारण और प्रभाव को दो चरणों की दूरी पर जोड़ता है। यीस्ट ‘क’ में है, दूधियापन ‘ख’ में है, और दोनों के बीच एकमात्र मार्ग नलिका है। भाग (iii) वह नियंत्रण है जो तर्क को पूरा कर देता है — यीस्ट हटाइए और पूरी शृंखला रुक जाती है।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ